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दावा यांगज़ोम का नया जीवन
2012-12-19 20:17:18

अनाथ बाल बच्चों के बुनियादी जीवन को सुनिश्चित बनाने के लिये तिब्बत स्वायत्त प्रदेश ने 2011 से अनाथ बच्चों की बचाव प्रणाली की स्थापना शुरु की और लगातार भारी धन राशि लगाकर स्यायत्त प्रदेश के सभी अनाथ बाल बच्चों के लिये अनुकूल परवान वातावरण तैयार करने की कोशिश की, ताकि वे मातृभूमि इस महा परिवार की गर्मी महसूस कर सके ।

लोका प्रिफेक्चर का कल्याण संस्थान 2000 में स्थापित हुआ और वह तिब्बत के लोका प्रिफेक्टर में एक मात्र अनाथालय ही है, यहां पर होस्टल खेलकूद मैदान, भोजनालय और वाचनालय समेत सभी आधारभूत संस्थापन उपलब्ध हैं। वर्तमान इस अनाथालय में कुल 76 अनाज बच्चे रहते हैं। जब हमारे संवाददाता ने पहली बार इस अनाथालय में प्रविष्ट किया, तो ठीक लांच का समय है, बाल बच्चे स्कूल बस से वापस भी लौट आये। इसी वक्त हमारे संवाददाता की मुलाकात 16 वर्षीय दावा यांगज़ोम से हुई। उस के सिर पर दो चोटियां बांधी हई हैं और स्कूली वर्दी पहनी हुई है, उस के चेहरे पर खिली मुस्कान ने हमारे संवाददाता पर गहरी छाप छोड़ रखी है।

फिर हमारे संवाददाता दावा यांगज़ोम के साथ होस्टल गये, वह एक दूसरी लड़की के साथ एक करीब 20 वर्गमीटर वड़े कमरे में रहती है, यह कमरा बहुत साफ सुथरा और रोशनीदार है। कमरे में डेस्क, अलमारी, पलंग और रोजमर्रे में आने वाली तमाम वस्तुएं उपलब्ध हैं, दीवार पर दावा यांगज़ोम के कई मनपसंद चित्र व पोस्टर लगे हुए हैं, पलंग पर एक प्यारी सी गुड़िया भी रखी हुई है । यांगज़ोम दूसरे बच्चों की ही तरह किताब पढ़ना और संगीत सुनना पसंद भी करती है , यह चंचल व होशियार लड़की पढ़ने में तेज ही नहीं, क्लास में मनिटर का काम भी संभालती है। उस ने हमारे संवाददाताओं से कहा कि उस ने स्कूल में काफी ज्यादा बच्चों के साथ दोस्ती बनायी है, इस पर वह बहुत संतुष्ट है।

हमारे संवाददाता का ध्यान डेस्क पर रखे गये एक एलबम पर गया, एलबम में सुरक्षित फोटो इस अनाथालय में यांगज़ोम के जीवन का पूरा परिचायक हैं, यांगज़ोम पांच वर्ष की उम्र में लोका प्रिफेक्चर के कल्याण संस्थान में भरती हुई। उस ने एक फोटो की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह इस कल्याण संस्थान में आने के बाद यहां के सभी भाइयों व बहनों के साथ खिंचा गया पहला फोटो ही है, इस फोटो में लाल कपड़े पहनी यांगचुंग मुस्कराते हुए दिखाई देती है । उसने इस का परिचय देते हुए कहा:"यह फोटो शहीद पार्क में खिंचा गया है, उस समय मेरी उम्र सात वर्ष की थी, बहुत खुशी हुई।"

फिर यांगज़ोम ने इस फोटो के हरेक व्यक्ति का परिचय दिया, वह उन्हें भाई बहन और पापा ममी का संबोधन करती है, उस ने इसे सब से पसंदीदा फोटो कहा:"इस फोटो में प्यार और पारिवारिक माहौल भरा हुआ है, यहां पर पर्याप्त खाना और तरह तरह जरूरी वस्तुएं उपलब्ध हैं, नये कपड़े भी मिलते हैं, इतना ही नहीं, बहुत ज्यादा बहनें और कर्मचारी भी हैं।"

