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18 ईसवी में एक अन्य विद्रोही सेना छिमेइ के प्रमुख नेता फ़ान छुङ ने किसानों का नेतृत्व करके शानतुङ प्रान्त के च्वीश्येन में सशस्त्र विद्रोह किया।
वे थाएशान पर्वतमाला को अपना आधार-क्षेत्र बनाकर शानतुङ और च्याङसू के उत्तरी क्षेत्र में लड़ते रहे। जल्दी ही एक लाख से अधिक सैनिकों की एक विशाल सेना बन गई।
लड़ाई में अपने सैनिकों और दुश्मन के सैनिकों के बीच फर्क करने के लिए वे अपनी भौंहों को लाल रंग से रंग लेते थे। इसलिए यह फौज लाल भौंह सेना कहलाती थी।
लूलिन और छिमेइ सेनाओं के विद्रोहों के साथ-साथ, ह्वाङहो नदी के उत्तर के विशाल मै दान में, जहां आज के हपेइ और शानतुङ प्रान्त स्थित हैं, अन्य दसियों विद्रोही टुकड़ियां भी सरकार के खिलाफ उठ खड़ी हुई थीं।
25 ईसवी में ल्यू श्यू ने, जो एक शक्तिशाली जमींदार था और मौका पाकर किसान-विद्रोही सेनाओं में घुस आया था, अपने को सम्राट घोषित कर दिया और हान राजवंश की पुनर्स्थापना की।
चूंकि इस पुनर्स्थापित राजवंश की राजधानी ल्वोयाङ छाङआन के पूर्व में स्थित थी, इसलिये इतिहासकार इस नए राजवंश को पूर्वी हान के नाम से पुकारते हैं।
ल्यू श्यू बाद में सम्राट क्वाङऊ के नाम से मशहूर हुआ। उसने किसान-विद्रोही सेनाओं को बड़ी क्रूरता के साथ कुचल दिया।
मोटे तौर पर, पूर्वी हान शासन ने अपने पूर्ववर्ती पश्चिमी हान शासन की राजनीतिक प्रथाओं का अनुसरण किया था।
सम्राट क्वाङऊ ने लगातार छै बार दास-दासियों को मुक्ति प्रदान करने का आदेश दिया और नतीजे के तौर पर बहुत से दास-दासियों को आजादी हासिल हुई।
बाद में, उसने सरकारी जमीन का एक हिस्सा गरीब किसानों को देने के साथ-साथ उन्हें बीज, कृषि-औजार और खाद्यान्न उधार देने के अनेक आदेश भी जारी किए।
उसने जल-संरक्षण परियोजनाओं का निर्माण करने, ह्वाङहो नदी को वश में करने और नदी-तटबंधों का निर्माण व मरम्मत करने पर विशेष ध्यान दिया।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप उसके बाद के कोई 800 वर्षों तक ह्वाङहो नदी ने अपना रास्ता नहीं बदला था। पूर्वी हान राजवंश के काल में लोहा गलाने की तकनीक में बड़ी उन्नति हुई।
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