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पश्चिम में वह पामीर पर्वतश्रंखला तक फैला हुआ था।
चीन में उस समय तत्कालीन छिङ राजधानी शुनथ्येन और पूर्वकालीन छिङ राजधानी शङचिङ के अलावा निम्नलिखित 18 प्रान्त थे, चिली, शानतुङ, शानशी, हनान, शेनशी, कानसू, सछ्वान , हूपेइ, हूनान, क्वाङतुङ, क्वाङशी, फूच्येन, च्याङशी, आनह्वेइ, चच्याङ, च्याङसू, युननान और क्वेइचओ।
इन के अतिरिक्त निम्न लिखित सीमावर्ती प्रदेश भी थे, भीतरी मंगोलिया, छिङहाए मंगोलिया, खालखा मंगोलिया, थाननू ऊलानहाए, शिनच्याङ और तिब्बत।
मिङ और छिङ राजवंशों के काल में विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्रों में अनेकानेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां देखने को मिलीं।
महान औषध वैज्ञानिक ली शिचन ने पन छाओ काड़ मू ( औषधकोष ) लिखा, जिस में 1800 से अधिक प्रकार की जड़ी बूटियों और 11000 से अधिक नुसखों की जानकारी दी गई थी।
बाद में इस का चीनी से अंग्रेजी , फ्रांसीसी, जर्मन , जापानी, लैटिन, कोरियाई और अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया।
मिङ राजवंश के अन्तिम काल के वैज्ञानिक सुङ इङशिङ ने चीन के कृषि और दस्तकारी के अनुभवों का निचोङ निकालते हुए थ्येन कुङ खाए ऊ नामक पुस्तक लिखी, जो उस जमाने के विज्ञान और तकनालीजी के स्तर को प्रतिबिम्बित करती है।
लगभग इसी काल में श्वी हुङचू नामक एक भूगोलज्ञ ने पहाड़ों व नदियों का सर्वेक्षण करने के लिए पूरे देश की यात्रा की और श्वी श्याखो की यात्रा नामक एक किताब लिखी, जिस में उसने अन्य बातों के अलावा दक्षिणपश्चिमी चीन में पानी द्वारा चूनापत्थर के कटाव से बनी भूमि की रूपरेखा का सविस्तार वर्णन किया।
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