यांगज़ोम के पलंग पर एक गुड़िया भी सुसज्जित है, यह गुड़िया देखने में थोड़ा बहुत पुरानी लगती है, पर यांगचुंग इसे बेहद कीमती समझती है। क्योंकि यह अपने जन्म दिवस पर प्राप्त उपहार ही है। यांगज़ोम ने हमारे संवाददाता से कहा कि इस कल्याण संस्थान में आये हुए इतने ज्यादा वर्ष हो चुके हैं, पर अपना प्रथम जन्म दिवस सब से अविस्मरणीय है, उस के लिये यह सचमुच एक बड़ा सुखद आश्चर्य ही है। इसकी चर्चा में तिब्बती लड़की ने कहा:"एक दिन कल्याण संस्थान के प्रभारी पापा ने हम से लिंका मनाने बाहर जाने को कहा, कहां जाना है, हमें कुछ पता नहीं था, हम उन के साथ बस पर सवार होकर बाहर गये। पर वापस आने के बाद जब हम ने भोजनालय में कदम रखा, तो हमने देखा कि मेज पर एक बड़ा केक रखा हुआ है, साथ ही केक पर जन्म दिन पर मुबारकबाद हो वाला शब्द लिखा हुआ है। यह मैं ने पहली बार जन्म दिवस मनाया और पहली ही बार जन्म दिन का केक भी देखा। उस समय मुझे खुशी के मारे प्रभारी पापा के चेहरे पर मक्खन लगाने का पता न था, सिर्फ भावावेश में आकर पापा से बार बार आभार और शुक्रिया का शब्द कहा।"

अब यांगज़ोम और कल्याण संस्थान के बाल बच्चों को अकसर विभिन्न सामाजिक जगतों के व्यक्तियों की ओर से केक मिलते हैं। अपने जन्म दिन पर वे दूसरे बच्चों की ही तरह बहुत सुखी और प्रसन्न होते हैं। यांगज़ोम ने कहा:"इस नये साल के उपलक्ष में सैनिक चाचा ने हमें केक भेंट किया है, केक पर यहीं शब्द लिखा हुआ है, प्यारे भरा शब्द देखकर मैं फिर रो पड़ी।"

कल्याण संस्थान में आये हुए दस साल हो चुके हैं, यांगज़ोम कब से ही यहां के जीवन की आदी हो गयी है, कल्याण संस्थान में कार्यरत कर्मचारियों की देखभाल और इतने ज्यादा भाइयों व बहनों की मदद से यांगचुंग बहुत सुखद लगती है। इस बड़े परिवार की सदस्य होने के नाते वह अकसर गृहस्थ कामकाज करने में हाथ बटाती है। यांगज़ोम का कहना है:"कुछ लड़कों को काफ़ी आलसी होती है, हम अवकाश के समय उन के गंदे कपड़े धोने में मदद भी करती हैं, साथ ही शनिवार या रविवार के दिन हम खाना पकाने में हाथ भी बटाती हैं।"

एक वर्ष से पहले कल्याण संस्थान ने मां बाप द्वारा छोड़ी गयी एक बच्ची को गोद लिया। अब यह छोटी बच्ची लोगों की देखभाल में स्वस्थ रुप से परवान हो रही है, अब वह सारे कल्याण संस्थान की सब से लोकप्रिय बच्ची है, चाहे संस्थान के कर्मचारी हो या यहां के बाल बच्चे क्यों न हो, सब लोग उसे पकड़ने और खेलने में होड़ सी लगाते हैं, यहांतक कि उस का नाम भी सब लोगों ने साथ मिलकर रख दिया है, यांगज़ोम भी इस में शामिल हुई है। उस ने इस का परिचय देते हुए कहा:"आंटी ने कहा कि उस का कोई नाम नहीं है, इसलिये हम ने उसे पासांगलाम दे दिया, पासांग का अर्थ है शुक्रवार, लाम का मतलब परि ही है, यानी यह प्यारी बच्ची अपने मां बाप की नजर में परि नहीं है, पर हमारी बहनों की नजर में परि ही है, हमारा आंखों का तारा है। पहली बार किसी को नाम दिया है, बहुत अच्छा लगा है, मैं उससे बहुत प्यार करती हूं, उसे अब मेरा नाम बोलना आता है, दावा यांगजोम बोलो, दावा यांगजोम बोलो न।"

यह पूछे जाने पर कि क्या वह माता पिता के बच्चों पर ईर्ष्या करती है , तो उस ने जवाब देते हुए कहा:"पहले उन पर ईर्ष्या करती थी, मुझे याद है कि जब पहली बार प्राइमरी स्कूल में पढ़ने गयी, शाम को स्कूल के बाद क्लासरूम से वाहर निकली, तो देखा बहुत ज्यादा मां बाप अपने बच्चे के इंतजार में खड़े हुए थे, पर मेरी बहनों को कहीं पर नहीं देखा, मजबूर होकर वहां पर बैठ गयी, एक आंटी ने पास आकर मुझ से पूछा कि तुम्हारा पापा और ममी कहां गये है, यह सुनकर मैं एकदम रो पड़ी। फिर स्कूल के गेट के बाहर जा कर बहनों को देखा और उन से कहा कि आप लोगों के बिना घर वापस लौटना नहीं आता , यह बात कहने के बाद फिर रोने लगी।"

