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चीनी मेटरो की कहानी
2011-05-06 14:27:18
दोस्तो, आप भारत में दिल्ली में हाल ही में बनी मेटरो के बारे में तो जानते ही होंगे,शहर में मेटरो यातायात को कितना आसान बना देती है,यह आप कभी मेटरो में यात्रा करके देंखें।बस या कार में यात्रा करने से कभी ट्रैफिक की भीड़ के कारण या कभी लाल बत्ती के कारण दस किलोमीटर के सफर के लिए भी घंटा लग जाता है,किंतु मेटरो में ट्रैफिक जाम या लाल बत्ती का कोई झंझंट नहीं रहता और दस किलोमीटर का सफर पलक झपकते ही पूरा हो जाता है।आधुनिक युग में मेटरो शहरों में लोगों के लिए अत्याधुनिक सुविधाजनक यातायात का साधन है। चीन में मेटरो की क्या स्थिति है,यह जानने के लिए आज हम चीन में मेटरो के बनने के रोचक इतिहास के बारे में बात करेंगे। पहली बात तो यह कि चीन में मेटरो को सबबे कहा जाता है जबकि ब्रिटेन में अंडरग्राऊंड और भारत में मेटरो।

चीन के बीजिंग में आज से 48 साल पहले सन 1953 में सब से पहली मेटरो की योजना जब योजना बनाई गई तब वह मुख्य रुप से युद्ध के समय आसरा लेने के लिए एक सुरंग के रुप में बनाई गई थी। तब दुनिया शीत युद्ध की चपेट में थी,सारा संसार दो गुटों में बंटा हुआ दिखाई पड़ता था। पूंजीवादी अमरीका को कम्युनिस्ट शब्द से वैसी ही चिढ़ थी,जैसी बैल को लाल कपड़े से होती है। इसलिए सोवियत युनियन और अमरीका एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुझाते थे। ऐसे युग में कम्युनिस्ट चीनी लोक गणराज्य यदि युद्ध का खतरा महसूस करता था तो वह स्वाभाविक ही था।

इसलिए उस समय बीजिंग के सरकारी अधिकारियों का विचार था कि शहर में मेटरो बनाना फालतू का काम है। जैसाकि प्रधानमंत्री चो एन लाई ने कहा था कि बीजिंग में मेटरो का निर्माण केवल युद्ध की स्थिति में जरुरत के लिए है। यदि सार्वजिनक परिवहन को सुविधाजनक बनाना है तो यह जरुरत शहर में 200 बसें चला कर पूरी की जा सकती है। आज जब आप बीजिंग में मेटरो का विशाल नेटवर्क देखते हैं तो उस समय की कल्पना करना भी मुश्किल लगता है।वह भिन्न समय था,बीजिंग की कुल आबादी मात्र 30 लाख थी,और शहर में कारों की कुल संख्या पांच हजार के आसपास थी और लोग या तो पैदल आते-जाते दिखाई पड़ते थे,या साईकलों पर या इधर-उधर रिक्शों में.बसें भी बहुत कम थीं। चीनी लोक गणराज्य की नई बनी सरकार के लिए मेटरो में निवेश करना और उस के लिए विशेषज्ञों की तलाश करना भी बहुत कठिन काम था।

लेकिन चीन सरकार आखिकार जब सुरक्षा के लिए ही सही,मेटरो बनाने के लिए तैयार हो गई तो इस क्षेत्र में विशेषज्ञों की जरुरत के लिए उस ने पड़ोसी देश सोवियत युनियन की तरफ देखा,क्यों कि कम्युनिस्ट सोवियत उस समय तक शहर में मेटरो का नेटवर्क स्थापित कर चुका था जो यातायात के लिए और युद्ध की स्थिति में आसरे के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता था।

अंततः सन 1956 में सोवियत युनियन से पांच मेटरो विशेषज्ञ बीजिंग पहुंचे। ये पांच विशेषज्ञ सन 1931 में मास्को में बनी मेटरो के विशेषज्ञ थे। चीन ने सन 1953 से 1960 के बीच हजारों चीनी विद्यार्थियों को सोवियत युनियन भी भेजा ताकि वे वहां जमीन के नीचे बनने वाली रेल की योजना,रुपरेखा,तकनीक,और विशेषज्ञता हासिल कर वापिस आ कर देश में मेटरो के निर्माण में योगदान दे सकें।

शुरु में सोवियत विशेषज्ञों और बीजिंग शहर के अधिकारियों में बीजिंग में बनने वाली प्रस्तावित मेटरो के रुट को ले कर सहमति नहीं बन पाई। किंतु अंत में बीजिंग शहर के अधिकारियों ने सोवियत विशेषज्ञों के आगे हथियार डाल दिए और उन के द्वारा प्रस्तावित रुट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया,और इस प्रकार पहली मेटरो के तीन स्टेशन शचिंगशान,फुशिंगमन और बीजिंग रेलवे स्टेशन पर सहमित बनी।इस के बाद मेटरो की सुरंग की जमीन के नीचे गहराई कितनी हो,इस को ले कर भी दोनों पक्षों में असहमति हो गई।यातायात के सामने युद्ध की स्थिति में सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए बीजिंग अधिकारियों का मत था कि जमीन के नीचे सुरंग की गहराई 60 मीटर होनी चाहिए,जबकि सोवियत विशेषज्ञों का मानना थी कि यह गहराई 5 मीटर से 12 मीटर तक होनी चाहिए।अंततः बीजिंग अधिकारियों को सोवियत विशेषज्ञों की बात माननी पडी,इसलिए नहीं कि सोवियत विशेषज्ञों की राय से वे सहमत हो गए बल्कि इसलिए कि मेटरो की सुंरग को कुकुंग यानि फारबिडन सिटी के नीचे भी बनना था जहां की भौगोलिक-स्थिति इस से अधिक जमीन में गहरे जाने की इजाजत नहीं देती थी।

