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आज के इस कार्यक्रम में हम कोआथ, बिहार के सुनील केशरी, डी डी साहिबा, संजय केशरी, सीताराम केशरी, खुशबू केशरी बवीता केशरी, प्रियांका केशरी, एस के जिंदादिल, दरभंगा, बिहार के प्रहलाद कुमार ठाकुर, राम बाबू महतो मुकेश कुमार,मऊ, उत्तर प्रदेश के मोहम्मद दनिश के पत्र शामिल कर रहे हैं।
पिछले कार्यक्रम में हम ने चन में सब से बड़ी मीठी पानी की झील के बारे में कुछ जानकारी दी, तो आज के इस कार्यक्रम में आप इस का दूसरा भाग सुनिए।
शिच्यांग उइगुर स्वायत्त प्रदेश में कुल 139 झीले हैं। इन का कुल क्षेत्रफल 5500 वर्ग किलोमीटर है।
पोत्सीथंग झील चीन की मीठे पानी की सब से बड़ी भीतरी झील मानी जाती है। प्राचीन चीन में यह शीहाई कहलाती थी। इस का उद्गम थल मंडल टूटने से हुआ। झील समुद्र की सतह से 1048 मीटर ऊंची है, इस का जलक्षेत्र 980.4 वर्गकिलोमीटर है । खाईतू नदी इस झील में गिरती है, और मयूर नदी का उद्गम इस से हुआ है। यह एक भीमकाय प्राकृतिक जलाशय है।
इस झील से हर वर्ष 1000 टन मछलियों का उत्पादन होता है, यहां राजहंस जैसे मूल्यवान पक्षी का पता भी लगा है। झील से जुड़े दलदल का रकबा 400 वर्गकिलोमीटर है। दलदल में नरकुल पैदा होता है। चीन के चार नरकुल उत्पादन क्षेत्रों में पोत्सीथंग का नाम शामिल है। यहां के नरकुल की औसत ऊंचाई चार-पांच मीटर है, और सब से ऊंचा नरकुल दस मीटर तक का होता है। नरकुल के जंगलों में दुर्लभ पशुओं का भी पता लगाया गया है। नरकुल का प्रयोग कागज व टेक्सटाइल बनाने में किया जाता है।
इस झील को शिंच्यांग का हवाई कहा जाता है, क्योंकि यहां का दृश्य बहुत रमणीक है और यह पर्यटन के लिए बहुत अच्छी जगह है। यात्री यहां तैरने व मछली पकड़ने आते हैं। यहां की तंदूरी मछली बहुत ही स्वादिष्ट होती है।
अब दरभंगा, बिहार के प्रहलाद कुमार ठाकुर, राम बाबू महतो मुकेश कुमार का पत्र देखेते हैं। उन्होंने पूछा है कि चीन की सब से ऊंची बिल्डिंग कौन सी है व कहां स्थित है।
श्रोता दोस्तो, अच्छा, अब हम आपको इस सिलसिले में जानकारी देते हैं।
चीन की सब से ऊंची इमारत पूर्वी चीन के शांहाई शहर में स्थित है। 28 अक्टूबर 1998 को, इस इमारत का निर्माण पूरा हुआ। इमारत का नाम है चिनमाओ टावर।
शांहाई शहर के केंद्र में ह्वांगफू नदी के तट पर बैंकिंग व व्यापार केन्द्र है। चिनमाओ टावर इसी केन्द्र में स्थित है। इमारत की मालिक शांहाई व्यापार केन्द्र लिमिटेड कंपनी है। इस इमारत के निर्माण पर कंपनी ने 56 करोड़ अमेरिकी डालर का खर्च किये। इस इमारत में कुल 87 मंजिलें हैं और भूमिगत तीन मंजिलें भी। इमारत 23611 वर्गमीटर जमीन पर फैली है और इस का कुल क्षेत्रफल 2 लाख 90 हजार वर्गमीटर है। इस की ऊंचाई 420.5 मीटर है, जो वर्तमान में चीन में सब से ऊंची है और विश्व में मलयेशिया की राजधानी क्वालालंपुर के युगल टावर और अमेरिका के शिकागो के क्सेर्सी टावर के बाद तीसरे स्थान पर आती है।
टावर के आधार से 51 वीं मंजिल तक ऑफ़िस हैं जिन में दस हजार से अधिक व्यक्ति कार्य करते हैं। 52 वीं से 86 वीं मंजिल के बीच एक पांच सितारा होटल है। होटल में कुल 555 कमरे हैं और अनेक रेस्तरां भी। 87 वीं मंजिल पर एक हजार पर्यटक शांहाई शहर के सुन्दर दृश्य का विहंगावलोकन कर सकते हैं। टावर की लिफ़्ट यात्रियों को उसके आधार से पर्यटन मंजिल पर 45 सेकंडों में छोड़ती है।
टावर के अतिरिक्त अंग में बैंकिंग, व्यापार, सेवा, मनोरंजन और खेल केंद्र हैं।
अंत में मऊ, उत्तर प्रदेश के मोहम्मद दनिश का पत्र लें। उन्होंने पूछा है कि चीन के प्रथम राष्ट्रपति कौन थे और वे कब इस पद पर रहे।
मोहम्मद दनिश भाई, चीन के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर सुन यात्सेन थे।
उन का जन्म 12 नवंबर, 1866 को क्वांगतुंग प्रांत में हुआ था।
नवंबर, 1894 ( अठारह सौ चौरानवे) में सुन यात्सेन ने छिंग राजवंश की सरकार का तख्ता उलटने और चीन गणराज्य की स्थापना के उद्देश्य से होनोलूलू में "शिंगचुंगह्वेई"नामक पार्टी स्थापित की। फरवरी 1895 ( अठारह सौ पचानवे) में हांगकांग में इस पार्टी की शाखा स्थापित हुई और अक्टूबर में उसने क्वांगचओ में विद्रोह के प्रयास किए। विद्रोह के प्रयास नाकाम रहने पर सुन यात्सेन विवश होकर समुद्रपार भाग निकले।
10 अक्टूबर 1911 को, जब छिंग सरकार का तख्ता उलटने के उद्देश्य से उछांग विद्रोह का आरम्भ हुआ, तो विभिन्न प्रांतों के क्रांतिकारी उस में शामिल हुए। परिणामस्वरूप उछांग विद्रोह की लहर ने चीन के अंतिम छिंग राजवंश का तख्ता उलट दिया। इस के साथ चीन में कोई 2000 वर्ष पुरानी सामंती साम्राज्य व्यवस्था खत्म हो गई।
यह खबर पा कर सुन यात्सेन दिसंबर में स्वदेश लौटे, तो उन्हें 17 प्रांतों के प्रतिनिधियों ने चीन गणराज्य का अंतरिम राष्ट्रपति निर्वाचित किया। 1 जनवरी 1912 को, सुन यात्सेन ने नानचिंग में अपने पद की शपथ ग्रहण की और चीन गणराज्य की अंतरिम सरकार गठित की। चीन के इतिहास में यह पहली गणराज्य सरकार थी।
12 मार्च 1925 को, यकृत के कैंसर के कारण डाक्टर सुन यात्सेन का पेइचिंग में निधन हो गया।

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