
ललिताः यह चाइना रेडियो इंटरनेशनल है। आप की पसंद कार्यक्रम सुनने वाले सभी श्रोताओं को ललिता का प्यार भरा नमस्कार।
राकेशः राकेश का भी सभी श्रोताओं को प्यार भरा नमस्कार।
ललिताः तो आइए कार्यक्रम की शुरुआत करते हैं इस गीत से, एच. सी. बिहारी के इस गीत को संगीत दिया है ओ. पी. नैय्यर ने और गाया है आशा और महेंद्र कपूर ने, और इसे सुनने की फरमाईश की है हमारे इन श्रोताओं ने दिलकश रेडियो श्रोता संघ खगड़िया बिहार से दिलावर हुसैन दिलकश, बेगम सेरुन निशा दिलकश, अख्तर हुसैन दिलकश, रानी फातमा दिलकश, मौ. फिरोज आलम दिलकश, बेगम सहीदा दिलकश, आसी आसना दिलकश, अरवाज़ दिलकश, बाबु फरदीन खान दिलकश और मानसी ठाठा से जवाहर गुप्ता, हीना गुप्ता और गौरव गुप्ता।
गीत के बोलः
मेरी जान तुम पे सदके, एहसान इतना कर दो
मेरी ज़िंदगी में अपनी, चाहत का रंग भर दो
किसी चाँद की ज़रूरत
नहीं मेरी ज़िंदगी को
कि तरस रहा हूँ कब से
मैं तुम्हारी रोशनी को
मुझे रोशनी दिखा के
एहसान इतना कर दो, मेरी ज़िंदगी
ये तुम्हारी ज़ुल्फ़ जिसको
मिली शोखियाँ घटा की
इन्हीं बादलों के नीचे
मेरी हर नज़र है प्यासी
मेरी प्यास तुम बुझा के
एहसान इतना कर दो, मेरी ज़िंदगी
मेरी जान तुम पे सदक़े, अहसान इतना कर दो
मेरी ज़िंदगी में अपनी, चाहत का रंग भर दो
मेरी जान तुम पे सदक़े
मेरी हर ख़्हुशी अधूरी
मेरा हर सिंगार फीका
बिना प्यार के न भाये
मुझे चाँद का भी टीका
मुझे प्यार से सजा कर
अहसान इतना कर दो, मेरी ज़िंदगी
मैं हवा का रुख़्ह बदल दूँ
मिले प्यार जो तुम्हारा
जहाँ डूब कर मैं देखूँ
हो उसी जगह किनारा
मुझे तुम गले लगाके
अहसान इतना कर दो, मेरी ज़िंदगी
राकेशः इसी गीत को सुनना चाहा था भपोरा, अरखा, रायबरेली से रोशित त्रिपाठी ने, शाहीन रेडियो श्रोता संघ मऊनाथ भंजन यू. पी. से इरशाद अहमद अंसारी, शकीला खातून, यासमीन बानो, आफताब बानो, महताब आलम, अब्दुल वासे, शहनाज बानो और इशतियाक अहमद।
राकेशः ललिता जी, मैंने सुना और पढ़ा है कि स्छवान की वनछवान काऊंटी में जो भूकंप आया और जिस में जान माल का बहुत अधिक नुकसान हुआ, वहां अपनी जान दे कर दूसरों की जान बचाने की अनेक मर्मस्पर्शी कहानियां भी सुनने देखने को मिली।
ललिताः जी हां, आप ने ठीक कहा। एक स्कूल में जिस की इमारत भूंकप में ध्वस्त हो गई, वहां छात्रों को इमारत से बाहर भेजते हुए एक युवा अध्यापक स्वंय बाहर नहीं निकल पाए, हालांकि सभी छात्रों को उन्होंने सुरक्षित बाहर भेज दिया। इस तरह की अनेक मानवीय दिल को छू लेने वाली कहानियां वहां देखने सुनने को मिल रही हैं, जिस से लगता है कि लोगों में ऊंचे मानवीय मूल्यों के लिए अभी भी बहुत जगह है।
राकेशः सही बात है। अगर लोगों में ऐसी एक दूसरे की मदद करने की भावना हो, तो बड़ी से बड़ी विपदा भी मनुष्य को पराजित नहीं कर सकती। और स्छवान के भूकंप के बाद लोगों ने जिस शक्ति, और एक दूसरे की मदद करने की भावना का परिचय दिया है, उस से हमें विश्वास है कि जल्द ही वहां लोग अपने नष्ट हुए मकानों को फिर से बना लेंगे और इस प्राकृतिक विपदा के सामने घुटने नहीं टेकेंगे।
गीत के बोलः
ग़म की अंधेरी रात में
दिल को ना बेक़रार कर
सुबह ज़रूर आयेगी
सुबह का इन्तज़ार कर
ग़म की अंधेरी रात में
दर्द है सारी ज़िन्दगी
जिसका कोई सिला नहीं
दिल को फ़रेब दीजिये
और ये हौसला नहीं
खुद से तो बदग़ुमाँ ना हो
खुद पे तो ऐतबार कर
सुबह ज़रूर आयेगी
सुबह का इन्तज़ार कर
ग़म की अन्धेरी रात में
खुद ही तड़प के रह गये
दिल कि सदा से क्या मिला
आग से खेलते रहे
हम को वफ़ा से क्या मिला
दिल की लगी बुझा ना दे
दिल की लगी से प्यार कर
सुबह ज़रूर आयेगी
सुबह का इन्तज़ार कर
ग़म की अंधेरी रात में
ललिताः यह गीत था सन् 1966 में बनी फिल्म "सुशीला" से, तलत महमूद और मुहम्मद रफी की आवाज़ में, सी अर्जुन का संगीत बद्ध किया हुआ और जां निसार अख्तर का लिखा हुआ। इस गीत को हमारे इन श्रोताओं ने सुनने की फरमाइश की थी पैगाम रेडियो लि. क्लब ऊंची तकिया मुबारकपुर, आजमगढ़ से दिलशाद हुसैन, बेकार हैदर, फातिमा सीगरा, सगीरुलहोदा और हसीना दिलशाद। आजमी रेडियो लि. क्लब मुबारकपुर कटरा से शाहीद हसन आजमी, रजीउल हसन, जफरुल हसन, सईदुल हसन, बरकतुल्लाह अन्सारी तथा फैजान अहमद। इसी गीत की फरमाइश हमारे इन श्रोताओं ने भी की थी ममता रेडियो श्रोता संघ जोगसर चौक भागलपुर से भाई रवि राय, ममता राय, कस्तुरी, सोनी गुमटिया, बुढ़ानाथ चौक, भागलपुर से राहुल राय, कंचन, नेहा, श्वेता, सोनी और राकेश राय।
इस लेख का दूसरा भाग अगली बार प्रस्तुत होगा, कृप्या इसे पढ़े।
