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(GMT+08:00) 2007-06-14 16:33:11    
पेइचिंग विश्विद्दालय के हिन्दी विद्वान प्रोफेसर चिन दिंग हेन की कहानी

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मेरा जन्म सन 1930 में हूनान प्रांत की राजधानी छांशा शहर में हुआ। मेरे पिता जी एक इन्जिनियर थे, और मेरी माता जी प्राइमरी स्कूल की एक अध्यापिका। सन् 1937 में जब मैं सात वर्ष का एक बच्चा था, उस समय जापानी साम्राज्यवादियों ने चीन पर आक्रमण किया, और चीन के बड़े इलाके के लोग जापान के गुलाम बन गये। उस समय मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ता था, और सारे चीन में एख गाना प्रचलित था। गाने में ऐसा गाया जाता था कि " यदि हम दृष्ट भेड़ियों को भगा न देंगे, तो हम भी भारतीय लोगों की तरह बुरी तरह फंसेंगे" मैंने अपने माता पिता से पूछा: " भारत का मतलब क्या है। " माता ने कहा :" भारत हमारा पड़ोसी देश है।"हमारे देश का जो बौद्ध धर्म है, वह वहां से आया है। औऱ बौद्ध गौतम सिद्धार्थ वहीं पर पैदा हुआ था। मेरे पिता जी ने कहा:"भारत एक महान देश है। भारतीय जनता बुद्धइमान है, लेकिन अब वे अंग्रेजी साम्राज्यवादियों के गुलाम बन गए। उन की बहुत बुरी हालत है। यदि हम चीनी लोग जापानी भेडियों को बाहर न भगा देंगे, तो हम भी गुलाम बनकर बुरी हालत में फंस जाएंगे। " यह सुनकर मैंने कहा :"तब तो हमें एख दूसरे को सहायता देना चाहिए। " पिता ने हंसकर कहा :" हां, यदि हम कंधे से कंधे भिड़कर लड़ेंगे, तो हम अव्शय इन भेड़ियों को भगा देंगे। " उसी समय से मेरे हृद्य में चीन औऱ भारत के संबंध का कार्य करने का बीज बोया गया है।

जब मैं एक किशोर था औऱ मिडिल स्कूल में पढ़ता था, तो मुझे पश्चिमी यात्रा शीर्षक एक चीनी उपन्यास बहुत पसंद था। उस उपन्यास के मुख्य याज श्वेन जांग थे, जो सातवीं शताब्दी के एक चीनी भिक्षु थे। उन्होंने बहुत कठिनाइयों को दूर करके भारत की यात्रा कीष औऱ वहां से बौद्ध धर्म के सच्चे सूत्रों को चीन में लाए। उन का और उन के अंगरक्षक बानर राजा का मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। मैंने ही मन में सोचा भविष्य में मैं भी शअवेन जांग की तरह भारत औऱ चीन की मित्रता के लिए काम करूंगा।

सन् 1947 में भारतीय जनता अपने देश के मालिक बन गए। औऱ सन् 1949 में चीनी लोक गणराज्य स्थापित हुआ। सन् 1950 में चीन और भआरत का राजनयिक संबंध स्थापित किया गया। दूसरे साल, सन् 1951 में पेइचिंग विश्विद्दालय में पहली बार हिन्दी क्लास बुलाया गया। उस समय मैं अंग्रेजी पढ़ता था। यह प्रोग्राम जानकर मैंने अंग्रेजी छोड़कर हिन्दी पढ़ना शुरु किया।

सन् 1954 में भारतीय प्रधान मंत्री पंडित नेहरु ने चीन की यात्रा की थी। उन्होंने चीन में दो भाषण दिये थे और दोनों हिन्दी में। मैंने सुन यातसेन पार्क में उन का भाषण सुना था। एक हिन्दी विद्दार्थी के नाते मुझे उन के भाषण से बहुत प्रोत्साहन किया। उस समय भारत में श्री चट्टोपाध्याम का गाना "हिन्दी चीनी भाई भाई " बुहत प्रचलित था। मैंने इस गाने का चीनी में अनुवाद करके गीत नामक पत्रिका में प्रकाशित करवाया। और इस के बाद चीन में भी चारों ओर हिन्दी चीनी भाई भाई का गाना गूंजने लगा।

