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(GMT+08:00) 2006-06-16 15:14:46    
पमीर पठार पर सड़क देखरेख में जुटे मजदूरों की कहानी

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चीन के सिन्चांग वेवूर स्वायत्त प्रदेश में फैले थ्येनशान पर्वत माला और कोरम पर्वत श्रृंखला के संगम पर स्थित पमीर पठार में समुद्र सतह से 4000 मीटर ऊंची खुंचिराफ हिम घाटी विराजमान है , जहां बारहों माह बर्फ पड़ती है और धरती बराबर हिमाच्छादित होती है । लेकिन इस का दर्रा चीन और पाकिस्तान के बीच एक अहम रास्ता है । आज मैं आप को वहां सड़क की देखरेख में जुटे चीनी मजदूरों की कहानी सुनाऊंगी ।

दोस्तो , चीन और पाकिस्तान दोनों पड़ोसी देश हैं , दोनों देशों की सीमा पर निर्मित सड़क की देखरेख में देश के ताजिक जातीय मजदूर 22 सालों से निस्वार्थ सेवा करने आए हैं । चीन पाक सीमा से 14 किलोमीटर दूर चीन के पक्ष के भाग में खुंचिराफ सड़क देखरेख स्टेशन अवस्थित है । स्टेशन के प्रधान का नाम दोनिकुन जानी हैं , जो ताजिक जाति के हैं । वे इस स्टेशन में लगातार 22 सालों तक कार्यरत रहे हैं । अप्रैल के माह में जब चीन के अन्य स्थानों में वसंत का बहार आया है , तब हम यहां आए , तो पाया कि इस भूमि पर तीस सेंटीमीटर मोटी बर्फ ढकी हुई है , प्राकृतिक स्थिति बहुत दुभर है और आक्सिजन की कमी होती है । श्री दोनिकुन जानी के ऊपरी स्तरीय सड़क देखरेख विभाग के नेता श्री मेमेती .थुरसन ने हमें बतायाः

हमारी देखरेख में आयी ताशकुरकन सड़क रखरखाव विभाग के तहत पांच सड़क देखरेख स्टेशन हैं , जिन में से खुंचिराफ की प्राकृतिक स्थिति सब से कठोर है । अन्तरदेशीय व्यापार के लगातार बढ़ने के कारण इस सीमांत रास्ते से पाकिस्तान को माल पहुंचाने वाली गाड़ियों की संख्या तेजी से बढ़ गयी , भारी व्यस्तता के कारण सड़क को नुकसान भी ज्यादा पहुंचता है , जमीन के नीचे कीचड़ जमा होने के कारण सड़क अकसर खराब हुआ करती है । इस से सड़क की देखरेख का काम भी पहले से अधिक भारी हो गया । सड़क देखरेख में लगे मजदूरों की समय समय पर बदली अदला होती है , लेकिन सब से बड़ी उम्र वाले श्री दोनिकुन जानी नहीं चले और अपनी ड्युटी पर कायम रहें । अपने के बारे में बोलते हुए श्री दोनिकुन जानी ने कहाः

मेरे पिता ने अपने जीवन काल में मुझ से कहा था कि बहादुर बाज के पंख पठारी बर्फिली तूफान से तप कर मजबूत हो गए हैं , पर्वत चोटी पर चढ़ने के कटिबद्ध पुरूष पहाड़ के आधे ढ़लान पर रूक जाना नहीं चाहते हैं । मैं पमीर पठार पर ताजिक जाति के पहली पीढ़ी के सड़क देखरेख मजदूर का पुत्र हूं । खुंचिराफ स्टेशन मेरा अपना घर ही है । चूंकि खुंचिराफ दर्रा एक मौसमी प्रयोग वाला व्यापार पोर्ट है , हर साल पहली मई से तीस सितम्बर तक सड़क गुजारी के लिए खुली रहती है । इसलिए इन पांच महीनों में श्री दोनिकुन जानी के स्टेशन का काम सब से ज्यादा व्यस्त होता है । इस अवधि में उन्हें दिन रात स्टेशन में रहना पड़ता है। जब अन्य समय सड़क पारगमन के लिए बन्द होती है , तो भी इस बीच वे सड़क की देखरेख में लगते रहें । इस प्रकार सड़क देखरेख स्टेशन श्री दोनिकुन जानी और उन के सहकर्मियों का घर सा बन गया ।

श्री दोनिकुन जानी की पत्नी आयीम बुबुश भी सड़क मजदूर की संतान है , अपने पति के काम का समर्थन करने के लिए वे घर में बच्चों और सास की देखभाल में जुटी रहती है । पति के साथ ज्यादा से ज्यादा समय के लिए रहने के ख्याल से वे अकसर बच्चों व सास को लेकर सड़क स्टेशन में रहा करती हैं । इस की चर्चा में आयीम बुबुश ने कहाः

वे साल में लम्बे समय तक घर नहीं लौट सकते हैं , बच्चे बाप की याद करते है और उन की मां भी बेटे की याद करती हैं । इसलिए हम अकसर यहां आ कर पहाड़ पर रहते हैं , पहाड़ पर जीवन की स्थिति कठिन है , लेकिन हम परिवार लोग एक साथ रहते हैं , अंततः हमें बड़ी खुशी महसूस होती है ।

