Web  hindi.cri.cn
तिब्बत में स्लोवेलिया की महिला डाक्टर मारिया उसुला रेह
2012-10-11 18:53:46

शायद आप को मालूम हुआ ही होगा कि बहुत ज्यादा पश्चिमी लोगों की नजरों में तिब्बती औषधिय़ां रहस्यमय ही नहीं, समझना भी अत्यंत मुश्किल है। लेकिन तिब्बत में यूरोप से आयी एक महिला डाक्टर तिब्बती औषधियों के जरिये स्थानीय गांववासियों के लिये बीमारियों का इलाज करने में पारंगत हैं, जिस से उन्हों ने स्थानीय गांववासियों की ओर से सम्मान प्राप्त किया ही नहीं, बल्कि चीन सरकार द्वारा वितरित राष्ट्रीय मैत्री पुरस्कार और तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की सरकार द्वारा वितरित चुमुलांगमा चोटी पुरस्कार भी जीत लिये। वे स्लोवेनिया से आयी महिला डाक्टर मारिया उसुला रेह ही हैं।

60 वर्षीय उसुला लाँग मार्च तय कर स्लोवेनिया से चीन आयी, आज तक उन्हें चीन की बर्फीले पठार पर काम किये हुए 16 साल हो गये हैं। 1995 में जब उसुला प्रथम बार ल्हासा के दौरे पर आयीं, तो उन्हें ऊंचाई बीमारी से कोई दिक्कत नहीं हुई। उन का कहना है कि उन्हें लम्बे समय से चीन और चीन के तिब्बत से बड़ा लगाव है और पहली ही नजर में इन दोनों क्षेत्रों से प्यार हो गया है। उन्होंने कहा:"मैंने बचपन से ही चीन आने का सपना देखा था। मेरे पिता जी चीन का प्रशंसक है, मेरे घर में चीनी इतिहास व संस्कृति के बारे में काफी ज्यादा किताबें सुरक्षित रखी हुई हैं।"

दूसरे वर्ष, उसुला फिर ल्हासा वापस लौट आयी और हमेशा के लिए तिब्बत में बसने लगीं। यहां आने के बाद वे तिब्बत विश्वविद्यालय में तिब्बती भाषा और तिब्बती चिकित्सा व दवा दारु सीखने भरती हुई। विश्वविद्यालय में दो सालों के अध्ययन से उन्हें पता चला कि तिब्बती चिकित्सा व औषधि संपूर्ण दृष्टि और इंसानियत से भरा चिकित्सा प्रणाली ही है। उसी समय से उन के मन में तिब्बती औषधियों से रोगियों का इलाज करने और संबंधित व्यक्तियों को प्रशिक्षित करने का विचार आया।

वर्ष 2000 से उसुला द्वारा विभिन्न संबंधित विभागों के सम्पर्क के जरिये तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की रेडक्रास सोसायटी ने क्रमशः स्विटजरलैंड और बेल्जियम आदि देशों की रेडक्रास सोसायटियों के साथ ल्हासा शहर के लुनड्रुप व मैचुकुंगा कांऊटियों तथा उत्तर तिब्बती पठार पर स्थित कृषि व पशुपालन क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा सहयोग परियोजना के बारे में समझौते संपन्न किये। इस परियोजना दल में कुल 15 कर्मचारी हैं, जिन का अधिकांश भाग तिब्बती चिकित्सा व दवा दारु कोर्स से स्नातक डाक्टर है। उसुला इस परियोजना के समन्वयक की हैसियत से धन राशि जुटाने का जिम्मा संभालने के अतिरिक्त अकसर दल के सदस्यों के साथ उक्त क्षेत्रों के गांवों में रोगियों का मुफ्त में इलाज भी करती हैं । इस के अलावा उसुला तिब्बती लोगों की स्वास्थ्य स्थिति को सुधारने के लिये उन्हें सब्जियां उगाने की तकनीक भी सीखायी। उसुला का कहना है:"हमें पता चला है कि बहुस ज्यादा बीमारियां असंतुलित पोषणों के सेवन से जुड़ी हुई हैं। इसलिये हम ने ग्रीन हाऊस स्थापित कर गांववासियों को सब्जियां उगाने की तकनीक सीखायी। यह स्थानीय वासियों की अभिलाषा भी है। स्थानीय सरकारों के साथ सम्पर्क से मालूम हुआ है कि स्थानीय गांववासी वातावरण संरक्षण के लिये कुछ काम करना चाहते हैं, अतः हम ने कचरा निपटान संयंत्र लगा दिया। इस के अलावा हम ने स्थानीय तिब्बती चिकित्सकों को ट्रेनिंग भी दी। स्थानीय सरकारों ने कुछ परियोजनाओं के लिये धन राशि जैसे बहुत ज्यादा समर्थन भी दिया।"