बीसवीं शताब्दी की छठवीं शदाब्दी चीन और भारत के संबंध का सुनहरा काल था। मैंने पेइचिंग ही में डाक्टर पनिक्कर से बातचीत की थी। भारतीय उपराष्ट्रपति सुप्रसिद्ध विद्वान पंडित राधाकृषण का भाषण सुना, और प्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ श्री कृष्ण मेनन से मुलाकात की। मैंने पेइचिंग विश्विलय में श्री राहुल सांकृत्यायन, श्री जैनेन्द्र कुमार, और श्री मुल्कराज आन्द का स्वागत किया। मैंने पेइचिंग ही में श्री राजकपुर औऱ नरगिस से भेंट की और उदयभंकर जी का नृत्य देखा।

सन् 1959 में मैंने प्रेमचन्द के उपन्यास निर्मला का चीनी में अनुवाद करके प्रकाशित करवाया था, जो चीन में सीधे हिन्दी से अनुवादित पहला उपन्यास था। इस के साथ साथ मैंने दूसरे लोगों के सहयोग से एक हिन्दी चीनी शब्द कोष तैयार किया। वह भी सन् 1959 में प्रकाशित हुआ।लेकिन, दुर्भाग्यवश, सन् 1962 में चीन और भारत के संबंध में गड़बड़ पैदा हुआ, और उस के बाद एक अंधेरी रात आ गई।

आखिर, आठवीं शताब्दी के अंत में चीन और भारत के संबंध का एक प्रातः काल आने लगा। सन् 1979 में मैंने पेइचिंग विश्विद्दालय में उस समय के विदेश मंत्री और आज के प्रधान मंत्री श्री वाजपेयी जी से मुलाकात की थी। सन् 1989 में मैंने नई दिल्ली में आयोजित तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लिया। मैंने भारत और सारे संसार के बहुत से प्रसिद्ध हिन्दी लेखकों व विद्वानों से मुलाकात की। उस समय के प्रदान मंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने सम्मेलन में उद्घाटन भाषण दिया, और विदेशी प्रतिनिधियों से मिलकर बातचीत की। जब उन को मालूम हुआ कि मैं उस समय तुलसीदास के महाकाव्य रामचरितमानस का अनुवाद कर रहा था, तो उन्होंने कहा, यह एक बहुत महत्वूपर्ण काम है। आशआ है , आप को सफलताएं मिलेंगी। उन के कथन से मुझए बहुत प्रोत्साहन मिलाष। मैंने लगातार पांच वर्षों तक बहुत कठिनाइयों को दूर करके रामचरितमानस का चीनी पक्ष में अनुवाद किया, और वह सन् 1988 में प्रकाशित हुआ। उसी समय मेरी दूसरी पुस्तक हिन्दी चीनी मुहावरा कोश भी प्रकाशित हुआ। इन दो पुस्तकों के प्रकाशन को मनाने के लिए चीन में स्थित भारतीय दूतावास ने एख फंक्भन बुलाया। फंक्भन में भारत के भूतपूर्व विदेश मंत्री श्री बलिराम भगत और भारतीय राजदूत श्री रंगनाथनने इन दो पुस्तकों के प्रकाशन होने के लिए हार्दिक अभिन्नदन किया।

इस के बाद मैं एक विजिरिंग प्रोफेसर की हैसियत से कैम्ब्रिज विश्विद्दालय में गया। लंदन में भारतीय हाई कमिशनर श्री रसगोजा ने मुझ से भेंट की, औऱ मुझे टी पार्टी दी। बी बी सी के हिन्दी परोगराम के अध्यक्ष कैलाभ बुद्धवार जीने मुझ से दो बार इन्टरव्यू लीं।

सन् 1988 के अक्तूबर में मैं कैम्ब्रिज से पेइचिंग में वापस आया। मैं अंतरराष्ठ्रीय रामायण सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत जाने वाला था कि भारतीय राजदूत श्री रंगताथन ने मुझे फोन किया। उन्होंने फोन में कहा कि प्रधान मंत्री श्री राजीव गांधी चीन की यात्रा करने वाले हैं। वे मुझ से मिलना चाहते हैं। आशा है, मैं उस समय पेइचिंग में उन से मिल सकूंगा। तब तो मैं पेइचिंग में रह गया, और मेरी पली अकेली ही अंतरराष्ठ्रीय रामायण सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत गई। 1988 के अंत में मैंने पेइचिंग में भारतीय प्रधान मंत्री श्री राजीव गांधी से मुलाकात की औऱ बातचीत की। उन की राज्जनता और बुद्धिमत्तां का मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव हुआ। उन्होंने श्रीमति इंदिरा गांधी की यादगार के लिए आयोजित विश्व नागरिक बनाए नामक एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुझे निमंत्रण दिया। सन् 1990 की जनवरी में मैंने उस सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन के दौरान, राजीव गांधी जीने मुझ से कहा कि वे भारत में भारत औऱ चीन के सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र स्थापित करना चाहते हैं। और वे भारतीय राष्ठ्रपति श्री वेंकटरामन राष्ठ्रपति भवन में मुझ से मुलाकात की और उपराष्ठ्रपति भंकर दयाल भर्ता जी ने उपराष्ठ्रपति भवन में मुझ से भेंट की।

