Web  hindi.cri.cn
तिब्बती नेत्रहीन बाल बच्चों का किरण
2012-07-08 19:16:35

तिब्बत का आसमान इतना नीला दिखाई देता है, मानो उसने एक विशाल नीले चाटर की तरह तिब्बत इस रहस्यमय भूमि को अपनी चपेट में ले लिया हो। तिब्बत के बादल इतने सफेद हैं कि वे बेशुमार बड़े बड़े रुईदार गुच्छों की तरह आकाश पर लटके हुए जान पड़ते हो, कभी एक साथ जम जाते हैं, कभी अलग होकर बिखरे हुए हैं, कभी बर्फीले पर्वतों में विलीन हो जाते हैं, कभी घास मैदानों पर गिर जाते हैं। वह स्वच्छ सफेद हाता की तरह मंगल लिये आसमान से सब से नजदीक स्थल पर बिखर जाता हो। तिब्बत के पर्वत रंगिले हैं, स्वच्छ सफेद बर्फीले पर्वत पवित्र व निर्मल हैं। वीरान गंजे पर्वत अदम्य दिखाई देते हैं, जबकि हरे भरे पर्वत औजस्वी नजर आते हैं। बाज आकाश पर मंडराते हुए दीखते हैं और गीत की ऊंची आवाज आकाश पर गूंज रही है।

यह सच है, तिब्बत के चमकीले रंग अविस्मरणीय हैं और तिब्बत का सौंदर्य भूलाया नहीं जा सकता । लेकिन इसी खूबसूरत स्थल में बसे कुछ व्यक्ति आंखों की दृष्टि से वंचित होकर यहां के चकाचौंध रंग नहीं देख पाते हैं। तिब्बत में तेज धूप से स्थानीय लोगों की आंखों को भारी नुकसान हो गया है। गत सदी के 90 वाले दशक के अंत में 24 लाख तिब्बती आबादियों में करीब दस हजार से ज्यादा लोग आंख के रोगों से ग्रस्त थे।

23 वर्ष की लड़की किला तिब्बत के शिकाजे प्रिफेक्चर की लाज़ कांऊटी के लाज़ कस्बे में रहती है। वह बचपन से ही अत्यंत दुर्भाग्यवश थी। उस की दोनों आंखें काफी कमजोर हैं, साथ ही परिवार में दो जुड़वां भाई और अपना पापा भी आंख के रोग से पीड़ित हैं, गांववासी अकसर उन्हें चार अंधे कहलाते थे, कुछ गांवबंधु उन्हें नेत्रहीन लोग भी कहते थे। उस समय किला बहुत छोटी थी , पर वह यह बात सुनकर अत्यंत दूखी थी। तिब्बती लड़की किला ने कहा:

"हमारे परिवार में इतने ज्यादा नेत्रहीन लोग हैं , गांव में हम बेहद दबे हुए हैं। मेरी बड़ी बहन की आंखे स्वस्थ हैं, पर वह अपनी 18 उम्र में घर को छोड़कर चली गयी है, आज तक भी वापस नहीं लौटी, क्योंकि उसे चार नेत्रहीन घर वालों का सामना करने की हिम्मत नहीं है। मां बाप को इस बात से डर है कि दूसरे बच्चे हम तीनों भाई बहन के साथ बदमाशी करें, अतः हमें घर से बाहर जाने और दूसरे बच्चे के साथ खेल क्रिड़ा करने की इजाजत नहीं देते, हम बिलकुल खुश नहीं थे।"

1999 में तिब्बत का प्रथम नेत्रहीन स्कूल ल्हासा शहर के चांगसू रोड पर स्थित एक तिब्बती आंगन में स्थापित हुआ, इस स्कूल की संस्थापक जर्मनी से आयी नेत्रहीन लड़की सापरिया ही है। हजारों किलोमीटर की दूरी से आयी सापरिया इसी तिब्बती आंगन में दसेक साल तक रहती है। वह अपने पति की मदद में तिब्बत के नेत्रहीन बच्चों के शिक्षा कार्य में संलग्न रही है। उन्होंने तिब्बत में रोशनी से वंचित बाल बच्चों को पहली ही बार अपने आप को पहचानने, उज्जवल भविष्य की कल्पना करने और रंगीला जीवन को छूने का मार्गदर्शन कर दिया है, साथ ही तिब्बती ब्रेल लिपि का आविष्कार किया और ब्रोमिशुस की तरह तिब्बत के तमाम नेत्रहीन बच्चों के लिये रोशनी लायी है।

सापरिया ने कहा:

