• हिन्दी सेवा• चाइना रेडियो इंटरनेशनल
China Radio International
चीन की खबरें
विश्व समाचार
  आर्थिक समाचार
  संस्कृति
  विज्ञान व तकनीक
  खेल
  समाज

कारोबार-व्यापार

खेल और खिलाडी

चीन की अल्पसंख्यक जाति

विज्ञान, शिक्षा व स्वास्थ्य

सांस्कृतिक जीवन
(GMT+08:00) 2006-05-15 09:49:47    
डॉक्टर द्वारकानाथ.कोटनिस(1)

cri

आज के इस कार्यक्रम में मिरजापुर उत्तर-प्रदेश के प्रदीप कुमार प्रेमी और उन के जनहिन्द रेडियो श्रोता-संघ के सदस्यों के पत्र शामिल हैं।

मिरजापुर उत्तर-प्रदेश के प्रदीप कुमार प्रेमी और उन के जनहिन्द रेडियो श्रोता-संघ के सदस्यों ने अपने पत्र में हम से डॉक्टर द्वारकानाथ.कोटनिस और उन की पत्नी तथा बेटे के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। (पहला भाग)

दोस्तो, डॉक्टर कोटनिस चीन के महान दोस्त हैं। उन की कहानी एक ही कार्यक्रम में सुनाना संभव नहीं है। यहां हम सिर्फ अपनी स्मृति में अंकित उन के बारे में कुछ जानकारी आप को दे सकते हैं। आप के अनुरोध पर हम अपनी श्रोता-वाटिका में उन की कहानी छापेंगे, बशर्ते कि सही मौका मिले।

डॉक्टर कोटनिस का पूरा नाम द्वारकानाथ कोटनिस है। उन का जन्म 10 अक्तूबर 1910 को भारत के महाराष्ट्र के मुंबई शहर के उपनगर में हुआ था। देश में मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिदम्बर 1938 में वे भारतीय काँग्रेस के प्रबंध में एक चिकित्सा-दल के साथ चीन आए। इस चिकित्सा दल के चीन आने का उद्देश्य चीनी जनता को जापानी आक्रमण विरोधी संघर्ष में मदद देना था। इस दल के एक सदस्य के रूप में डॉक्टर कोटनिस चीन आते ही बड़े उत्साह के साथ चीनी जनता और चीनी सैनिकों की जान बचाने के उदार कार्य में लग गए। जनवरी 1939 में वे जापानी आक्रमण के विरूद्ध चीनी जनता के युद्ध के अग्रिम मौर्चे पर गए। उन का कहना था कि मेरा काम करने का स्थल अग्रिम मौर्चे पर है, जहां चीनी जनता और चीनी सैनिक देश के लिए खून बहा रहे हैं। मुझे वहां जाकर उन्हें बचाना चाहिए। उन्हों ने चीनी जनता के जापानी आक्रमण विरोधी कार्य को अपना ही कार्य मानकर जी-जान से करने की कोशिश की। 4 साल से भी कम समय में उन्हों ने अपनी उच्च चिकित्सीय तकनीक से हजारों चीनी सैनिकों की जान बचा ली और चीनी जनता के मुक्ति-कार्य में अमिट व बड़ा योगदान किया।

जुलाई 1942 में वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक सदस्य बन गए। चीन में जापानी आक्रमण विरोधी युद्ध में सहायता देने आए कनाडा के मशहूर अंतर्राष्ट्रीयतावादी डॉक्टर बेथ्रुन का देहांत होने के बाद वे उन की जगह बेथ्रुन अंतर्राष्ट्रीय शांति अस्पताल के प्रधानाचार्य नियुक्त किए गए।

9 दिसम्बर 1942 को चीनी चिकित्सकों के प्रशिक्षण में प्रयुक्त पाठ्यक्रम लिखने के समय उन की पुरानी बीमारी अचानक पुनः उभर आयी और जानलेवा साबित हुई। इस प्रकार सिर्फ 32 साल की अल्प आयु में ही उन का निधन हो गया। उन के निधन ने चीनी जनता को अपार दुख में डाल दिया। चीनी राष्ट्राध्यक्ष माओ त्से-तुंग ने स्वयं उन की श्रद्धांजलि में लिखा: भारतीय दोस्त डॉक्टर कोटनिस दूर से चीन आए। उन्हों ने चीन के यैनआन और अन्य उत्तरी क्षेत्रों में करीब 5 सालों तक काम किया। इस दौरान उन्हों ने हजारों चीनी लोगों व सैनिकों का इलाज किया, और हद से ज्यादा परिश्रम से उन की सेहत खराब हो गयी। उन के चल बसने से चीनी सेना की एक बांह टूट गई है और चीनी राष्ट्र अपना एक प्रिय दोस्त खो बैठा है। हमें उन की अंतर्राष्ट्रवादी भावना को कभी भी नहीं भूलना चाहिए।

