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तब से वह धान की तमाम हड्डियां बीनकर जमा करने लगी और दूसरों की नजर बचाकर रोज थोड़ी सी पकाकर खाने लगी।
समय बीतता गया, लेकिन मीनीया भूख से मरने के बजाए पहले से ज्यादा स्वस्थ व सुन्दर होती गई।
उस के चहरे पर रौनक और गुलाबी आती गई।
अन्य दास दासियां नहीं जानते थे कि उस में इस परिवर्तन का क्या कारण है।
मीनीया की कोमल मुस्कराहट इतनी मधुर और आकर्षक थी कि उसे देखकर राजमहल के नौजवान दास उस पर रीझ जाते थे।
आखिर उन दास दासियों से न रहा गया और उन्होंने एक एक करके मीनीया के कमरे में आकर उस से पूछना शुरू किया.
"मीनीया, इतने दिनों की फाकाकशी के बाद भी तुम इतनी सुन्दर कैसे हो गई हो ? अब तो तुमको देखकर परियां भी झेंप जाएंगी।
आखिर क्या रहस्य है, हमें भी तो बताओ।"
तब मीनीया ने उन्हें बता दिया कि वह धान की हड्डियां खाती रही थी और उस की सुन्दरता का शायद यही कारण रहा हो।
फिर वह बोली.
"यह बात तुम लोग अपने तक ही रखना।
किसी दूसरे को मत बताना और रानी को तो भूलकर भी नहीं।"
इस तरह, अन्य दास दासियों ने भी धान की हड्डियां खानी शुरू कर दीं।
वे हर शाम चुपचाप मीनीया के कमरे में चले जाते, पेटभर चावल खाते और फिर चुपके से बाहर निकल आते।
जब रानी ने देखा कि मीनीया इतनी खूबसूरत हो गई है, तो उस का हृदय ईषर्या से भर उठा।
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