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(GMT+08:00) 2006-08-17 14:17:19    
विश्विख्यात चीनी विद्वान जी श्ये लिन और भारत के बीच आधी शताब्दी के घनिष्ठ संबंध

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डाक्टर जी श्ये लिन पेइचिंग विश्विद्यालय के प्रोफेसर चीन के सुप्रसिद्ध विद्वान, साहित्यकार और अनुवादक हैं। साथ ही वे एक शिक्षा शास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। प्रोफेसर श्री ची श्येन लिन का जन्म 6 अगस्त उन्नीस ग्यारह में पूर्वी चीन के शेन तुंग प्रांत की छिंग फिंग काऊंटी के एक किसान परिवार में हुआ। गरीबी के कारण, बचपन से ही वे अपनी जन्मभूमि को छोड़कर चाचा के साथ शान तुंग प्रांत की राजधानी जी नेन शहर में पढ़ने गये।

मिडिल स्कूल में ही उन्होंने साहित्यिक रचनाएं लिखना और श्रेष्ठ विदेशी रचनाओं का अनुवाद करना शुरु किया। वर्ष उन्नीस सौ तीस में वे छिंग ह्वा यूनिर्वसिटी के पश्चिमी साहित्य विभाग में पढ़ने लगे। वर्ष उन्नीस सौ चौंतीस में छिंग ह्वा यूनिविर्सिटी से स्नातक हो कर उन्होंने शेन तुंग प्रांत के जी नेन हाई स्कूल में एक साल तक चीनी भाषा औऱ साहित्य पढ़ाया। वर्ष उन्नीस सौ पैंतीस में उन्हें स्नातकोत्तर छात्र के रुप में जर्मनी पढ़ने भेजा गया था।

वर्ष उन्नीस सौ छत्तीस में वे जर्मनी के गोटीनगन युनिवर्सिटी में पढ़ने लगे। गोटीनगन एक छोटा कस्बा था, पर इस युनिवसिर्टी का इतिहास पांच छै सौ साल पुराना था। बहुत से सुप्रसिद्ध विद्वान, इसी युनिवसिर्टी के स्नागत थे। यह एक विश्विख्यात यूनिवर्सिटी था। कस्बे के कोने कोने में इस युनिवसिर्टी के कालेज और अनुसंधान ग्रह मौजूद थे। सारे कस्बे की आबादी का एक बटे पांच भाग विद्यार्थी थे।

यूनिवर्सिटी में जी श्ये लिन सुप्रसिद्ध विद्वान ई.वाल्डशिमिड( E. WALDSCHMID) से संस्कृत, पाली और प्राकृत सीखते थे। वर्ष उन्नीस सौ इकतीस में 1941 में उन्हें फी एच डी की उपाधि प्राप्त हुई। तब से वे प्रोफेसर ई.सेइज( E .SIEG )से तुखारा भाषा और वेद सीखने के साथ साथ बौदध धर्म की मिश्रित संस्कृत भाषा का अध्ययन करते रहे। पांच वर्ष के भीतर उन्होंने तीन श्रेष्ट पेपर लिखे जिन से उन का नाम चमकने लगा। वर्ष उन्नीस सौ छयालीस की ग्रीष्म काल में डाक्टर जी श्ये लिन स्वदेश लौटे। महान विद्वान छन येन ग की सिफारिश से वह पेइचिंग यूनिर्वर्सिटि द्वारा प्रोफेसर और पूर्वी साहित्य और भाषा विभाग के महा निदेशक के पद पर न्यूक्त किया गया। प्रोफेसर जी श्ये लिन को पेइचिंग यूनिर्वर्सिटि में पढ़ाते हुए आज तक पच्चास वर्ष हो चुके हैं।

पिछली आधी शताब्दी के दौरान, उन्होंने विद्याध्ययन के क्षेत्र में भारी उपलब्धियां हासिल की। कुछ वर्ष पहले 23 खंडों की जी श्ये लिन ग्रंथत्वली का संपादन किया चुका है और प्रसारित किया जा रहा है। इस ग्रंथावली के कोई अस्सी लाख चीनी शब्द हैं जिस में रिसर्च पेपर निबंध कहानियां और अनुदित रचनाएं शामिल हैं।