"काफी ज्यादा लोगों का मानना है कि नेत्रहीनों की दुनिया अंधरी है , पर मौजूदा तथ्यों से उन की रंगीन दुनिया को साबित कर दिखाया गया है। छे कांग जैसे मित्रों और तिब्बती सांस्कृतिक सम्पर्क संघ व विकलांग संघ के संबंधित विभागों के नेताओं की अभिरुचि से हमारा यह स्कूल धीरे-धीरे नामी हो गया है, हम सब लोगों के आभारी हैं और उन का स्वागत करते हैं कि वे और अधिक नेत्रहीन जीवन को समझने हमारे स्कूल में पधारें।"

तिब्बती नेत्रहीन स्कूल में प्रविष्ट होते ही हम ने देखा है कि होशियार व प्यारे तिब्बती नेत्रहीन बच्चे सुहावना मौसम में बड़े मजे के साथ क्रिड़ा कर रहे थे, यहां तक कि कुछ बच्चे अपनी मर्जी से दौड़ते हुए खेल रहे थे। लेकिन शुरु में काफी ज्यादा बच्चे बहुत शर्मींदा थे और दूसरे से बातचीत करना नहीं चाहते। इन बच्चों के अभिभावक भी इस बात पर शंकित हैं कि उन के बच्चे यहां पर ज्यादा चीजें न सीख पाएं। पर समय बीतने के साथ साथ इन बच्चोंने धीरे धीरे कुछ ज्ञानों व कौशलों पर महारत हासिल किया है। जब कोई व्यक्ति उन्हें बुद्धू कहकर गाली देता है, तो वे हंसकर जवाब देते हैं कि मैं बुद्धू नहीं हूं, बस, सिर्फ आंखों की रोशनी चली गयी है, या दो टूक अंदाज में जवाब देते हैं कि मैं अंधरे में किताब पढ़ सकता हूं, क्या आप ऐसा कर सकते हैं, वे कभी कभी बड़े गर्व के साथ इस का जवाब देते हुए भी कहते हैं कि क्या आप को हान भाषा व अंग्रेजी भाषा आती है, कंम्युटर आता है।

तिब्बती नेत्रहीन स्कूल की स्थापना के समय छात्रों की संख्या बहुत कम थी, ल्हासा शहर में नौकरी करने वाली किला की बुआ ने खबर पाकर तुरंत ही किला के घरवालों को सूचित किया, इसी प्रकार किला अपने दोनों भाइयों के साथ पढने नेत्रहीन स्कूल में आयी। जब गांववासियों ने सुना कि इस नेत्रहीन स्कूल में छात्र पढ़ने की फीस से मुक्त हैं, तो कुछ लोगों को इस पर थोड़ा बहुत ईर्ष्या थी, पर अधिकतर लोगों को विश्वास नहीं था कि नेत्रहीन लोग स्कूल में पढ़ने लायक थे। लेकिन कई साल के बाद इसी नेत्रहीन स्कूल में किला ने कठिन परिश्रम के बाद अंग्रेजी, हान और तिब्बती भाषाओं पर महारत हासल किया ही नहीं, बल्कि वह अपने गांव में एक ऐसा मात्र व्यक्ति बन गयी है कि अंग्रेजी भाषा से विदेशी मेहमानों के साथ बातचीत करने में सक्षम है। अब किला तिब्बती नेत्रहीन स्कूल के प्रबंधकों में से एक बन गयी है, साथ ही वह अंग्रेजी भाषा व प्रबंधन अनुभव सीखने के लिये अमरीका, ब्रिटेन और भारत भी गयी थी। इस से पहले अपने गांव में विदेश जाने वाला कोई न था। किला बडे गर्व के साथ कहा:

"पहली बार विदेश जाने के लिये मैं पासपोर्ट के लिये लाच काऊंटी के सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो गयी, वहां के कर्मचारियों को विश्वास नहीं है कि मैं खुद विदेश जाने लायक हूं, उन्हें शंका है कि एक नेत्रहीन विदेश कैसे जाए। जब मैंने विदेश जाने का निमंत्रण पत्र दिखाया, तो उन्हें विश्वास हो गया है कि मैं सचमुच विदेश जाने के लिये पासपोर्ट बनवाने आयी।"

नेत्रहीन बच्चों का ख्याल रखने वाले लोगों की संख्या बढ़ने के साथ साथ तिब्बती नेत्रहीन स्कूल भी दिन ब दिन विस्तृत हो गया है, शुरु में 6 छात्र बढ़कर अब 70 से अधिक हो गये हैं। प्रथम खेप के नेत्रहीन छात्र निश्चित कौशल पर महारत हासिल कर अपने पद संभालने में सक्षम हो गये है और सुखी जीवन भी बिताते हैं।

