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चीन और भारत के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग का व्यापक भविष्य
2013-05-20 18:29:52


चीन और भारत दोनों बड़ी आबादी वाले देश होने के साथ साथ विकासशील देश भी है। वर्ष 2008 में वैश्विक आर्थिक संकट के बाद के कम समय में नवोदित आर्थिक समुदाय के रूप में चीन और भारत की आर्थिक वृद्धि बहुत तेजी से बहाल हुई, जिससे वे विश्व की आर्थिक वृद्धि को आगे बढाने की प्रमुख शक्ति बन गए। दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक आदान-प्रदान और सहयोग दिन प्रति दिन घनिष्ठ हो रहा हैं।

चीन और भारत के बीच आर्थिक और व्यापारिक आवाजाही का पुराना इतिहास है। दोनों प्राचीन सभ्यता वाले देश है और आपसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान के साथ साथ आर्थिक और व्यापारिक आवाजाही भी की जा रही है। नए चीन की स्थापना के बाद चीन और भारत की पुरानी पीढ़ी के नेताओं ने सहयोग के बेहतर आधार की स्थापना की थी। चीन में सुधार और खुलेपन की नीति लागू किए जाने के बाद अर्थतंत्र के भूमंडलीकरण, नई तकनीकी क्रांति और औद्योगिक क्रांति की पृष्ठभूमि में अर्थतंत्र और व्यापार समेत विभिन्न क्षेत्रों में चीन और भारत के बीच आदान-प्रदान तेजी से बढ़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार इस शताब्दी की शुरूआत के दस वर्षों में हर वर्ष चीन और भारत के बीच व्यापार की वृद्धि दर 37 प्रतिशत तक जा पहुंची हैं। इसी अवधि में चीन के वैदेशिक व्यापार की वृद्धि दर सिर्फ 22 प्रतिशत तक रही। विशेषकर इधर के 3 वर्षों में चीन और भारत के बीच पूंजी निवेष 10 गुना अधिक रहा। इस पर चीन के अंतर्राष्ट्रीय सवाल अनुसंधान केंद्र में काम करने वाले श्यू च्यान क्वो ने कहा:

"चीन के पूर्व प्रधानमंत्री वन च्यापाओ की भारत यात्रा में दोनों देशों द्वारा रणनीतिक आर्थिक वार्ता की व्यवस्था की स्थापना किए जाने के बाद से अब तक क्रमश:दो बार रणनीतिक आर्थिक वार्ता की गई। नीतिगत ताल-मेल करने, व्यापार और पूंजी निवेश को बढ़ाने आदि कदमों में चीन भारत के साथ तालमेल कायम कर रहा है।"

हालांकि चीन और भारत की आर्थिक वृद्धि दर अपेक्षाकृत तेज हैं। वित्तीय संकट में हुए परिवर्तनों की परीक्षाओं में खरे उतर चुके हैं। विश्व की आर्थिक वृद्धि को बढाने का इंजन बन चुके हैं। लेकिन दोनों देशों के आर्थिक विकास की रूपरेखा बराबर नहीं है। यह सर्वविदित है कि चीन को दुनिया का कारखाना कहा जाता है और भारत विश्व का दफ्तर कहा जाता है। यह चीन और भारत के आर्थिक विकास की रूपरेखा का ज्वलंत रूपक है। पहला, चीन में सुधार और खुलेपन की नीति लागू किए जाने के बाद चीन का आर्थिक विकास प्रमुख रूप से निर्माण उद्योग पर निर्भर करता है, लेकिन भारत आई.टी (IT) और सेवा उद्योग पर निर्भर रहने वाला देश है। दूसरा, चीन वैदेशिक व्यापार पर अधिक निर्भर करता है और भारत घरेलू उपभोग से आर्थिक वृद्धि को आगे बढाता है। तीसरा, चीन में श्रमिक उत्पादकता भारत से अधिक है, लेकिन भारत में पूंजी की परिचालन क्षमता चीन से अधिक है।

अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक स्थिति के कमजोर से चीन और भारत के बीच व्यापार पर कुछ प्रभाव पड़ता है। पिछले वर्ष चीन और भारत के बीच व्यापार की रकम 66 अरब 40 करोड़ अमरीकी डॉलर रही, जो वर्ष 2011 से 10.1 प्रतिशत कम है। इस पर श्यू च्यान क्वो का विचार है:

"आम तौर पर देखा जाए, तो 10 प्रतिशत की कटौती पहले आर्थिक वृद्धि होने के आधार पर कम हो गई है। वास्तव में वर्ष 2011 चीन और भारत के बीच व्यापार की रकम वर्ष 2010 से 30 प्रतिशत अधिक रही। अन्य एक सवाल है कि वित्तीय संकट होने की शुरूआत से अब तक यानि वर्ष 2007 से वर्ष 2012 तक दोनों देशों के बीच व्यापार की रकम 70 प्रतिशत अधिक रही। दूरगामी दृष्टि से देखा जाए, तो विकास हो रहा है।"

हालांकि चीन और भारत के आर्थिक विकास की रूपरेखा बराबर नहीं है, लेकिन एक-दूसरे के पूरक है। दोनों देश बड़ी आबादी वाले देश हैं, कुल जनसंख्या 2 अरब से भी अधिक है। दोनों देशों में आर्थिक विकास के साथ साथ लोगों का जीवन स्तर भी उन्नत हो रहा है। समाज और अर्थतंत्र समेत विभिन्न क्षेत्रों में सुधार की आवश्यक्ता है। इसके साथ साथ बाजार की बड़ी निहित शक्ति है। चीन 12वीं पंचवर्यीय योजना के दौरान सेवा उद्योग को अपने विकास की प्राथमिकता देता है, जबकि भारत प्रमुख रूप से निर्माण उद्योग का विकास करेगा। दोनों देश एक-दूसरे से सीख सकते हैं। इसके अलावा दोनों देश औद्योगीकरण और शहरीकरण की प्रक्रिया में हैं। श्यू च्यान क्वो ने कहा कि उक्त दो नज़रों से देखा जाए, तो चीन और भारत के आर्थिक विकास की वृद्धि तेज रहेगी। उन्होंने कहा:

"दो बड़े बाजारों की निहित शक्ति और औद्योगीकरण व शहरीकरण के बड़े भविष्य से यह कहा जा सकता है कि भावी कुछ समय में चीन और भारत निरंतर विश्व के आर्थिक विकास का इंजन बनेंगे। निकट भविष्य में यह स्थिति बनी रहेगी। यह दोनों देशों के सामने मौजूद मौका और सहयोग का सुअवसर भी है। "

चीन और भारत दोनों विकासशील देश हैं। वर्तमान के बड़े आर्थिक देशों से शक्तिशाली आर्थिक देश बनने का लम्बा रास्ता तय करना है। दोनों देशों के नेताओं के बीच नए चरण की यात्रा से दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग और घनिष्ठ होगा और इसका भविष्य व्यापक भी है।

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