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बहुत पहले की बात है। एक राजा के राज्य के निवासी धान की भूसी खाकर जीवन बिताते थे। उन्हें यह मालूम न था कि भूसी के अन्दर का दाना अर्थात चावल एक उत्तम खाद्यान्न होता है।
वे उसे धान की हड्डी समझकर फेंक देते थे और भूसी को धान का मांस समझकर खा लेते थे।
उस राजा के महल में बहुत से दास दासियां थे। उन में मीनीया नामक एक दासा भी थी, जिस का का म खास तौर पर रानी की सेवा टहल करना था। रानी अपनी दासियों के साथ बड़ी क्रूरता का बर्ताव करती थी।
रानी की आज्ञा पर उस की दासियों को छोटी छोटी बातों पर डांट डपट सुननी पड़ती और लात घूंसों की मार सहनी पड़ती। अक्सर रानी की क्रूरता इतनी बढ़ जाती कि वह अपनी दासियों को पेटभर खाना भी न खाने देती।
एक दिन मीनीया को पानी लाने में कुछ देर हो गई। इस पर रानी नाराज होकर मीनीया से बोली
"मैं तुम्हें अच्छा खाना खिलानी हूं, लेकिन तुम मेरी सेवा अच्छी तरह नहीं करती हो। मेरा हुक्म है कि अब से तुमको खाना नहीं मिला करेगा।"
खाना मिले या न मिले, मीनीया को रानी की सेवा तो करनी ही थी, सो वह भूखे पेट रहकर पहले की तरह काम करती रही।
नतीजा यह हुआ कि वह दिन पर दुबली होती गई और उस का चेहरा शरद की मुरझाई हुई पत्तियों की तरह पीला पड़ता गया।
धीरे धीरे नौबत यहां तक आ पहुंची कि वह काम करने लायक ही न रही। उस ने मन ही मन सोचो
"ये लोग मुझे खाना तो देते नहीं, तो क्या इस तरह मैं भूख से मर जाऊं। नहीं , हरगिज न हीं। पेट भरने के लिए मैं धान की हड्डियां ही खाऊंगी।"
यह सोचकर उस ने चावल के मुट्ठीभर दाने इकट्ठा किए और उन्हें पका लिया। वह पहला निवाला मुंह में रखते ही आश्चर्यचकित हो गई।
"कितनी स्वादिष्ट हैं ये हड्डियां। मांस से भी ज्यादा स्वादिष्ट। सचमुच बहुत अच्छी हैं।"
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