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भीतरी इलाके में तिब्बतियों के उत्प्रवास से हुआ तिब्बत का विकास
2012-04-19 18:40:07

मानव जाति के इतिहास में हर सभ्यता और प्रत्येक जाति का विकास केवल सामाजिक व सांस्कृतिक ही नहीं है, बल्कि विकसित काल में यह विकास पड़ोसी जातियों व उनकी सभ्यताओं के साथ घनिष्ठ आदान प्रदान व आवाजाही से हुआ, जो अपने विकास के आधार की पूर्व शर्त भी बना। लेकिन विभिन्न जातियों व संस्कृतियों के बीच आवाजाही व संपर्क की चर्चा के वक्त लोग कभी कभार मानव जाति के उत्प्रवास पर कम ध्यान देते हैं। वास्तव में मानव जाति की विभिन्न संस्कृतियों के बीच आदान प्रदान व संपर्क की पूर्व शर्त लोगों के बीच संपर्क व आवाजाही ही है। तिब्बती जातीय क्षेत्र के इतिहास को देखा जाए, जो चीन के भीतरी इलाके में तिब्बतियों के उत्प्रवास के तीन ऐतिहासिक काल सबसे उल्लेखनीय हैं, जिनमें शामिल व्यक्तियों की संख्या सबसे ज्यादा थी।

पहला, तो ईंसवी 7वीं से 9वीं शताब्दी तक थूपो वंश का काल था। उस वक्त चीन के भीतरी इलाके में थांग राजवंश का शासन था। थूपो वंश भीतरी इलाके तक मानविकी आवाजाही में मुख्यतः सैनिक, राजनयिक दूत, सैनिकों का पुनर्वास और गैर सरकारी आवाजाही आदि शामिल थे। थूपो वंश के दो सौ साल वाले इतिहास में वह आज के तिब्बत प्रदेश के पूर्व की ओर भूमि विस्तार था, यह भूमि अधिकांश थांग राजवंश का प्रशासनिक क्षेत्र था। इस तरह थूपो सैनिकों के भीतरी इलाके तक आ बसना तत्काल में सबसे बड़ा उत्प्रवास था।

इसके अलावा, चीन के भीतरी इलाके के क्षेत्रों में थूपो वासियों के उत्प्रवास में बड़ी संख्या में थूपो वंश के राजनयिक दूत शामिल थे। आंकड़ों से पता चलता कि अखिल थूपो वंश के काल में उस और थांग राजवंश के बीच कुल 290 बार राजनियक दूतों का आदान प्रदान किया गया। हर बार थूपो थांग राजवंश को 50 से 60 दूत भेजता था। अगर इस संख्या को औसतन 50 से गुणा किया जाय, तो थूपो द्वारा थांग राजवंश को 180 से अधिक बार दूत भेजे गए, इस तरह कुल नौ हज़ार से ज्यादा राजनयिक दूत भेजे गए। इन दूतों में अधिकांश लोग विभिन्न कारणों से लम्बे समय तक तत्कालीन थांग राजवंश की राजधानी छांग आन में ठहरते थे। सरकारी दूतों के अलावा छांगआन में गैर सरकारी व्यक्तियों का उत्प्रवास भी अधिक था।

दूसरा है, ईंसवीं बाद 13वीं से 14वीं शताब्दी तक का युआन राजवंश। यह काल थूपो वंश के लोगों की भीतरी इलाके में उत्प्रवास का दूसरा अहम काल था। युआन राजवंश के शासक आम तौर पर तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, इस तरह तिब्बती भिक्षुओं का युआन राजवंश के शाही परिवार के सदस्य द्वारा स्वागत किया जाता था, यहां तक कि तिब्बती बौद्ध धार्मिक भिक्षुओं के युआन राजवंश के शाही गुरू बनने की प्रणाली कायम हुई थी। इसी कारण से बड़ी संख्या में तिब्बती बौद्ध धार्मिक भिक्षु युआन राजवंश की राजधानी तातू यानी आज के पेइचिंग में आप्रवासित होने लगे। लम्बे अर्से में ये भिक्षु लोग युआन राजवंश के शाही परिवार के सदस्यों के साथ विशेष राजनीतिक अधिकार का उपभोग करते थे और एक विशेष जगत बन चुका था।

तीसरा है, ईंसवीं बाद 14वीं से 17वीं शताब्दी तक का मिंग राजवंश। यह युआन राजवंश के बाद तत्कालीन तिब्बती लोगों के भीतरी इलाके में उत्प्रवास का तीसरा महत्वपूर्ण काल था, जो युआन राजवंश की दो बड़ी विशेषताएं थी। पहली विशेषता है कि उत्प्रवास के दायरे का और विस्तार। उस समय भीतरी इलाके में आप्रवासित होने वाले तिब्बतियों में न सिर्फ़ आज के तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के लोग थे, बल्कि अखिल तिब्बती बहुल क्षेत्र के तिब्बती भी शामिल थे। इसके साथ ही, भीतरी इलाके में आ बसने वाले तिब्बतियों में भिक्षुओं के अलावा तिब्बती बहुल क्षेत्र के विभिन्न स्थलों के स्थानीय प्रमुख भी शामिल थे। दूसरी विशेषता है कि तिब्बतियों की उत्प्रवास की संख्या व पैमाना और व्यापक था।

