हवा में खड़े मंदिर की संरचना बहुत सुनियोजित और सुक्ष्म है। मंदिर के विभिन्न भाग पहाड़ी चट्टान की प्राकृतिक स्थिति के अनुरूप बनाये गए है, जिनके डिजाइन सुक्ष्म और अनूठा हैं। मंदिर का मुख्य भवन त्रिदेव-महल पहाड़ी चट्टान की विशेषता को ध्यान में रख कर बनाया गया। महल के अग्रिम भाग में लकड़ी का बना मकान है और पीछे का भाग चट्टान के अन्दर खोदी गई गुफा में है। इसे देखने में त्रिदेव महल बहुत खुला और विशाल लगता है। मंदिर के दूसरे भवन व मंडप अपेक्षाकृत छोटा है और उनके भीतर विराजमान मूर्तियां भी छोटी दिखती हैं। मंदिर के भवन, महल और मंडप इस प्रकार निर्मित हैं कि अगर उनके भीतर प्रवेश करते है तो मानो किसी भूल-भुलैयां में पड़ गये हो।
आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहे होंगे कि उस समय चीनी लोगों ने वहां सीधी खड़ी चट्टान पर मंदिर क्यों बनाया?तो इसका जवाब हम बताते है। इस मंदिर को बनाने के पीछे दो कारण थे। पहला यह था कि उस समय वो पहाड़ी घाटी यातायात और आवाजाही का एक प्रमुख मार्ग था। वहां से जब भिक्षु और धार्मिक अनुयायी गुजरते थे, तो मंदिर में आराधना कर सकते थे। दूसरा कारण यह था कि उस पहाड़ी घाटी में अक्सर बाढ़ आती थी। प्राचीन चीनी लोगों का मानना था कि ड्रैगन ही बाढ़ का प्रकोप मचाता हैं। यदि वहां एक मंदिर बनाया जाता है, तो ड्रैगन को वशीभूत किया जा सकता हैं। इस तरह यह मंदिर अस्तित्व में आया।