भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 25 मई को क्वांगचोउ शहर में भारत-चीन व्यापार मंच को संबोधित करने के बाद पेइचिंग पहुंचे जहां उनके सम्मान में विदेशों के मैत्री करने वाले चीनी संघ (यानि चाइनीज पीपुल्स एसोसिएशन फॉर फ्रेंडशिप विथ फॉरेन कन्ट्रीज) और चीन स्थित भारतीय दूतावास ने स्वागत समारोह का आयोजन किया। इस स्वागत समारोह में चीन के तमाम विद्वानों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों और अन्य विशिष्ट हस्तियों ने शिरकत की।
इस स्वागत समारोह में चीनी उप-राष्ट्राध्यक्ष ली य्वानछ्याओ भी उपस्थित हुए जहां उन्होंने अपने भाषण में कहा कि चीन और भारत के बीच बौद्ध धर्म के सांस्कृतिक आदान-प्रदान और प्राचीन रेशम मार्ग में चीन व भारत के बीच धर्म, दर्शन, कला, विज्ञान व तकनीक और चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में आवाजाही प्रतिबिंबित है। पिछली शताब्दी के 50 के दशक में चीन व भारत ने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांत प्रस्तुत किये और देशों के बीच संबंध बरकरार रखने के लिए निर्देशक सिद्धांत प्रदान किया है। इधर के सालों में चीन और भारत के सहयोग का तेज विकास हुआ है। दोनों देशों ने और घनिष्ट साझेदारी संबंधों की स्थापना की। विभिन्न क्षेत्रों में दोनों के सहयोग में उल्लेखनीय प्रगति मिली है। आशा है कि दोनों देश मतभेदों और सीमा समस्याओं का अच्छी तरह निपटारा करेंगे। उन्हें विश्वास है कि राष्ट्रपति मुखर्जी की वर्तमान यात्रा से चीन-भारत संबंध और प्रगाढ़ किया जा सकेगा।
वहीं, भारतीय राष्ट्रपति मुखर्जी ने अपने भाषण में कहा कि चीन और भारत के बीच घनिष्ठ सहयोग की संभावनाएं असीमित है। दोनों देशों के बीच शैक्षिक और सांस्कृतिक आवाजाही ने हमारे प्राचीन संबंधों का परिचय दिया है जो कि साझेदारी संबंधों को जारी रखने के आधारभूत तत्व हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्राचीन समय में बौद्ध धर्म ज्ञान और संस्कृति के आदान-प्रदान करने का एक वाहन रहा है। बौद्ध धर्म दोनों देशों को आपस में जोड़कर रखता है।