खुंचिराफ पहाड़ी घाटी में सड़क की देखरेख के लिए दोनिकुन जानी और उन के सहकर्मियों को सामान्य स्थिति से ज्यादा कठोर काम करना पड़ता है , यहां तक जिन्दगी का बलिदान भी हो सकता है । क्योंकि इस सड़क भाग में अकसर बर्फ का स्खलन हुआ करता है । उन का कर्तव्य आपात तौर पर भी सड़क को सुगम बनाना है । मार्च 1996 में एक परिवहन काफिला को पाक सीमा में हिमपात का सामना करना पड़ा । इस नाजुक स्थिति में दोनिकुन जानी ने बचाव दल को लेकर शून्य से नीचे तीस डिग्री तक के तापमान में एक मीटर मोटी बर्फ में रास्ता बनाते हुए दुर्घटना स्थल जा पहुंचे और वहां दो दिन तक मुसिबत में फंसे काफिले का पता लगाया और उसे बचाया । श्री जानी के साथ 16 साल तक काम कर रहे हान जाति के सहकर्मी श्री वु चुंग युङ ने कहा कि ऐसी आपात घटना अकसर हुआ करती है , श्री दोनिकुन जानी ने हर बार आपात बचाव काम में आगे आगे बढ़ते हुए निर्डरता का परिचय किया । श्री वु ने कहाः

जब कभी आपात बचाव का मौका आया , तो वे जरूर इस में भाग लेते हैं , बर्फ से ढ़के रास्ते का पता लगाने का काम भी वे खुद संभालते हैं। लकड़ी के डंडे से रास्ते का पता लगाने के दौरान वे कई बार बर्फ से ढके गढ़े में गिर पड़ते थे । घटना के बाद जब उस समय की हालत की याद आयी , तो भी भय का अनुभ होता है । लेकिन घटना के दिन वे समझते थे कि ऐसा करना एक सामान्य काम है , गढे में से बाहर निकल कर शरीर पर पड़ी बर्फ झाड़ कर वे आगे रास्ते का पता लगाने बढ़ने जाते थे ।

कामकाज में श्री दोनिकुन जानी श्रेष्ठ सिद्ध हुए हैं , इस के अलावा स्थानीय चरवाहों के साथ व्यवहार करने में भी वे बहुत अच्छे निकले हैं , वे अपने परिजन की भांति वहां के स्थानीय चरवाहों से बर्ताव करते हैं । खुंचिराफ दर्रे पर मौसम खराब होता है और वह एक निर्जन इलाका है , जहां केवल 26 चरवाह परिवार रहते हैं । वर्षों से श्री दोनिकुन जानी और उन के सहकर्मी इन चरवाहों की मदद करते रहे हैं । ताजिक चरवाह कुरबानजन मुहम्माद्रेयीम ने इस की चर्चा करते हुए कहाः

हम सभी 26 परिवारों को श्री दोनिकुन जानी की सहायता मिली है ,जब घर में कोई बीमार पड़ा , तो सब से पहले हमें उन की याद आती है , हर बार वे गाड़ी भेज कर मरीज को 120 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल में पहुंचा देते हैं । उन्हों ने हमें जो मदद दी है , वे अनगिनत हैं । श्री दोनिकुन जानी की एक बड़ी और दो छोटी बहनें हैं ,मांबाप के वे एकलौता पुत्र हैं । वर्षों से उन्हें यह कटु अनुभव हो रहा है कि घर वालों के लिए उन का योग बहुत कम है । मजदूर का काम कितना कठोर और खतरनाक क्यों न हो , वे उस से परवाह नहीं करते हैं । किन्तु उन के लिए सब से दुखमय बात यह है कि जब उन के पिता तीन सौ किलोमीट दूर काश्गर अस्पताल में चल बसे , तो उन की पिता से अंतिम मुलाकात भी नहीं हो पायी । श्री दोनिकुन जानी की माता जी अपने बेटे की स्थिति को बेहद समझती हैं । इस साल 65 वर्षीय माता हुक्सालिक मास्ताशि ने हमें बतायाः

बेटा जानी और उस के पिता दोनों सड़क मजदूर हैं , वर्षों से वे घर की देखरेख नहीं कर पाते । शुरू शुरू में मैं दोनिकुन जानी को खुंचिराफ स्टेशन में काम करने जाने पर सहमत नहीं थी , लेकिन अब तक उन्हों ने घर परिवार के लिए बहुत से गौरव सम्मान लाए हैं , मुझे इस प्रकार के श्रेष्ठ पुत्र पर गर्व महसूस हुआ ।

अब 40 सालाना श्री दोनिकुन जानी बहादुर बाज की भांति पमीर पठार पर चीन पाक की इस मैत्रीपूर्ण अन्तराष्ट्रीय सड़क की देखरेख कर पहरी देते रहे हैं , जो ताजिक जाति के लिए एक सम्मानीय बात साबित हुई है ।