अब आप जो आवाज़ सुन रहे हैं, वह तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में 86 वर्षीय लोक कलाकार सांगचू द्वारा तिब्बती महाकाव्य《राजा केसर》का कथावाचन करने की आवाज़ है ।《राजा केसर》प्राचीन तिब्बत के समाज का अनुसंधान करने वाला महाकाव्य है । हज़ारों वर्षों में राजा केसर की कहानी व्यापक जनजीवन में एक लोक काव्य के रूप में मौखिक रूप से प्रचलित रही है । इस का श्रेय तिब्बती लोक वाचकों को जाता है । वे इधर-उधर घूमते हुए केसर की कहानियों को तिब्बती बहुल क्षेत्रों में प्रसारित करते रहे हैं । लम्बे अर्से से पीढ़ी दर पीढ़ी तिब्बती वाचकों ने राजा केसर की कहानी का प्रचार किया है और समय बीतने के साथ-साथ युगानुकूल इस में नए-नए विषय शामिल होते गए हैं । आज तक इस महाकाव्य का विस्तार जारी है । तो इस लेख में तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के सामाजिक विज्ञान अकादमी के जाति अनुसंधान केंद्र के उप निदेशक, तिब्बती विद श्री त्सेरिंग फुनत्सोक तिब्बती जाति की वाचन संस्कृति के बारे में जानकारी और इस के आकलन व संरक्षण के बारे में जानकारी देंगे ।
86 वर्षीय तिब्बती लोक कलाकार सांगचू वर्तमान में महाकाव्य《राजा केसर》की कहानियों का वाचन करने वाले सब से बुज़ुर्ग वाचक हैं , जिन्हें महाकाव्य《राजा केसर》के सब से अच्छे लोक वाचकों में से एक माना जाता है । पुराने तिब्बत में शिक्षा का स्तर बहुत नीचा था। सांगजू जैसे लोक वाचकों को स्कूल में पढ़ने का मौका नहीं मिला । इस की चर्चा में तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के सामाजिक विज्ञान अकादमी के जाति अनुसंधान केंद्र के उप निदेशक श्री तसेरिंग फुनत्सोक ने कहा:
"गत शताब्दी में किए गए आम सर्वेक्षण में हमें तिब्बती लोक वाचक सांगजू के बारे में पता लगा । उन के अनुसार ग्यारह साल की उम्र में एक बार जब वे घास मैदान में सोए हुए थे उन्होंने एक सपना देखा । इस के बाद उन्हें《राजा केसर》की कहानियां सुनाने की सामर्थ्य हासिल हो गई।"
अनेक लोगों का विचार है कि सांगजू जैसे वाचक"सपने में दीक्षित कथा वाचक"हैं । यानि कि वे सपना देखने के बाद《राजा केसर》गा सकते हैं । तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में सांगजू जैसे आश्चर्यजनक अनुभव सम्पन्न वाचकों की संख्या बहुत है । उन में से कुछ लोगों ने पशु पालन करते समय अचानक सोने के समय देखे गए सपनों में राजा केसर की कहानियां सुनाने की सामर्थ्य हासिल की है । इन लोक वाचकों की समान विशेषता है कि वे अनपढ़ होने के बावजूद बहुत बुद्धिमान हैं । तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के सामाजिक विज्ञान अकादमी के जाति अनुसंधान केंद्र के उप निदेशक श्री त्सेरिन फुनत्सोक ने जानकारी देते हुए कहा:
"तिब्बती लोक वाचक आम तौर पर गरीब किसान व चरवाहे परिवार से आए हुए हैं । नए चीन की स्थापना के पूर्व उन में से कुछ लोक गायन करके जीवन बिताते थे और इधर-उधर यायावरी करते घूमा करते थे । समाज में उन का स्थान बहुत नीचे था । विशाल घास मैदानों में वे घूमंतु जीवन बिताते हुए गायन का काम करते थे । इस प्रकार के वाचक प्राचीन यूनान में होमर महाकाव्य गाने वाले वाचकों के समान हैं । वे आम तौर पर बौद्ध धर्म के अनुयायियों के साथ चलते थे और एक दूसरे की मदद करते थे। इस तरह वाचकों की रचनाओं के और ज्यादा स्रोत पैदा हुए और सांगजू जैसे मशहूर लोक वाचक सामने आए हैं ।"
महाकाव्य《राजा केसर》को प्राचीन समय में तिब्बती लोक संस्कृति की सब से उच्च स्तरीय कामयाबी के रुप में देखा जाता है । अब तक इस की कोई 150 किस्म की प्रतियां सुरक्षित रखी हुई हैं । पूरे महाकाव्य में कोई एक करोड़ पचास लाख अक्षर हैं । यह महाकाव्य प्राचीन यूनान के महाकाव्य《इलियड》और भारत के《महाभारत》से दस गुना से भी अधिक बड़ा है ।《राजा केसर》"वर्तमान विश्व में इसे सब से लम्बा जीवित महाकाव्य"माना जाता है । इतने लम्बे महाकाव्य को कथा वाचक मौखिक कैसे याद रखते हैं?
इस लेख का दूसरा भाग अगली बार प्रस्तुत होगा, कृप्या इसे पढ़े। (श्याओ थांग)