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(GMT+08:00) 2007-07-20 15:34:17    
वेवूर नृत्य की प्रेमी सुश्री सुनलिंग

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पिछली शताब्दी के पचास वाले दशक में चीन की बहसंख्यक जाति हान जाति की लड़की 14 वर्षीय सुनलिंग चीनी जन मुक्ति सेना के सदस्य के रूप में दक्षिण चीन से उत्तर पश्चिम चीन के सिन्चांग में आयी । सेना में सुश्री सुनलिंग एक सैनिक कला मंडली की सदस्या नियुक्त हुई थी । उस समय छोटी उम्र में ही वह सैनिक कला मंडली के साथ साथ सिन्चांग के दक्षिण भाग में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने जाया करती थी । पचास वाले दशक में सिन्चांग के ग्रामीण इलाके में जीवन बहुत कठोर था । सैनिक कला मंडली समय समय पर ग्रामीण इलाके में जा कर किसानों और चरवाहों को प्रोग्राम पेश करती थी और मंडली के लोग गांवों में रहते थे । गांव की निवासी वेवूर जाति की चाची आयीरहान छोटी उम्र वाली सुन लिंग को बहुत प्यार दुलार करती थी और उन्हों ने सुनलिंग के लिए एक वेवूर नाम भी रखा --- सलिंमुहान , इस का अर्थ है मेरी प्यारी सुनलिंग । तत्कालीन कठिन भौतिक जीवन के दौरान सुनलिंग हमेशा वेवूर लोगों के साथ रहती थी और वेवूर भाषा सीखती थी । वेवूर जाति के मनमोहक नृत्य गान से छोटी सुनलिंग को बेहद लगाव हुआ और वह वेवूर लोगों से उन के नृत्य गान सीखने भी लगी , इस के चलते आर्थिक दृष्टि से मुश्किल जीवन मानसिक दृष्टि में आनंददायी जीवन में तब्दील हो गया । उस जमाने की बातों की याद करते हुए सुश्री सुनलिंग ने कहाः

गांववासी संध्या समय गांव में लौटते थे , सुर्य अस्त हो रहा था , तबली की आवाज गूंज उठी , गांव के सभी बड़े छोटे लोग घर से बाहर आय कर नाचने गाने लगे , हम भी उन के साथ थिरकते रहे और उन वेवूर जाति के नृत्य गान सीखते रहे । वेवूर जाति की प्राचीनतम संगीत विधि मुकाम के नाम से मशहूर है । तबली के थाप पर थिरकने से हमें इतना मजा आया था कि कठोरता की कोई भी चीज नहीं रह गयी । वेवूर लोग महीन रेतों पर नंगे पांव से नाचते थे , हम भी नंगे पांव से नाचते , लगता था कि सब का सब आनंदित हो गया ।

यह आप ने जो सुना है , वह सिन्चांग की मूल संगीत विधि बारह मुकाम का एक अंश है । बारह मुकाम में वेवूर जात की प्राचीन भावना गर्भित है और जातीय लोक नृत्य गान का संपूर्ण सौंदर्य है । पहली बार मुकाम का सुन्दर नृत्य गान देखने सुनने पर ही सुन लिंग को उस से लगाव हुआ और वह मुकाम के दीवानी बन गयी । सौभाग्य बात भी थी कि सुनलिंग को सिन्चांग के प्रथम नर्तक के नाम से प्रसिद्ध सुश्री खांगबारहान से निर्देशन मिला । उन्हों ने सुनलिंग को बताया कि वेवूर लोग जन्मसिद्ध गायक और नर्तक हैं । तुम लोगों को जाहिरा तौर पर नृत्य गान सीखना नहीं चाहिए और नृत्य की अन्तः गर्भित भावना सीखना चाहिए । यानी तुम लोगों को वेवूर लोगों की उत्तम भावना से सीखना चाहिए । खांगबारहान के उपदेश ने सुन लिंग को उस के भावी कला जीवन को असीम प्रेरक शक्ति प्रदान किया था ।

नृत्य गान का काम दस साल तक करने के बाद 26 साल की उम्र में सुश्री सुनलिंग सिन्चांग सैनिक कोर की कला मंडली की एक नृत्य संपादक बन गयी । नए काम ने उसे वेवूर नृत्य को गहन रूप से समझने का नया मौका मुहैया किया । नृत्य प्रोग्राम रचने के काम में वे हमेशा वेवूर लोक नृत्य की शैली को वेवूर लोगों के आम जीवन के साथ घनिष्ठ रूप से जोड़ देती है । उन का कहना हैः