एक विद्वान के नाते डाक्टर जी श्ये लिन ने भाषा शास्त्र बौद्ध विद्या, इतिहास शास्त्र तथा तुलनात्मन साहित्य आदि अनेक क्षेत्रों में असाधारण कामयाबियां हासिल की। मगर डाक्टर जी श्ये लिन ने भारत के बारे में अपने अनुसंधान में सब से ज्यादा वक्त लगा दिया और सब से शान्दार कामयाबियां प्राप्त की। भारत के बारे में अनुसंधान के क्षेत्र में प्रकाशित हुई रचनाएं हैं, प्राचीन भारत की भाषाओं पर रिसर्च पेपर संग्रह, आदिम बौद्ध धर्म की भाषाएं, चीन भारत सांस्कृतिक संबंधों का इतिहास, चीन भारत सांस्कृतिक संबंधों पर रिसर्च पेपर संग्रह, भारत का संक्षिप्त इतिहास, वर्ष अठारह सौ सत्तावन से उनसठ तक भारतीय राष्ट्रीय उपद्रव, रामायण का अध्ययन, प्राचीन भारतीय साहित्यक इतिहास, बौद्ध धर्म और चीन भारत सांस्कृतिक आदान-पर्दान और चीन सरकार का इतिहास, चीनी कागन और कागज बनाने के तरीके का भारत में निर्यात, भारत में चीनी रेशम के निर्यात की समस्या का प्रारंभिक अध्ययन आदि आदि।

इस के अलावा, डाक्टर जी श्ये लिन ने खासा बड़ी तादाद में संस्कृत साहित्यकि रचनाओं का चीनी में अनुवाद किया। मिसाल के लिए प्राचीन भारतीय महा कवि कालीदास का नाटक शाकुनतला और विक्रमोर्वशीय(VIKRAMORASIYA) , दांडी(DANDIN) का उपन्यास दसकुमार चरित( DASAKUMARACARLITA ) । विशेष रुप से प्रशंसनीय है कि उन्होंने पांच साल से भारत के महा काव्य रामायण का चीनी अनुवाद किया। इस महा काव्य के कुल सात खंड हैं औऱ कोई बीस लाख चीनी शब्द हैं।

संस्कृत और संस्कृत साहित्य के अनुसंधान में प्राप्त असाधारण कामयाबियों की वजह से उन्हें वारणासी विश्विद्यालय का प्रशंसा पत्र पार्प्त कर सर्वोच्च कीर्ति अर्जित की।

विश्व के अकादमिक जगत में डाक्टर जी श्ये लिन का नाम आसमान पर आया और उन का व्यापक प्रभाव है। वर्ष उन्नीस सौ इकानवे में प्रोफेसर जी श्ये लिन की उनस्सीवीं जयन्ती के अवसर पर स्मारक ग्रंथ संग्रह प्रकाशित हुआ। जिस में एशिया, योरोप, उत्तरी अमरीका और ओशिनिया के 16 देशों व क्षेत्रों के अट्ठानवन विद्वानों के लेख या टिका टिपण्णियां शामिल हैं, जिस से डाक्टर जी श्ये लिन के प्रति देशी विदेशी विद्वानों का भारी सम्मान प्रतिबिंबित हुआ।

डाक्टर जी श्ये लिन सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बेहद महत्व देते आए हैं। अपने एक लेख में उन्होंने कहा, यह कतई नहीं है कि विश्व में संस्कृति का सृजन किसी एक राष्ट्र ने किया है, विश्व में अनेक राष्ट्र मौजूद है, किसी राष्ट्र की जन संख्या ज्यादा है औऱ किसी की कम। किसी राष्ट्र का इतिहास लम्बा है और किसी का छोटा। पर उन सबों ने मानव संस्कृति के विकास में योगदान किया है, हालांकि उन का योगदान भिन्न भिन्न है किसी का योगदान बड़ा है और किसी का छोटा। स्तर भी अलग अलग हैं। लेकिन मेरे विचार में संस्कृति की एक विशेषता है जब एक बार उस का सृजन किया गया, तो स्वभावतः मानव की गतिविधियों के जरिए उस का आदान प्रदान किया जाता है। इसलिए, सांस्कृतिक आदान-प्रदान हर वक्त औऱ हर जगह अस्तित्व में है, वह मानव समाज को आगे बढ़ाने की एक प्रेरक शक्ति है।

उन्होंने आगे चलकर कहा, सांस्कृतिक आदान-पर्दान पर मेरे अनुसंधान का दायरा काफी विशाल और दीर्घकालीन है। निसंदेह मेरे अनुसंधान का जोर चीन भारत सांस्कृतिक आदान-प्रदान इतिहास पर है। इस का यह कारण है कि मैं प्राचीन भारतीय बोद्ध संस्कृत का अध्ययन करता आया हूं। पेइचिंग विश्विद्यालय ने डाक्टर जी श्ये लिन को आजीवन प्रोफेसर की सम्मानित उपाधि से विभूषित किया। सारांश में चौरानवे वर्षीय डाक्टर जी श्ये लिन ने चीन और भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान में जो योगदान किया है, वह प्रशंसनीय ही नहीं, बल्कि वह मूल्यवान भी है यह कहा जा सकता है उन के योगदान ने चीन भारत सांस्कृतिक आदान-प्रदान में चार चांद लगा दिये हैं।