चीन की मुक्ति के बाद चीनी जनता ने 1976 में डॉक्टर कोटनिस की याद के लिए हपे प्रांत की राजधानी शीच्याज़्वांग में जिस के निकट उन का निधन हुआ था, एक विशेष स्मारक-भवन बनवाया। हर साल उन की जयंती पर चीनी लोग वहां जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

ध्यान रहे, भारत स्थित प्रत्येक चीनी राजदूत अपना कार्यभार संभालने के शुरू में डॉक्टर कोटनिस के परिवारवालों से मिलने मुंबई जाते हैं। अप्रैल 2005 में चीनी प्रधान मंत्री वन च्या-पाओ ने अपनी भारत-यात्रा के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए कहा कि पिछली शताब्दी के 40 वाले दशक में चीनी जनता के जापानी फॉसिस्ट विरोधी संग्राम की कठिन घड़ी में भारत के प्रगतिशील युवक कोटनिस चीन गए। उन्हों ने चीनी जनता के मुक्ति-कार्य के लिए अपने मूल्यवान जीवन का बलिदान किया। वे चीनी जनता के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे। भारत की यात्रा के दौरान सरकारी कार्यक्रमों में व्यस्त होने के कारण श्री वन च्या-पाओ को डॉक्टर कोटनिस के परिजनों से मिलने का मौका नहीं मिल पाया। स्वदेश लौटने के तुरंत बाद उन्हों ने भारत स्थित चीनी राजदूत सुन यु-शी से उन का अभिवादन और उपहार डॉक्टर कोटनिस के परिजनों तक पहुंचाने को कहा।दो हफ्ते बाद राजदूत सुन यु-शी मुंबई गए।

डॉक्टर कोटनिस की पत्नी का नाम क्वो छिंग-लान है। वह 1939 में पेइचिंग से शानशी प्रांत गयीं, जहां डॉक्टर कोटनिस काम कर रहे थे और वहां एक चिकित्सा स्कूल में अध्यापिका बनीं। डॉक्टर कोटनिस अक्सर उस स्कूल में जाकर शिक्षा देते थे, जिस से उन दोनों को एक दूसरे से जान-पहचान करने का मौका मिला। दो सालों तक लगभग एक साथ काम करने के दौरान दोनों को एक दूसरे से मुहब्बत हो गयी और 25 नवम्बर 1941 को दोनों ने शादी कर ली। 23 अगस्त 1942 को उन का इकलौता बेटा जन्मा। चीनी नेता ने उसे "ईन-ह्वा"का नाम दिया। इस का अर्थ है भारत और चीन।डॉक्टर कोटनिस अपने बेटे से बेहद प्यार करते थे और अपनी पत्नी से कहा करते थे कि तुम्हें हमारे बच्चे की अच्छी तरह देखभाल करनी चाहिए। बड़े दुख की बात है कि डॉक्टर कोटनिस के देहांत के समय उन के इस बेटे को संसार में आए केवल 107 दिन हुए थे।

चीन लोक गणराज्य की स्थापना के बाद सरकार ने डॉक्टर कोटनिस की पत्नी क्वो छिंग-लान को पेइचिंग के एक प्राइमरी स्कूल में प्रिंसिपल नियुक्त किया और उन का बेटा भी इस स्कूल में भर्ती हुआ।कई साल बाद सुश्री क्वो छिंग-लान का पेइचिंग बाल अस्पताल में तबादला किया गया।

सन् 1958 में सुश्री क्वो छिंग-लान अपने बेटे के साथ भारत गईं। जाने से पहले तत्कालीन चीनी प्रधान मंत्री चो एन-लाई ने उन से मुलाकात के दौरान उन के छोटे बेटे से कहा: तुम्हें बड़े होने के बाद अपने पिता की तरह भारत और चीन दोनों देशों की जनता के लिए काम करना चाहिए।

भारत में सुश्री क्वो छिंग-लान और उन के बेटे का उत्साहपूर्ण स्वागत किया गया।तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री नेहरू ने उन से भेंट की और उन्हें रजत का एक कटोरा और एक चाकू उपहार में दिया।