2009-03-02 16:24:23

कंप्यूटर नहीं कन्फयुसियस जवाब हैं बड़े सवालों का

आज विशव के कई भागों में अलग अलग विषयों के आधार पर कई किस्म की आलोचनाएँ होते रहती हैं और इन में से एक है समाज की नैतिक मूल्यों और उसके आधुनिकीकरण के मूल्यों के बीच हो रही अंतर्विरोध। उदाहरण के तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका का ही उदाहरण ले लीजिए जिसके समाज के ऊपर इसाही नैतिक परंपरा की एक अमर असर है या नहीं। लेकिन अगर कोई आज के चीनी समाज में, जो कहा जा सकता है की अपने आधुनिकीकरण के पहले कुछ कदम बढ़ा रहा है, नैतिक मूल्यों और आधुनिकीकरण के मूल्यों के बीच हो रही अंतर्विरोध से जुड़ी चर्चाएँ कुछ अजीब लगती है और ऐसी चर्चाएँ चीनी समाज के लिए भविष्य में खतरे का श्रोत बन सकती है।

बारबार इस बात की याद दिलायी जाती है की कन्फयुसियनिस्म काफी पुराना और बेकार हो गया है और इसका आज के समाज में कोई भी भूमिका नहीं रह गयी है। आधुनिक व्यापार खास करके एक ऐसा क्षेत्र बताया जाता है जहां पर लोगों का यह मानना है की नवीनतम तक्नालोजी पर आधारित एक कड़ी प्रतियोगिता होती है और इसी आधार पर लोगों को उपलब्ध अवसरों का फायदा उठाना चाहिए।

लेकिन वास्तव में देखा जाय तो असलीयत इतना सामान्य नहीं है। कन्फयुसियनिस्म की इसके लंबे और पुराने इतिहास और असंगत होने की भारी निन्दा के बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा की यह ही केवल एकमात्र ऐसा धर्म है जो चीनी समाज के पास है और कोई भी समाज दो या दो से अधिक नैतिक मूल्यों के आधार पर, अंतर्विरोधी मूल्यों की तो जिक्र करना ही बेकार है, टिक नहीं सकता और सामान्य कार्य नहीं कर सकता। चीनी समाज में ताओइस्म और बौद्ध धर्म का भी काफी भारी असर रहा पर चीनी समाज के नैतिक जीवन में कन्फयुसियनिस्म ने जो छाप छोड़ी है वह सचमुच अतुलनिय है।

आज के चीनी समाज में कन्फयुसियनिस्म को बेकार बताना और इस बात का विवाद करना की इसे अभी भी अपनाया जाय या इसके बदले दूसरा कोई नैतिक मूल्य अपनाना चाहिए अपने आप में एक व्यर्थपूर्ण विषय है। इस तरह की संभावना तो नामूमकिन है, मानो जैसे इसाई परंपरा को अमेमीकि समाज से अलग करने की पात की जा रही हो।

आज ऐसे एक समय का सोचना ही हमारे लिए नामुमकिन है की एक ऐसा दिन आएगा जब विज्ञान के आधार पर एक नयी पीड़ि का जन्म होगा। जब तक समाज में जिम्मेदारी की जरुरत है तब तक लोगों को अपने आप निर्णय लेने पड़ेंगे, उन्हें नैतिक मूल्यों के आधार पर अपनी और अपनी परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारीयाँ निभानी पड़ेंगी और ये सभी मूल्य लोगों को अपने पुरखों से प्राप्त होती हैं।

हम लोगों की समाज जितना भी बदल जाये और हमारी आर्थिक स्थिति जितनी भी बदल जाये, हमारी नैतिक दर्शनशास्त्र के कुछ अपने ही नियमकानून है और सवाल है जिनका जवाब विज्ञान के पास नहीं है। ये सभी सवाल आम जिंदगी से बहुत ही घने रुप से जुड़ा हुआ है। और ये सवाल आज से हजारों साल पहले चीन और ग्रीस के महान् दार्शनिक उठाये थे और इन सवालों का सुलझाने की कोशिश की। ये सवाल आज की तेज रफ्तार वाली समाज में भी उतना ही अहमियत रखते हैं जितना वे पुरातन काल में रखती थी। संक्षिप्त में यह कहना गलत नहीं होगा की विज्ञान नैतिक मूल्यों का जगह नहीं ले सकता।