उसुला ने अपने दल के समान प्रयासों के जरिये 2004 में लुंगड्रुप कांऊटी के एक टाऊनशिप में एक चिकित्सा स्कूल खड़ा कर दिया । इस स्कूल के सभी अध्यापक परियोजना दल से आये हैं और छात्र गरीब परिवारों के हैं। इस स्कूल प्रणाली चार साल की है । सभी छात्र इन चार वर्षों में मुफ्त में पढ़ते हैं , साथ ही खाने रहने की फीस भी नहीं है। वे तिब्बती चिकित्सा पद्धति के सैद्धांतिक ज्ञान सीखने के साथ साथ क्लिनिक में चिकित्सा अभ्यास भी करते हैं। स्कूल से स्नातक के बाद काफी बड़ी तादाद में छात्र अपनी जन्मभूमि की सेवा के लिये वापस जाते हैं। साथ ही स्कूल का ग्रीन हाउस लुप्त होने वाली तिब्बती ज़ड़ी बुटियों को बचाने का काम भी संभालती है।

उसुला सालभर में तिब्बती क्षेत्र में किसानों व चरवाहों के स्वास्थ्य के लिये व्यस्त रही हैं, स्वभावतः उन्हें स्थानीय लोगों की ओर से सम्मान व खूब दाद मिली है। तिब्बती रेडक्रास सोसाइटी के महा सचिव त्सेरिंग वांगडू ने परिचय देते हुए कहा: "जब इस परियोजना के निर्माण स्थल पर उसुला आती हैं, तो स्थानीय लोग तुरंत ही उन्हें हाता भेंट करते हैं, तिब्बती जौ से तैयार मदिरा और मक्खन चाय पिलाते हैं और उन के साथ दिल खोलकर बातचीत कर लेते हैं।"

उसुला को तिब्बत में बसे हुए 16 वर्ष से अधिक समय हो गया है और तिब्बती भाषा खूब आती है, साथ ही कुछ स्थानीय लोग उन के दोस्त भी बन गये हैं, अब वे उत्तरोत्तर ल्हासा के जीवन की आदी हो गयी हैं। इसी दौरान उन्होंने अपनी आंखों से तिब्बती में भारी परिवर्तन भी देख लिये हैं। इसकी चर्चा में उसुला ने कहा:"यहां पर जमीन आसमान का परिवर्तन हो गय़ा है । पहले ल्हासा शहर काफी छोटा था, अब वह यूरोप के बड़े शहर जितना रौनकदार दिखाई देता है, विविधतापूर्ण सुविधाएं भी उपलब्ध हैं, लोग अपनी इच्छा से रेस्तरां जाते हैं। पहले जब हम लुंगड्रुप कांऊटी में काम करते थे, तो बस से लुंगड्रुप कांऊटी शहर से ल्हासा तक पहुंचने में सात घंटे लगते थे, पर अब पक्का राजमार्ग निर्मित हुआ है, सात घंटे के बजाये तीन घंटे काफी हैं। मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हुई है। पहले ल्हासा में तिब्बती चिकित्सा पद्धति वाले अस्पताल समेत केवल कई अस्पताल थे, यह मेरे लिये पर्याप्त है। लेकिन आज अस्पतालों की संख्या अधिक हो गयी है, सेवा गुणवत्ता भी बढ़ गयी है। और तो और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली भी कदम ब कदम सुधर गय़ी है, स्थानीय किसानों व चरवाहों को बीमारी के उपचार में ज्यादा जेब खर्चा देने की जरुरत भी नहीं है।"

उसुला ने कहा कि उन का परियोजना दल काम के लिये कुछ समय बाद पश्चिम तिब्बत के अली प्रिफैक्चर जा रहा है, जबकि अली प्रिफैक्चर समुद्र की सतह से चार हजार पांच सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित होने की वजह से विश्व की छत कहलाया जाता है। हालांकि उसुला के साथी ने हमारे संवाददाता से कहा कि उसुला की तबीयत इतनी अच्छी नहीं है, पर उसुला ने फिर भी कहा कि वे बराबर तिब्बत की सरल जीवन स्थिति को बेहद पसंद करती हैं और ऐसी जीवन शैली से एकदम संतुष्ट हैं ।

संदर्भ आलेख
आप की राय लिखें
सूचनापट्ट
• वेबसाइट का नया संस्करण आएगा
• ऑनलाइन खेल :रेलगाड़ी से ल्हासा तक यात्रा
• दस सर्वश्रेष्ठ श्रोता क्लबों का चयन
विस्तृत>>
श्रोता क्लब
• विशेष पुरस्कार विजेता की चीन यात्रा (दूसरा भाग)
विस्तृत>>
मत सर्वेक्षण
निम्न लिखित भारतीय नृत्यों में से आप को कौन कौन सा पसंद है?
कत्थक
मणिपुरी
भरत नाट्यम
ओड़िसी
लोक नृत्य
बॉलिवूड डांस


  
Stop Play
© China Radio International.CRI. All Rights Reserved.
16A Shijingshan Road, Beijing, China. 100040