सन् 1990 में मुझे भारत चीन मैत्री पुरस्कार मिली, जिसे सुप्रसिद्ध लेखिका हान सून इन और उन के धर्मपति ने प्रदान किया था। सन् 1993 में मैंने भारत में आयोजित दसवें अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन में भाग लिया। मस्मेलन के समाप्त होने पर राष्ठ्रपति श्री शंकर दयाल भर्मा ने राष्ट्रभवन में सम्मेलन के सभी विदेशी प्रतनिधियों से भेंट की और मुझे विश्व हिन्दी सम्मान प्रदान किया।

सन् 1994 में मैंने अमरीका की यातरा की। मैंने कोलम्बिया विश्विद्दालय, विस्कांसिन विश्विद्दालय, वाशिन्टन विश्विद्दालय, और सिरक्यूस विश्विद्दालय में भाषण दिये, औऱ मरीका की विश्व हिन्दी समिति ने मुझे विशेष सम्मान प्रदान किया। सन् 1995 में मैंने हालैंड की यात्रा की और लैंडन विश्विद्दालय के निमतंर्ण पर वहां पर भाषण दिये थे।सन् 1996 में 13वां अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन चीन के शनजन शहर में आयोजित किया गया। सम्मेलन में 15 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। और इस सम्मेलन का अध्यक्ष मैं ही था।

सन् 1997 में मैंने अमरीका के ह्यूस्टन में आयोजित 14वें अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन में भाग लिया था। सन् 1999 में मैंने अमरीका के मियामी शहर में आयोजित विश्व तुलसी सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन के दौरान अमरीका के हिन्दू विश्विद्दालय ने मुझे विश्व तुलसी सम्मान प्रदान किया। इस के बाद मैंने भारत में जाकर 16वें अंतरराष्ट्रीय सरामायण सम्मेलन ने और दसवीं विश्व हिन्दी संगोष्ठी की अध्यक्षता की।

सन् 2000 में सुप्रसिद्ध हिन्दी लेखक यशपाल जी के उपन्यास झूठा सच का चीनी अनुवाद प्रकाशित हुआ, जिस के अनुवादक मैं और मेरे एक विद्दार्थी थए। यह यशपाल के उपन्यासों का पहला औऱ एकमात्र चीनी अनुवाद है। इसी वर्ष आसाम में आयोजित ब्रह्म्पुत्र संस्कृति के अंतरराष्ठीय मस्मेलन ने मुझे शंकर सूर्य सम्मान प्रदान किया।

सन् 2001 में भारतीय राष्ट्रपति डाक्टर नारायण ने राष्ट्रभवन में मुझे जार्ज ग्रिर्यसन पुरस्कार प्रदान किया। सन् 1951 में मैंने हिन्दी पढ़ना शुरु किया था। अब तक मुझे हिन्दी का काम किए हुए आधी शताब्दी से अधिक समय हो गया है। इन वर्षों में मैंने चीन और भारत के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए औऱ इन दोनों देसों की जनता की मित्रता के लिए थोड़ा बहुत काम अवश्य किया है। लेकिन, भारतीय जनता और चीनी जनता के बीच की मित्रता एक महापुल है, मेरा काम केवल इस महापुल में एक चुल्लू सिमेंट है। चीनी जनता और भारतीय जनता की मित्रता यात्सीनदी और गंगा नदी है। और मेरा काम केवल उन में पानी की एक बंदू है। भारतीय जनता ने मुझए जो सम्मान प्रदान किया है, वह मेरे लिए प्रोत्साहन है। इस प्रोत्साहन से मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। इस महापुल को और अधइक मजबूत और अधिक सुंदर के लिए मैं अवश्य पूरी शक्ति से प्रयास करुंगा।