2008-01-18 10:06:08

तिब्बती महाकाव्य《गेसार》पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी

जापान,अमरीका,रूस,कैनेडा औऱ ऑस्ट्रेलिया आदि देशों के विद्वानों ने भाग लिया और इस महाकाव्य के संरक्षण और विकास करने पर जोर दिया।

गेसार महाकाव्य तिब्बती इतिहास में गेसार नामक एक महाराजा की वीर-गाथा है,जिस में अन्याय पर न्याय की औऱ अंधकार पर रोशनी की विजय का गुणगान किया गया है। और इस में तिब्बती जाति के विकास के मुख्य दौर ने भी अभिव्यक्ति पाई है।यह महाकाव्य तिब्बती जाति का एक अनमोल ऐतिहासिक ग्रंथ है,जिसे तिब्बत के प्राचीन काल की लोक संस्कृति की उत्तम उपलब्धि और प्राचीन तिब्बती समाज को दर्शाने वाले एक विश्वकोष का दर्जा दिया गया है।

गेसार महाकाव्य मौखिक रुप से जन-जीवन में वाचन-कला के रूप में सदियों से प्रचलित रहा है।इस की उत्पत्ति ईसा पूर्व पहली शताब्दी से लेकर ईस्वी छठी शताब्दी के बीच रही है।17वीं शताब्दी में इसे लिखित रूप दिया गया।इस महाकाव्य के सौ से ज्यादा ग्रंथ हैं और इस में कुल पांच लाख पंक्तियां हैं।यह विश्व में सब से लम्बा ऐतिहासिक महाकाव्य माना जाता है।इसलिए यूनेस्को ने सहस्राब्दी के अवसर पर इसे अपनी एक स्मृति-आयोजन के कार्यक्रमों की सूची में शामिल किया ।इस महाकाव्य के अनुसंधान में लगे चीनी विद्वान श्री ली चिंग-यो ने कहाः

"विश्व में अधिकांश ऐतिहासिक महाकाव्य लिखित रूप में मिलते हैं।पर गेसार मौखिक तौर पर ही चला आया विश्व का एकमात्र लम्बा ऐतिहासिक महाकाव्य है।अब भी इस के सौ से अधिक वाचक हैं। यह महाकाव्य चीनी संस्कृति के खजाने में एक चमकता मोती है और समस्त मानव समुदाय की आध्यात्मिक संपत्ति भी।"

गेसार मुख्यतः चीन के तिब्बती और मंगोल जाति बहुल क्षेत्रों में प्रचलित है।चीन की थु और नासी जैसी अल्पसंख्यक जातियों में भी यह बहुत लोकप्रिय है।इसलिए यह पूरे चीनी राष्ट्र का खजाना है। गत सदी के 50 वाले दशक के शुरू में चीन में गेसार के संग्रह और संकलन का काम शुरू हुआ और इस के लिए एक विशेष राष्ट्रीय कार्यालय भी कायम किया गया।अब तक तिबब्ती भाषा में इस के सौ ग्रंथ औऱ मंगोल भाषा में 20 से ज्यादा ग्रंथ प्रकाशित किए जा चुके हैं।हान भाषा में इस के लगभग 30 ग्रंथों का अनुवाद किया जा चुका है।चीन में गेसार की अनेक अध्ययन-संस्थाएं हैं।कहा जा सकता है कि गेसार का अध्ययन चीनी लोक-साहित्य जगत में एक सब से सक्रिय विषय बन गया है।इस के वाचकों के ढेरों टेप-रिकार्ड भी बनाए गए हैं।

गेसार पर अभी-अभी संपन्न अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में चीनी और विदेशी विद्वानों ने यह समान मत पेश किया कि गेसार के बेहतर संरक्षण के लिए चीन की पीली नदी और यांग्त्सी नदी के ऊपरी भागों तथा तिब्बत में तीन गेसार गैलरियां और इस महाकाव्य से जुड़ी तीन पर्यटन-लाइनें कायम की जाएं,ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को गेसार के बारे में विस्तृत जानकारी मिल सके एवं गेसार जैसी शानदार तिब्बती संस्कृति की मदद से तिब्बत में पर्यटन-उद्योग के विकास को भी बड़ा बढावा मिल सके।इधर के सालों में छिंगहाई-तिब्बत पठार पर स्थित छिंगहाई प्रांत में गेसार स्मृति-भवन,गेसार अनुसंधान-केंद्र,गेसार ऑपेरा मंडली और गेसार वाचक संघ स्थापित किए गए हैं,जिस से लोगों में गेसार के प्रचार-प्रसार तथा तिब्बती संस्कृति के विकास में मदद मिली है।

तिब्बती स्वायत्त प्रदेश के समाज-विज्ञान अकादमी के प्रभारी श्री त्सीवांगचुनमई एक तिब्बती विद्वान हैं।उन्हों ने गेसार के संरक्षण के बारे में कहा कि चीन ने गेसार महाकाव्य के संरक्षण के लिए जो काम किया,वह समूची तिब्बती संस्कृति के संरक्षण के लिए किए गये कार्यों में एक उल्लेखनीय उदाहरण है।उन का कहना हैः

"चीन सरकार ने देश में अल्पसंख्यक जातियों की परंपरागत संस्कृतियों व कला-साहित्य के संरक्षण के लिए ढेर सारे काम किए हैं।मसलन गेसार के संरक्षण के लिए एक विशेष संरक्षण-कार्यालय भी कायम किया। देश के विभिन्न क्षेत्रों में समाज-विज्ञान संस्थाओं, उच्च शिक्षालयों और कला-साहित्य इकाइयों में जातीय संस्कृति संरक्षण के विशेष काम किए गए हैं। इस के अलावा सरकार ने वित्तीय और भौतिक सहायता भी दी है।इसलिए मुझे पूरा विश्वास है कि चीन में जातीय संस्कृति सचमुच अच्छी तरह से संरक्षित की जा रही है।"

इस साल के मई माह में गेसार महाकाव्य को देश की प्रथम खेप की गैर-भौतिक सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल किया गया और हर साल के जून के दूसरे शनिवार को राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई। इस तरह चीन में अन्य मूल्यवान सांस्कृतिक अवशेषों की ही तरह गेसार महाकाव्य के संरक्षण को भी मजूबती प्राप्त होगी।