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एक सैनिक की नज़र में तिब्बती सीमा रक्षा टुकड़ी का कल और आज
2011-12-13 14:56:16

तिब्बत में तैनात सीमा रक्षा टुकड़ी में ख छुनकांग नामक एक वरिष्ठ सैनिक हैं, जो वर्ष 1998 में सेना में शामिल हुए और आज तक 13 सालों में तिब्बत के सीमांत क्षेत्र में एक सैनिक के रूप में काम कर रहे हैं। पिछले दस वर्ष से अधिक समय में सीमा रक्षा टुकड़ी के परिवर्तन के बारे में उन्हें गहरा अनुभव है। वह कभी कभार कहते हैं कि यह बदलाव जमीन आसमान सा है।

"पहले हमारे यहां खाने की चीज़ें कम थी। मूली, गोभी और समुद्री शैवाल यानी केल्प हमारे रोज़मर्रा के खाने की चीज़ें थी। उस समय एक व्यक्ति सिंगल बेड का प्रयोग नही कर सकता था, कई लोग एक ही बड़ी पलंग पर सोते थे। अगर किसी को नींद नहीं आती, तो पलंग पर नहीं उलट-पलट सकता, क्योंकि पलंग तंग थी।"

दिसंबर 1998 में 18 वर्षीय ख छुनकांग दक्षिण पश्चिमी चीन के युन्नान प्रांत से तिब्बत आए। सेना में शामिल होने के शुरुआती दिनों की याद करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय सेना में जीवन स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी, छोटे होने के कारण सैन्य जीवन आसान लगता था। उन्होंने कहा:

"उस समय मैं छोटा था। सेना में भर्ती होने के शुरू में माता पिता, दोस्तों की याद सताती थी। ट्रेनिंग, खाना, कक्षा लेना और सोना रोज़ाना का काम था, मुझे लाइफ बोरिंग लगती थी।"

सैनिक ख छुनकांग की यह टुकड़ी तिब्बत के पड़ाही क्षेत्र में तैनात है, जहां कम लोग आते-जाते हैं और यातायात की सुविधा भी अच्छी नहीं है। इस तरह बाहरी दुनिया के साथ संपर्क में रहना मुश्किल है। एक महीने में सिर्फ़ एक दिन की छुट्टी होती है। इसी दिन नज़दीक के कस्बे जाकर अपने घर वालों को फोन करना सैनिकों के लिए सबसे बड़ी खुशी की बात होती है। लेकिन सबसे नज़दीक वाले कस्बे तक पहुंचने में सात आठ घंटे का समय लग जाता है। इसकी चर्चा में ख छुनकांग ने कहा:

"उस समय एक महीने में सिर्फएक दिन की छुट्टी होती थी। नज़दीक के कस्बे के पास सिर्फ़ दो सैटेलाइट फ़ोन होते थे। हम तड़के पांच बजे अपने कमरे से रवाना होते थे और दोपहर को बारह बजे वहां पहुंचते थे। फोन करने वालों की संख्या ज्यादा होने के कारण कभी कभार वहां पहुंच कर परिजनों को फोन नहीं कर पाते थे। इसके साथ ही सैटेलाइट फोन का सिग्नल अच्छा न होने से एक दूसरे की आवाज़ अच्छी तरह नहीं सुन पाते थे। दोपहर बाद दो बजे हमें वापस लौटना होता था, और पहुंचते-पहुंचते रात के सात या आठ बज जाते थे ।"

उस समय की स्थिति अच्छी नहीं थी। लेकिन दस साल के बाद ख छुनकांग की नज़र में सीमा टुकड़ी में भी व्यापक परिवर्तन आया है। उसने कहा कि पहले हर वर्ष टुकड़ी के सैनिक अपनी छुट्टियों में भीतरी इलाके में अपने घर वापस लौटते थे, उन्हें स्छ्वान तिब्बत राजमार्ग के जरिए पंद्रह दिनों में गाड़ी से वापस लौटना पड़ता था, लेकिन आज विमान से एक ही दिन में घर पहुंच सकते हैं। पहले फोन करना मुश्किल था, सैनिक आम तौर पर पत्र व चिट्ठी के जरिए अपने परिजनों के साथ संपर्क करते थे, लेकिन आज संचार सेवा सुविधाजनक हो गयी है, किसी भी समय और हर जगह फोन कर सकते हैं। हमारी टुकड़ी में कई मोबाइल सेट भी होते हैं। सैनिक इनके जरिए अपने घर फोन कर सकते हैं, अब उन्हें दूर कस्बे जाकर फोन करने की जरूरत नहीं होती। इनके अलावा खाने-पीने की चीज़ों में भी सुधार हुआ है, पहले हर दिन मूली, गोभी और समुद्री शैवाल खाते थे, लेकिन आज तमाम तरह की चीज़े खाने को मिलती हैं। उन्होंने कहा:

"अब हम आसपास की काउंटी से मांस, चिकन और सब्ज़ियां खरीदते हैं, साथ ही खुद कई किस्मों की सब्ज़ियां उगाते हैं। खाने की स्थिति पहले से कहीं अच्छी हो गयी है।"

बताया जाता है कि वर्तमान में इस सीमा टुकड़ी के सैनिक 3.3 हैक्टेयर क्षेत्रफल में 30 किस्मों की सब्ज़ियां उगाते हैं, 1.5 हैक्टेयर की भूमि में आड़ू, सेब आदि दस से अधिक प्रकार के फल भी उगाते हैं। सीमा सैनिकों के जीवन स्तर में काफी सुधार आ गया है। सेना टुकड़ी में पुस्तकालय, कंप्यूटर रूम, टेबल टेनिस रूम आदि मनोरंजन स्थल खुल गए हैं, कभी कभार व्याख्यान कार्यक्रम, फिल्म और ज्ञान प्रतियोगिता आदि प्रोग्राम आयोजित होते हैं, अब हमारा जीवन बहुत रंगीन हो गया है। ख छुनकांग ने कहा कि अब सैनिकों के रूम में एसी लग चुके हैं, पेयजल और बिजली की सुविधा भी है। सेना से वापसी का दिन नज़दीक आ रहा है, वे दूसरे सैनिक मित्रों से दूर नहीं होना चाहते हैं। उन्होंने कहा:

"मैंने यहां बहुत कुछ सीखा है और अभ्यास भी किया है। मुझे उम्मीद है कि सेना में एक सैनिक के रूप में अपनी सेवाएं देता रहूंगा। बाद में घर वापस लौटने पर भी मैं सेना में हासिल मानसिक व शारीरिक अनुभवों का इस्तेमाल करता रहूंगा।"

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