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    संडे की मस्ती 2015-10-25
    2015-10-22 16:40:59 cri

    अखिल- दोस्तों, मैं आपको बताने जा रहा हूं कि विधवा जैसा जीवन जीकर मांगती हैं पति की सलामती की दुआएं।

    दोस्तों, पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर तथा बिहार के कुछ हिस्सों में एक अनोखी परम्परा है कि गछवाहा समुदाय की स्त्रियां विधवा जैसा जीवन जीकर अपने पति की सलामती मांगती हैं। गछवाहा समुदाय ताड़ी के पेशे से जुड़ा है। इस समुदाय के लोग ताड़ के पेड़ों से ताड़ी निकालने का कार्य करते हैं। ताड़ के पेड़ 50 फिट से भी ज्यादा ऊंचे होते हैं तथा एकदम सपाट होते हैं।

    इन पेड़ों पर चढ़कर ताड़ी निकालना बहुत जोखिम का कार्य होता है. ताड़ी निकालने का काम चैत्र मास से सावन तक चार महीने किया जाता है। गछवाह महिलाएं इन चार महीनों में न तो अपनी मांग में सिंदूर भरती हैं और न ही श्रृंगार करती हैं। वह अपने सुहाग की सभी निशानियां देवरिया जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर तरकुलहा देवी के पास रेहन रखकर अपने पति की सलामती की दुआ मांगती हैं।

    तरकुलहा गछवाहों की प्रमुख देवी मानी जाती हैं तथा उनका मंदिर गछवाहों का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। गछवाह महिलाएं चैत्र महीने रामनवमी से लेकर श्रावण के नागपंचमी तक विधवा के भेष में रहती हैं। ताड़ी का काम खत्म होने के बाद सभी गछवाह महिलाएं नागपंचमी के दिन तरकुलहा देवी के मंदिर में इकट्ठे होती हैं और पूजा करने के बाद अपनी मांग भरती हैं।

    पूजा के बाद सामूहिक गौठ का आयोजन होता है. गछवाहों में यह परम्परा कब से चली आ रही है इसकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। अधिकतर गछवाहों का कहना है कि वह इस परम्परा के बारे में अपने पूर्वजों से सुनते आ रहे हैं।

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