अंगूर पांचे के नीचे एक सामुहिक महिला नाच कार्यक्रम है , इस में लोक नृत्य के बहुत से अंक मिश्रित है , नृत्य से फैशनेबल भावना अभिव्यक्त भी हुई है । नृत्य में युवतियों की टोली सुबह की लालिमा में अंगूर बगीचे में अंगूर तोड़ने जा रही है । संध्या की वेली में वे तोड़े गए अंगूर सहेजते हुए घर लौट रही है । इस नृत्य में उत्साहपूर्ण मेहनत का दृश्य दिखाई देता है । अंगूर तोड़ने का अंदाज बहु मनमोहक है । सिन्चांग में अंगूर का पांचा ऊंचा नहीं है , उस के नीचे नाचना देखने में सुन्दर नहीं लगता है , इसलिए हम ने पांचे के नीचे अंगूर तोड़ने के नृत्य भंगामे मंच के फर्श पर लेटने और घुटनी टेकने के रूप में बनाये गए , इस से वेवूर नृत्य का मूल रूप बनाए रखा गया है , साथ ही सैनिक कला मंडली का सृजनात्म काम भी हो गया है ।

सुश्री सुनलिंग इसके लिए यथा संभव कोशिश करती है कि उन की हरेक नृत्य रचना ऊंचे कोटि की बनेगी और हरेक नृत्य प्रोग्राम अनुरूपित और पुनःप्रवृतित नहीं है । इस लक्ष्य के लिए वे अकसर दूर दराज चरगाहों में जाती हैं और स्थानीय चरवाहों के बीच रहते हुए उन का जीवन जायज करती है। लोक नृत्य बटोरने और संकलित करने के कारण वे कभी ईली प्रिफेक्चर में भंयकर बर्फिली तूफान के चपेट में फंस पड़ी और कभी सवारी घोड़े के साथ बर्फीली नदी के पानी में गिर पड़ी । जीवन को नजदीक से देखने के लिए वे हेथान इलाके के रेशमी धागा मिल में चार महीने तक मजदूरिन के रूप में काम करती रही । सिन्चांग कला कालेज के प्रोफेसर श्री आंनिवाएर , टाउहुती ने सुश्री सुनलिंग के साथ नृत्य शास्त्र पर रायों का आदान प्रदान किया था । उन की नजर में सुश्री सुनलिंग कभी नृत्य व जीवन से अलग नहीं हो सकने वाली कलाकार है । श्री टाउहुती ने कहाः

वे अपनी रचना सृजन तथा असली जीवन से बहुत प्यार करती हैं और जीवन का नजदीक से जायज करने की कोशिश करती है । उन्हों ने अपनी रचना में बहुत से चीनी व विदेशी और प्राचीन व आधुनिक विषय मिश्रित किये हैं । जातीय कला के मूल आधार पर वे नृत्य कला को आगे विकसित करने की कोशिश करती है । उन्हों ने सिन्चांग के नृत्य कार्य के लिए असाधारण योगदान किया है ।

वर्ष 1990 में सुश्री सुनलिंग को दुर्भाग्य से कैंसर का रोग लगा । ऐसी स्थिति में भी वे नृत्य से जुदा नहीं सकती । अब वे रिटायर हो चुकी है , लेकिन वे कला सलाहकार के लिए आमंत्रित की गयी । वे अकसर डाक्टर की आंखों से बच कर नृत्य सृजन के लिए जाती है । सुबह वे अस्पताल में रोग का इलाज करवाती है और दोपहरबाद वे चोरी छुपे निकल कर नृत्य मंडली में जा कर नृत्य प्रोग्राम बनाने में जुट जाती है । उन की इस प्रकार की अद्मय और आशावादी भावना से लोग बहुत प्रभावित हुए । सिन्चांग के लेखक श्री छन माओ ने कहाः

सुश्री सुनलिंग सिन्चांग में थ्येन शान पर्वत माले के विशाल क्षेत्र में जा कर लोक नृत्य गान ढूंढ़ती , संकलित करती और अध्ययन करती है । उन के द्वारा संगृहित लोक नृत्य बहुत ज्यादा हैं । इन के आधार पर उन्हों ने बेशुमार प्रोग्राम तैयार किए हैं । और उन्हों ने विश्व में भी अनेकों बार कला प्रस्तुति कीं और बहुत से पुरस्कार भी जीते । उन्हों ने सिन्चांग के वेवूर नृत्य गान के प्रसार व विकास के लिए भारी योगदान किया है ।

वर्ष 1992 में सुश्री सुनलिंग द्वारा रचित बड़े आकार वाला नृत्य कार्यक्रम मेरे वतन को समाम राष्ट्रीय दिवस के रात्रि समारोह में पेश किया गया और चीनी नेताओं ने कार्यक्रम देख कर उस की भूरि भूरि प्रशंसा की । कैंसर रोग से पीड़ित होने वाले आठ सालों के दौरान सुश्री सुनलिंग ने लगातार दस कार्यक्रम रचित किए , यह संख्या किसी स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी कम संख्या का काम नहीं है , किन्तु इतना भारी काम असल में गंभीर रोग से पीड़ित सुन लिंग के हाथों पूरा किया गया है । लेकिन सुश्री सुनलिंग का कहना है कि उन का पूरा तंमना है कि जिन्दी भर सिन्चांग में रहेंगी , सिन्चांग के जातीय नृत्य गान से वे अलग नहीं हो सकती हैं । उन की आधे से ज्यादा जिन्दगी सिन्चांग से प्यार में समर्पित हो चुकी है ।