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(GMT+08:00) 2006-09-08 09:18:43    
जन कल्याण कार्य में सक्रिय ताजिक जातीय व्यापारी मायिर्जांग

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यह है जन कल्याण कार्य में सक्रिय ताजिक जाती के मेनेजर श्री मायिर्जांग की कहानी । श्री मायिर्जांग सिन्चांग के ऊरूमुची शहर के मायिर्जांग व्यापार कंपनी के मेनेजर जनरल हैं , वे चीन की अल्पसंख्यक जाति ताजिक जाति के हैं और सात विदेशी भाषाएं जानते हैं । उन की कंपनी का व्यापार इतना बड़ा बढ़ गया है कि विश्व के 160 देशों और क्षेत्रों के साथ उन का व्यापारिक रिश्ता है और कंपनी की कुल अचल पूंजी 16 करोड़ य्वान तक पहुंची है । धनी होने के बाद वे जन कल्याण कार्य में बहुत तत्पर हुए कि व्यापार से प्राप्त अपनी अधिकांश मुनाफे को निस्वार्थ के साथ स्थानीय गरीब विश्वविद्यालय छात्रों को मदद देने तथा अपनी जन्म भूमि के निर्माण , प्राकृतिक विपत्तियों से ग्रस्त क्षेत्रों तथा सीमा रक्षा बल को सहायता स्वरूप दे देते हैं । इन सालों में उन्हों ने कुल तीन करोड़ य्वान मूल्य की धन राशि और सामग्री चंदा स्वरूप दे दी है ।

इस साल 38 वर्षीय ताजिक जाति के व्यापारी श्री मायिर्जांग कद में ऊंचे , सुगठित और खुशमिजाजी हैं ।

करोड़पति होने पर भी वे बहुत सीधा सादा जीवन बिताते हैं , उन की दफतर एक ऊंची इनारत में है , पर दफतर सिर्फ दस वर्ग मीटर से थोड़ी बड़ी है , जिस में एक बहुत साधारण टेबल और पुराना सोफा व गलीचा है ।

श्री मायिर्जांग का जन्म पिछली शताब्दी के साठ वाले दशक में पश्चिमी सिन्चांग के पामीर पठार पर स्थित ताश्गुरकन ताजिक जातीय स्वायत्त जिले में हुआ , जो पाकिस्तान , अफगानिस्तान , ताजिकीस्तान तथा किर्गिजस्तान आदि देशों से सटा हुआ है ।

श्री मायिर्जांग का बालावस्था जीवन गरीब था , गरीब जीवन ने छोटे मायिर्जांग को जीवन को सुधारने के लिए कठोर परिश्रम करने का संकल्प सिखाया । वे बचपन से ही कड़ी मेहनत से पढ़ते थे और भविष्य में बेहतर जीवन के लिए मजबूत नींव डालने की कोशिश करते थे । प्राइमरी स्कूल में पढ़ने के समय वे एक पारिश्रमिक और समझेदार छात्र रहे थे , उन के स्कूल मास्टर श्री आटिदा ने उन के स्कूली जीवन की याद करते हुए कहाः

जब वह स्कूल में पढ़ता था , मुझे वह बहुत पसंद था , क्लासरूम में वह पढ़ाई और आचार व्यवहार में श्रेष्ठ निकला था और अकसर दूसरे बच्चों को मदद देता था । ताश्गुरकन एक बहुत सर्द इलाका है , जब वसंत काल में बर्फ पिघलता था , तो स्कूल के मकानों की छतों से पानी अन्दर रिसता था , ऐसे समय पर मायिर्जांग सब से पहले मकान की छत पर चढ़ कर मरम्मत करता था । भारी बर्फबारी के समय वह दूर रहने वाले छात्रों को घर लौटाता था और क्लासरूम में चूल्हे को जलाता था और कमरे की सफाई करता था ।

ताश्गुरकन में अकसर बर्फीला तूफान आता था , जब सीमा रक्षा बल के जवान बर्फबारी की परवाह न कर स्थानीय निवासियों को मदद के लिए सामग्री प्रदान करने आते थे , तो वह हमेशा आदर और एहसान की निगाह से उन्हें देखता था ।

घर के आर्थिक बोझ को हल्का करने के लिए मायिर्जांग ने जुनियर मिडिल स्कूल से स्नातक होने के बाद ही व्यापार का काम आरंभ किया । पहले सौदे में उन्हों ने घर से 400 किलोमीटर दूर हथ्येन से पांच गलीचे खरीदे और ताश्गुरकन में ला कर बेचने से 1200 य्वान कमाया ।

