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ताओवादी विचारशाखा की प्रतिनिधि-रचनाएं "लाओ चि"और"च्वाङ चि"हैं।
"लाओ चि"नामक ग्रन्थ"ताओवादी नैतिकता सूत्र"के नाम से भी मशहूर है। कहा जाता है कि इस के रचयिता चओ राजवंश के शाही इतिहासकार लाओ तान थे, लेकिन वास्तव में उसका सम्पादन युद्धरत-राज्य काल के किसी अज्ञातनाम लेखक ने किया था।
अपने जमाने के भारी सामाजिक परिवर्तनों से गुजरते हुए"लाओ चि"के रचयिता ने यह देख लिया था कि अमीरी व गरीबी, सौभाग्य व दुर्भाग्य और शक्ति व दुर्बलता आदि बातें अपरिवर्तनीय नहीं थीं।
अनिश्चितता व परिवर्तनशीलता की इस धारणा से उनके दिमाग में एक प्रकार के सहज द्वन्द्ववादी विचार पै दा हुए। किन्तु वे यह भी मानते थे कि इन परिवर्तनों के सामने मनुष्य एकदम लाचार है और केवल"ताओ"(दैवी इच्छा) से ही सब कुछ तय होता है।
इसलिए मनुष्यों को"शान्त"और"निष्क्रिय"रहना चाहिए और अपने को"ताओ"के अनुकूल ढालना चाहिए। उनके विचार से "लघु आकार व कम आबादी"वाला समाज ही एक आदर्श समाज है, जिसमें लोग ज्ञान और आकांक्षा से वंचित होकर"जीवनभर एक दूसरे से सम्पर्क न करने"की स्थिति में रहते हैं।
"च्वाङ चि"के रचयिता च्वाङ चओ (लगभग 369 – 286 ई. पू. ) और उनके शिष्य थे। उनके विचार"लाओ चि"में व्यक्त विचारों से कहीं अधिक निराशावादी थे।
हान फ़ेइ (लगभग 280-233 ई.पू.) श्युन चि के शिष्य और हान राज्य के निवासी थे। उन के विचार "हान फ़ेइ चि"नामक पुस्तक में संकलित किए गए थे।
वे दैवी इच्छा और भूत-प्रेत जैसे अन्धविश्वासों तथा"पुरातन की ओर लौटने"के विचारों का विरोध करते थे तथा सभी सत्ता अधिराज के हाथ में केन्द्रित होने और विधि सम्मत शासन चला ने की वकालत करते थे। वे विधानवादी विचारशाखा के प्रतिनिधि थे।
छिन राज्य द्वारा चीन का एकीकरण किए जाने के पश्चात जो राजनीतिक कदम उठाए गए थे, उन में से ज्यादातर हान फ़ेइ के विचारों का ही मूर्त और विकसित रूप थे।
एक अन्य विचारशाखा युद्धविज्ञान से संबंधित थी, जिसके मुख्य प्रतिनिधि वसन्त और शरद काल के युद्धनीतिज्ञ सुन ऊ और युद्धरत राज्य काल के युद्धनीतिज्ञ सुन पिन थे।
"सुन चि का युद्धशास्त्र"सुन ऊ की और "सुन पिन का युद्धशास्त्र"सुन पिन की रचनाएं थीं। उन के द्वारा प्रतिपादित रणनीतिक व कार्यनीतिक विचारों में द्वंद्ववाद के तत्व मौजूद थे।
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