1960 के मध्य तक सोवियत युनियन और चीन के संबंधों में खटास पैदा हो गई,फलतः मेटरो के निर्माण के लिए आए हजारों सोवियत सहायक कर्मी वापिस चले गए।और कंगाली में आटा गीला होने वाली कहावत भी चीन में लगातार पैदा हुईं प्राकृतिक विपदाओं के कारण और चीन की आर्थिक हालत खस्ता होने के कारण सच होती जान पड़ी।

पैसे की कमी और विदेशी तकनीकी सहायता के अभाव में विदेश से तकनीकी ज्ञान हासिल कर वापिस आए नए स्नातकों ने मेटरो निर्माण की योजना को ज़िंदा रखने का संकल्प बनाए रखा।जैसे जैसे चीन की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार दिखाई पड़ा,मेटरो निर्माण की योजना को पूरा करने की रफ्तार भी तेज हो गई।फरवरी 1965 में चेअरमैन माओ त्स तुंग ने मेटरो निर्माण को फिर शुरु करने के लिए हरी झंडी दिखाई । उस साल जून के अंत में बीजिंग में मेटरो के पहले फेज की शुरुआत पश्चिमी बीजिंग में यु छवान लू में कुदाली चला कर शुरु हुई।इस समारोह में सभी बड़े राजनीतिक नेता उपस्थित हुए लेकिन सुरक्षा और गोपनीयता के कारण इस समारोह की कोई भी खबर किसी भी अखबार में प्रकाशित नहीं हुई। सुरंग खोदने का काम शुरु होते ही काम फिर रुक गया,क्योंकि सुरंग के डिजाईन में महत्वपूर्ण कमी दिखाई पड़ी। इसलिए 30,000 रुपरेखाएं ड्राईंग टेबल पर वापिस भेज दी गईं और तीन माह तक काम रुका रहा।

हालांकि बीजिंग की पहली मेटरो का काम गोपनीय रखा गया था लेकिन पश्चिमी बीजिंग में व्यस्त यातायात और बड़े-बड़े पेड़ों की मेटरो के लिए बलि दिए जाने के कारण यह इतना गोपनीय भी नहीं रहा। 1 अक्तूबर 1969 को ठीक उस समय जब चीनी लोक गणराज्य की बीसंवी वर्षगांठ मनाने का दिन आया,बीजिंग की पहली मेटरो भी चलने के लिए तैयार हो गई।पहली मेटरो कूछंग स्टेशन से उसी दिन पहली बार रवाना हुई जिस के पहले मुख्य यात्रियों में प्रधानमंत्री चो एन लाई और चीनी लोक गणराज्य की स्थापना में योगदान देने वालीं कुछ महत्वपूर्ण हस्तियां शामिल थीं।

बीजिंग मेटरो पर्यटकों का मुख्य आकर्षण बन गया,लोग झुंडो में आ-आ कर संगमरमर के बने फर्श,विशाल स्तंभ और प्रकाश व्यवस्था को देख कर चकाचौंध हो जाते।

लेकिन मेटरो सुरक्षा के सवाल और ट्रेन की समय पाबंदी ने काफी लंबे समय कर अधिकारियों की आंखों की नींद गायब रखी। मेटरो के शुरु होने के कुछ ही महिनों बाद बिजली की तारों में शार्ट सर्किट के कारण लगी भयानक आग ने तीन लोगों की जान ले ली और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए।

10 साल तक प्रयोग करते रहने के बाद अधिकांश तकनीकी खराबियों को दुरुस्त करने में सफलता मिली। सन 1981 में पहली मेटरो के प्रस्तावित किए जाने के 32 साल बाद बीजिंग की पहली मेटरो अंततः पूरी तरह काम में आनी शुरु हुई।

आज बीजिंग में जमीन के नीचे मेटरो का जाल बिछा हुआ है,जो रोजाना लाखों यात्रियों को शहर में यहां से वहां ले जाने में सुबह से शाम तक व्यस्त रहता है।बीजिंग में मेटरो की कुल लम्बाई 336 किलोमीटर है,जो दुनिया में शांगहाई मेटरो के बाद पहले नम्बर पर है।शांगहाई में मेटरो की लंबाई 424.8 किलोमीटर है।बीजिंग में बढ़ती आबादी और यातायात के कारण सन 2007 से हर साल दो नई मेटरो लाईनें बन रही हैं।

बीजिंग में मेटरो बनने के बाद चीन के बाकी शहरों को भी मेटरो की सुविधा उपलब्ध हुई है। चीन में इस साल यानिकि 2011 तक तेरह शहरों में मेटरो की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी,और सन 2014 तक चौदह और शहरों का नाम इस सूची में जुड़ जाएगा।

चीन में मेटरो के विशाल नेटवर्क के अलावा दुनिया की सब से तेज गति की रफ्तार की रेलवे का निर्माण भी किया जा चुका है।जल्द ही बीजिंग से शांगहाई तक तेज गति की रेलवे शुरु होने वाली है,जिस से बीजिंग से शांगहाई तक मात्र पांच घंटे में पहुंचा जा सकेगा।

दोस्तो,यह थी चीन में मेटरो बनने की कहानी।

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