इस प्रारंभिक सफलता से श्री मायिर्जांग को बड़ी प्रेरणा मिली , इस के आधार पर उन्हों ने पाकिस्तान के व्यापारियों के साथ सीमांत व्यापार शुरू किया । तेज और अध्ययनशील होने के चलते उन्हों ने इस बीच अरबी , ऊर्दू ,फारसी , अंग्रेजी , रूसी और जापानी भाषाएं सीखीं । अनेक विदेशी भाषाओं में महारत हासिल होने के कारण वे विदेशी व्यापारियों के साथ व्यापार करने में बड़ी सुविधा पाते हैं और हर सौदे के लिए वे खुद खरीददारी , ढुलाई और बिक्री का काम संभालते हैं और उन्होंने पाकिस्तान की एक सीमांत पोर्ट में एक होटल भी खोला ।

श्री मायिर्जांग का व्यापार तेजी से बढ़ता गया । बेशक इस दौरान उन्हें बहुत सी कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा । एक बार इस्लामाबाद जाने के रास्ते में उन की गाड़ी गंभीर दुर्घटना से ग्रस्त हो गयी , जिस से वे तीन दिन तीन रात बेहोशी में पड़ गए । अपने व्यापार की याद में उन्हों ने कहाः

मुझे व्यापार में बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । खास कर 1992 में मैं पाकिस्तान में व्यापार करता था , एक बार मेरी गाड़ी खाई में गिर गयी , मेरे पैर और बांह टूट गये और अस्पताल में आधा साल तक पलंग पर लेटना पड़ा ।

इधर के सालों में सिन्चांग और पड़ोसी देशों के बीच व्यापार फलता फूलता चला जा रहा है । इसलिए मायिर्जांग का व्यापार भी जोरों से बढ़ा , कंपनी की पूंजी बहुत ज्यादा जमा हुई। कमाई से प्राप्त बहुत सी धन राशि को वे चंदा स्वरूप दूसरों को देने लगे । अपनी पहली सौदे से जो धन मिला था , उस का आधा भाग उन्हों ने सीमा रक्षा बल के जवानों को आहार सुधारने के लिए दे दिया । वर्ष 1998 में उन्हों ने गाड़ियों व ऊंटों का काफिला ले कर चार हजार मीटर ऊंचे आठ पामीर पर्वतों को पार कर अपनी जन्म भूमि को दस लाख य्वान के खाद्यपदार्थ भेंट किए । उसी साल के सर्दियों में उन्हों ने स्कूल के 500 शिक्षकों व छात्रों की हिटिंग के लिए 1000 टन कोयला पहुंचाया और साथ ही एक बड़ा ट्रक भी दे दिया ।

सिन्चांग के विभिन्न स्थानों में जब भूकंप जैसे प्राकृतिक प्रकोप हुए , तो वे तुरंत संकट ग्रस्ट क्षेत्रों में चावल , आटा , तंबू तथा चिकित्सा साजो सामान की सहायता देते है । उन्हों ने सिन्चांग विश्वविद्यालय में एक छात्रवृत्ति कोष भी कायम किया , जो गरीब व श्रेष्ठ छात्रों को फीस जमा करने या इनाम के लिए देता है । उन्हों ने दो करोड़ य्वान की राशि प्रदान कर सिन्चांग कला कालेज के लिए छात्रावास और भोजनासय बनवाये । उन की चंदा राशि बहुधा छात्रों को सहायता स्वरूप दी जाती है । इस पर उन्हों ने कहाः

मैं ने अब तक 1860 से ज्यादा गरीब छात्रों को मदद दी है , बहुत से छात्र स्नातक होने के बाद देश के निर्माण व विकास काम में लग गए हैं , हमें कठिनाइयों से ग्रस्त लोगों को मदद देना चाहिए , ताकि देश को फायदा मिल सके ।

मायिर्जांग ने समाज को भारी रकम की धन राशि चंदा की है , पर वे खुद सीधा सादा जीवन बिताते हैं , वे न सिगरेट पीते है , न ही शराब , वे एक साधारण कार चलाते हैं , ड्राइवर भी नहीं रखा गया , उन का घर बहुत सादा है , उस का फर्शीक्षेत्रफल केवल अस्सी वर्ग मीटर है ।

उन की निस्वार्थ भावना से असमझ कर उन की क्रमशः दो पत्नी ने उन से तलाक दी । लेकिन उन की माता जी हेनजु उन का बराबर समर्थन करती है । उन्हों ने कहाः

मैं जानती हूं कि मेरे बेटे ठीक करते हैं , हमारा स्वयं का जीवन अच्छा हो गया है , तो समाज के अधिक लोगों को अच्छा जीवन दिलाना भी चाहिए ।

श्री मायिर्जांग खुशमिजाजी है और स्थानीय जातीय गीत गाने तथा स्थानीय शैली की बांसूरी व तबला बजाने के शौकिन हैं । हमारी कामना है कि उन का भावी जीवन संगीत की भांति खुशगवार हो।