2009-06-15 09:22:03

तिब्बती संगीतकार मेनांग दोर्जे

दुनिया की छत पर स्थित तिब्बत स्वायत्त प्रदेश चीन की अल्पसंख्यक जाति----तिब्बती जाति की मुख्य बस्ती है। हजारों वर्षों में तिब्बती जनता ने तिब्बती जाति की शानदार संस्कृति रची है। आज तक तिब्बती कलाकार भी लगातार जातीय विशेषता व आधुनिक शैली वाली कला रच रहे हैं। आज के कार्यक्रम में हम आप लोगों को एक तिब्बती संगीतकार मेनांग दोर्जे का परिचय देंगे ।

मेनांग दोर्जे का जन्म पूर्वी तिब्बत के छंगतु प्रिफ़ेक्चर के एक सैन्य परिवार में हुआ । उन के पिता चीनी जन मुक्ति सेना में एक तिब्बती अधिकारी हैं । पिता को तिब्बत का परंपरागत संगीत बहुत पसंद है। पारिवारिक प्रभाव व अपनी प्रतिभा द्वारा मेनांग दोर्जे ने नौ वर्ष की आयु में तिब्बत के मंच पर प्रदर्शन किया। वे अभिनेता बन गये, निर्देशन सीखा, और तिब्बत में अरहू वाद्य बजाने वाले एकमात्र संगीतकार भी बने । लेकिन मेनांग दोर्जे को मालूम है कि उन की संस्कृति व संगीत से जुड़ी जानकारी बहुत कम है। इसलिये वे 20 वर्ष की उम्र में चीन के प्रसिद्ध शांघाई संगीत कॉलेज में भरती होकर संगीत रचने व जातीय संगीत आदि कक्षाएं लेने लगे।

गीत----《कल का सूर्य》

अभी आपने सुना तिब्बती जाति की विशेषता भरा गीत《कल का सूर्य》, जिसे मेनांग दोर्जे ने वर्ष 1987 में रचा था। उस समय वह तिब्बती पंचांग के नये साल के सुअवसर पर तिब्बती टी.वी. स्टेशन के रात्रि समारोह में अंतिम कार्यक्रम के रूप में गाया गया था। प्रसारण के बाद वह तेजी से सारे छिंगहाए तिब्बत पठार में फैल गया। इस गीत में तिब्बती संगीत की शैली व आधुनिक रस दोनों शामिल हैं। और उस का चीन के भीतरी इलाकों और तिब्बत के विशाल दर्शकों ने हार्दिक स्वागत किया है। इस गीत ने मेनांग दोर्जे के आत्मविश्वास को खूब बढ़ाया, और उन के संगीत जीवन को भी बदल दिया।

मेनांग दोर्जे की याद में एक बार जब वे तिब्बती लोक गीत इकट्ठे करने के लिये एक बहुत दूर के पशुपालन क्षेत्र में गये, तो आकस्मिक मौके पर उन्होंने एक चरवाहे के मुंह से अपना वह गीत《कल का सूर्य》सुना। इस बात से वे बहुत प्रभावित हुए। साथ ही उन्होंने मन में एक ऐसा फैसला भी किया कि मैं ज़रूर अपने जन्मस्थान के लिये अच्छे से अच्छा गीत रचूंगा।

इस के बाद मेनांग दोर्जे ने तिब्बती परंपरागत संगीत से और ज्यादा सीखने की कोशिश की। विश्व को तिब्बत के पुरातन दरबारी संगीत का परिचय देने के लिये उन्होंने दो साल तिब्बत का दरबारी संगीत बजाना सीखा । वर्ष 1987 में मेनांग दोर्जे ने तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के संगीत-नृत्य मंडल के दरबारी संगीत दल के प्रमुख संगीतकार के रूप में ब्रिटेन में कार्यक्रम प्रस्तुत किया, और उन्हें बड़ी सफलता मिली। इस की चर्चा में उन्होंने कहा:

"हम ने चीन के तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की ओर से ब्रिटेन में कार्यक्रम प्रस्तुत किया। प्रस्तुति बहुत सफल रही। दर्शकों को तिब्बत के मधुर संगीत, शानदार संस्कृति व लंबे इतिहास पर बड़ा ताज्जुब हुआ। सभी दर्शक आंखें बंद करके ध्यान से हमारा संगीत सुन रहे थे। यह प्रस्तुति बहुत ध्यानाकर्षक है।"

इस के बाद के दस वर्षों में मेनांग दोर्जे संगीत दल के अन्य सदस्यों के साथ लगातार प्रस्तुति का विषय समृद्ध करते रहे। उन्होंने क्रमशः अमरीका, फ़्रांस, जर्मनी, स्वीडन और ऑस्ट्रिया आदि दसेक देशों में प्रस्तुतियां दी हैं । ज्यादा से ज्यादा विदेशी लोगों ने उन की प्रस्तुति देख कर तिब्बत की शानदार संस्कृति व कला को समझा। उन्होंने कहा:"कुछ अमरीकी साथियों ने पचास या साठ के दशक में तिब्बती संगीत सुना है। लेकिन उन्होंने आधुनिक तिब्बती संगीत नहीं सुना। मैंने उन्हें तिब्बत के कई सौ वर्षों यहां तक कि हजारों वर्षों से पहले के संगीत का परिचय दिया। वे बहुत आश्चर्यचकित हुए। कुछ विश्वविद्यालयों ने मुझे वहां तिब्बती संगीत व संस्कृति पर भाषण देने के लिए भी आमंत्रित किया। आदान-प्रदान से वे और गहन रूप से तिब्बत की कला समझ सकते हैं। जीवित रहने के लिए संस्कृति को आदान-प्रदान चाहिए। तिब्बत में इतनी शानदार संस्कृति है कि विश्व के सभी लोगों को इसे जानना चाहिये।"

गीत--《ईगल के प्रति लालसा》

मेनांग दोर्जे लगातार तिब्बत के परंपरागत संगीत से सीखने के साथ-साथ उसे अपने संगीत में शामिल करने पर भी ध्यान देते हैं। वर्ष 1995 से वे पूरा समय संगीत रचने में द���ने लगे। उन के द्वारा रचे गये गीत《ईगल के प्रति लालसा》को फिर एक बार सफलता मिली। इस गीत की चर्चा में मेनांग दोर्जे ने हमें बताया:

"न सिर्फ़ तिब्बती जाति, बल्कि हान जाति के श्रोताओं को भी यह गीत पसंद है। मुझे लगता है कि वह हमारी जातीय धुन व आधुनिक ताल का मिश्रित फल है। उन दोनों का जोड़-मेल बहुत महत्वपूर्ण है।"

भी तक मेनांग दोर्जे ने विभिन्न तरीकों के दो सौ से ज्यादा संगीत रचा है, और उन्हें बहुत राष्ट्रीय इनाम भी मिले हैं। वर्ष 2003 में मेनांग दोर्जे ने फिर एक बार शांघाई संगीत कॉलेज में वापस लौटकर विशेष तौर पर संगीत रचने का विषय लिया। इस दौरान उन्होंने देश-विदेश के श्रेष्ठ संगीत का अनुसंधान भी किया। उन की दृष्टि विस्तृत हो गयी, और संगीत रचने की आधुनिक तकनीक के खूब अनुभव भी प्राप्त हुए। लेकिन एक तिब्बती जाति के संगीतकार के रूप में उन के विचार में तिब्बत हमेशा उन के संगीत जीवन की भूमि है। उन्होंने कहा:

"चाहे मैं कैसा भी संगीत रचूं, मैं तिब्बत की लोक व परंपरागत कला को नहीं छोड़ूंगा। यह तिब्बत की मधुर धुन है, और मेरा आधार भी है। मुझे लोक व परंपरागत कला के आधार पर संगीत रचना होगा, नहीं तो मैं अपनी शैली खो दूंगा।"