यांगजोम ने आगे चलकर कहा कि वह वर्तमान जीवन पर काफी संतुष्ट हे, कल्याण संस्थान अपना घर ही है।"मुझे इस संस्थान में आये हुए 11 साल हो गये हैं, यहां पर किसी चीज की कमी नहीं है, हम माता पिता के बच्चे की ही तरह बहुत सुखद जीवन बिता रहे हैं । यदि कभी कभार कोई दिक्कत होती है , तो बहुत ज्यादा भाई बहनें आंटी और संस्थान की प्रभारी मां मदद करने आते हैं, इतना ही नहीं, समाज के दूसरे चाचा और आंटी भी हमारी मदद करते हैं, मैंने कब से ही इस संस्थान को अपना घर समझ लिया है, हम माता पिता के बच्चों से कम नहीं है। जब हम बीमार पड़ते हैं, तो वे दिन रात तक हमारी देखभाल करने में लग जाते हैं , हमें कभी भी अकेलापन महसूस नहीं लगता, क्योंकि हमारे पीछे बहुत ज्यादा अच्छे भाई बहनें और मां बाप भी हैं।"

कल्याण संस्थान के कर्मचारियों को छोड़कर स्कूल के अध्यापक यांगजोम का बड़ा ख्याल भी रखते हैं। उसने कहा:"नम्बर एक मिडिल स्कूल की इतिहास अध्यापिका मुझ से बड़ा प्यार करती हैं, मुझे अपनी सगी बेटी समझती हैं, कभी कभार दूसरे लोगों से मुझे अपनी बेटी भी कहती हैं, मैं उन्हें स्वभावतः मां कहकर पुकारती हूं।"

यांगजोम ने हमारे संवाददाताओं से कहा कि ये स्कूली ममी अक्सर पढाई और जीवन में उसे मदद देती हैं, जिस से उसे असली मातृ प्रेम महसूस हो गया है।

दूसरे बहुत ज्यादा बच्चों की ही तरह यांगजोम का अपना सपना ही है , अब वह अपने सपने के लिये प्रयास कर रही है।"मैं चाहती हूं कि बाद में एक मनपसंद हाई स्कूल में भरती हो जाऊं, फिर विश्वविद्यालय में भरती होने का मौका होगा, क्योंकि मेरी मां किसी बीमारी से चल बसी है, मैं फौजी चिकित्सक बनना चाहती हूं, क्योंकि मैं फौजी चिकित्सकों को बहुत प्यार करती हूं। यदि फौजी चिकित्सक न बन पाऊं, तो एक लेखिका बनूंगी और इस मानव जाति की मर्मस्पर्शी कहानियों को अपनी कलम से कलमबंद कर लूंगी, ताकि सब लोग इस गरम दुनिया से परिचित हो सके।"

यांगजोम के साथ बातचीत में हमारे संवाददाताओं को गहन रुप से महसूस हुआ है कि यांगजोम इस कल्याण संस्थान की बड़ी आभारी है और कृतज्ञ भी है, साथ ही विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद अपने इरादे की चर्चा में कहा:"तिब्बत वापस लौटकर ल्हासा में नौकरी करना चाहती हूं। मैं यह कहना चाहती हूं कि मैं यहां के कर्मचारियों के प्रति आभार प्रकट करती हूं, आप लोगों ने हमारे लिये बड़ी महनत की है, हम अवश्य ही अच्छी तरह पढ़ेंगे और आप लोगों की आशा पर पानी फिरना नहीं देंगे।"

दावा यांगजोम तिब्बत के बेशुमार अनाथ बच्चों का एक मिनिएचर है, वर्तमान तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में कुल 5085 अनाथ बच्चे हैं। 2011 में तिब्बत में अनाथ बच्चे सहायता प्रणाली कामय हो गयी है, समूचे तिब्बत के अनाथ बच्चों को मूल जीवन गारंटी बोनस बांटा जाता है, जिस से इन अनाथ बच्चों के बुनियादी जीवन को सुनिश्चित कर दिया गया है, इन अनाथ बच्चों को जीवन बिताने और सीखने में कोई परेशानी होती है, तो संबंधित विभाग ठीस समय पर उन्हें मदद देते हैं। साथ ही त्यौहार के उपलक्ष में स्वायत्त प्रदेश के संबंधित विभाग उन के साथ खुशियां मनाते हैं, ताकि ये अनाथ बच्चे सब से अच्छी देखरेख प्राप्त कर सके और विभिन्न सामाजिक जगतों की देखभाल और मातृभूमि के प्यार को महसूस कर सके। मात्र 2012 में तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के वित्त ने अनाथ बच्चों के लिये तीन करोड़ 55 लाख 22 हजार य्वान से अधिक बोनस का बंदोबस्त कर दिया है, जो गत वर्ष से 49.5 प्रतिशत से अधिक है। अनाथ बच्चों मूल मासिक भत्ते में भी बड़ी बढोत्तरी हुई है।

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