तिब्बती नेत्रहीन स्कूल की प्रथम खेप के स्नातक तानचंग ने पत्रकार से कहा:

"मेरे ख्याल से हमें सिर्फ अपने स्कूल की सेवा करना नहीं चाहिचे, क्योंकि यह बहुत संकीर्ण है। हमारे अध्यापकों ने हमें यह शिक्षा दी है कि कृतज्ञ दिल से समाज की सेवा करना चाहिये। अब मैंने अपना मालिश केंद्र स्थापित किया है, मैं अपने घरवालों की अच्छी तरह देखभाल करने के अलावा उन लोगों, जिन्हें मदद देने की जरूरत हैं, को सहायता देने को तैयार हूं।"

तिब्बती नेत्रहीन स्कूल तिब्बत के स्थानीय नेत्रहीन बच्चों को ही नहीं, छिंगहाई, सछ्वान और काननान आदि तिब्बती क्षेत्रों के नेत्रहीन बच्चों को भरती करता है, उन्होंने यहां पर उज्जवल भविष्य और नया जीवन भी प्राप्त कर लिया है।

25 वर्षीय चाशी सछ्वान प्रांत के लू तिन रहने वाला है, 2000 में एक बुद्धि मां उसे इस तिब्बती नेत्रहीन स्कूल में ले आयी। वह अपने बचपन का उल्लेख करना कभी भी नहीं चाहता। बात यह है कि जब उसे अपनी कम उम्र में ही ल्हासा में व्यापार करने वाले पड़ोसी ल्हासा ले आया, पर उस ने चाशी को कोई कौशल सीखाने के बजाये उस के अंधपन का बेजा फायदा उठाकर सड़क पर भीख मांगने दिया और अकसर उस की मारपीट की। बाद में एक तिब्बती बुद्धि मां की मदद में वह नये स्थापित तिब्बती नेत्रहीन स्कूल में आ गया। 2005 में वह इस स्कूल में तिब्बती नेत्रहीन मालिश केंद्र में काम करने लगा, फिर 2010 में वह ट्रेनिंग लेने के लिये पेइचिंग गया, अब उसने मध्यम स्तरीय मालिश सर्टिफिकेट प्राप्त कर मित्रों के साथ तानचंग मालिश केंद्र की स्थापना की। चाशी ने हमारे संवाददाता से कहा:

"मैं एक नेत्रहीन हूं, मुझे अपने स्कूल को छोड़कर और बहुत ज्यादा लोगों से प्यार भी मिला है, मैं सौभाग्यशाली हूं, मैं बडे प्यार से जीवन बिताने और यह प्यार उन लोगों, जिन की देखभाल करने की जरूरत है, को देने को संकल्पबद्ध हूं।"

नेत्रहीन स्कूल में छात्रों की उम्र 4 से लेकर 17 और 18 साल तक की है। कई कम उम्र वाले बाल बच्चों के अलावा अधिकतर बच्चों को पढ़ना , लिखना और टाइपराइटर और कंम्युटर का प्रयोग करना आता है, कुछ छात्र बड़ी कुशलता से हान, तिब्बती और अंग्रेजी भाषाओं में बातचीत करने में सक्षम भी हैं । इस स्कूल में नेत्रहीन छात्रों को न सिर्फ प्रारम्भिक शिक्षा और मूल जीवन कौशल सीखाया जाता है, बल्कि मालिश, संगीत, जादू और शिल्प व बुनाई जैसे व्यावसायिक ट्रेनिंग भी दी जाती है। इसलिये यहां के बच्चे अपने भविष्य पर आश्वस्त हैं। वे अपने तौर तरीकों से रोशनी और उज्जवल भविष्य प्राप्त करने में कृतज्ञ हैं।

संदर्भ आलेख
आप की राय लिखें
सूचनापट्ट
• वेबसाइट का नया संस्करण आएगा
• ऑनलाइन खेल :रेलगाड़ी से ल्हासा तक यात्रा
• दस सर्वश्रेष्ठ श्रोता क्लबों का चयन
विस्तृत>>
श्रोता क्लब
• विशेष पुरस्कार विजेता की चीन यात्रा (दूसरा भाग)
विस्तृत>>
मत सर्वेक्षण
निम्न लिखित भारतीय नृत्यों में से आप को कौन कौन सा पसंद है?
कत्थक
मणिपुरी
भरत नाट्यम
ओड़िसी
लोक नृत्य
बॉलिवूड डांस


  
Stop Play
© China Radio International.CRI. All Rights Reserved.
16A Shijingshan Road, Beijing, China. 100040