मिंग राजवंश में अपनाई गई तिब्बत नीति में विभिन्न तिब्बती बहुल क्षेत्रों में प्रमुख नियुक्त करना, नियुक्त किए जाने वाले प्रमुखों के नियमित समय पर राजधानी आना और केंद्र सरकार को उपहार देना आदि शामिल था। केंद्र सरकार को उपहार देने वाले तिब्बती बहुल क्षेत्रों के प्रमुखों को युआन राजवंश के राजा ज्यादा तोहफ़े वापस देते थे। इस तरह सरकार की इस प्रकार की नीति से अधिकतर तिब्बती बहुल क्षेत्रों के भिक्षु व प्रमुख आकृष्ट हुए, इस वजह से मिंग राजवंश के काल में तिब्बती बहुल क्षेत्रों के लोग राजधानी आते थे।

विश्लेषण के बाद हमें पता चलता है कि उक्त तीन कालों में स्पष्ट समानताएं मौजूद थीं। यानी ये तीन काल छिंगहाई तिब्बत पठार में सामाजिक एकीकरण व जोरदार विकास के महत्वपूर्ण काल थे। थूपो वंश के काल में छिंगहाई तिब्बत पठार में पहली बार एकीकरण हुआ, यह तिब्बती जाति की सामुदायिक संस्कृति कायम रहने का अहम ऐतिहासक काल था।

युआन राजवंश तिब्बत समाज के विकास का महत्वपूर्ण दौर भी था। उसी समय तिब्बत समाज का पुनर्गठन कर भारी विकास हुआ। युआन राजवंश में केंद्र सरकार तिब्बत के सागा प्रशासन का समर्थन करती थी, जिससे थूपो वंस के बाद वहां लगातार 400 सालों तक जारी रही विभाजित परिस्थिति बंद हुई थी। विशेषकर तिब्बती बौद्ध धर्म का सागा संप्रदायों का स्थान युआन राजवंश के समर्थन से तेज़ी से उन्नत हो रहा था, इसके साथ ही तिब्बत के विभिन्न धार्मिक संप्रदाय अपने हितों व राजनीतिक स्थान की उन्नति के लिए केंद्र सरकार से नज़दीकी करने लगे। इस तरह उस समय तिब्बत और भीतरी इलाके के बीच राजनितिक संबंध कायम हुआ, जो केंद्र सरकार तिब्बत का शासन करती थी। तब तिब्बत में धार्मिक संप्रदायों की समुदाय वाला राजनीतिक प्रशासनिक ढांचा स्थापित हुआ।

मिंग और छिंग राजवंशों के कालों में तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग संप्रदाय की शक्ति तेज़ी से बढ़ा और इसकी प्रधानता वाली तिब्बती बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार मंगोलियाई क्षेत्र तक बड़े पैमाने तौर पर किया जा रहा था और धीरे धीरे मंगोलियाई समाज में प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। उसके और मंगोलिया के समर्थन वाले पांचवें दलाई लामा ने तिब्बत में एक एकीकरण प्रशासन यानी कानतान फोचांग सत्ता स्थापित की और तिब्बत की स्थानीय राजनीतिक प्रक्रिया एक नए काल में प्रवेश कर गई। इसके साथ-साथ तिब्बत के विभिन्न स्थलों के धार्मिक व गैर-धार्मिक प्रमुखों ने बड़े पैमाने वाले उपहार-दान मंडल भीतरी इलाके तक भेजते थे। वे तिब्बती क्षेत्र व मिंग राजवंश की राजधानी के बीच आते जाते थे और भीतरी इलाके से बड़ी मात्रा में धन राशि व संपत्ति वापस लाते थे, जिससे तिब्बत के धार्मिक संप्रदाय व मठ गुटों की आर्थिक शक्ति बढ़ी, और गेलुग संप्रदाय के विकास को फायदा मिला। साथ ही इस उपहार दान मंडल के आने जाने से 17वीं शताब्दी में तिब्बत में गेलुग संप्रदाय के प्रशासन वाले कानतान फोचान सत्ता की स्थापना के लिए आर्थिक व सामाजिक बुनियाद तैयार हुई।

इतिहास में भीतरी इलाके में तिब्बतियों की उत्प्रवास और तिब्बत के ऐतिहासिक विकास के बीच घनिष्ठ संबंध है। ऐसा कहा जा सकता है कि तिब्बत के इतिहास में हरेक बड़ा विकसित काल और सामाजिक एकीकरण तिब्बतियों की भीतरी इलाके तक उत्प्रवास से अलग नहीं किए जा सकते। हालांकि प्रत्येक काल में तिब्बतियों की भीतरी इलाके में उत्प्रवास के ठोस कारण, पृष्ठभूमि, मकदस व लक्ष्य अलग-अलग थे, लेकिन इनमें एक बड़ी समानता है कि भीतरी इलाके में तिब्बतियों की हरेक उत्प्रवास के दौरान तिब्बत के सामाजिक विकास में नई जीवन शक्ति का संचार हुआ।

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