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(GMT+08:00) 2005-10-14 09:30:50    
थाङ राजवंश में आन-शि विद्रोह

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थाङ राजवंश ने विशाल साम्राज्य पर अपना नियंत्रण सुदृढ़ करने के लिए शुरु से ही सीमावर्ती क्षेत्रों व रणनीतिक महत्व के भीतरी इलाकों में फौजी गवर्नर-जनरल नियुक्त करने की व्यवस्था अपनाई थी। धीरे-धीरे इन गवर्नर-जनरलों के अधिकार बढ़कर इतने ज्यादा हो गए कि वे अपने क्षेत्र में न केवल फौजी मामलों बल्कि वित्तीय व प्रशासनिक मामलों के भी इंचार्ज बन गए।

755 में फिङलू (वर्तमान ल्याओनिङ प्रान्त का दक्षिणपश्चिमी भाग और वर्तमान हपेइ प्रान्त का उत्तरपूर्वी भाग), फ़ानयाङ (वर्तमान पेइचिंग के आसपास का क्षेत्र) और हतुङ (वर्तमान शानशी प्रान्त के थाएय्वान के आसपास का क्षेत्र) के गवर्नर-जनरल आन लूशान ने अपने सर्वोच्च सहायक अधिकारी शि सिमिङ के साथ मिलकर थाङ शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यह इतिहास में आन-शि विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध है। दोनों विद्रोही नेता एक लाख पचास हजार सेनिकों के साथ चीछङ नामक स्थान से रवाना हुए और हपेइ व शानशी से होकर हनान पर हमला करने के लिए आगे बढ़े। आन लूशान ने ल्वोयाङ में खुद को सम्राट घोषित कर दिया और तत्पश्चात छाङआन पर हमला करके कब्जा कर लिया। थाङ सम्राट श्वेनचुङ (शासन-काल 712-756) सछ्वान भाग गया। बाद में, क्वो चिई और ली क्वाङपी नामक दो थाङ सेनापतियों ने उइगुर जाति के एक सैन्य-दल की सहायता से छाङआन और ल्वोयाङ को पुनः अपने अधिकार में ले लिया। अन्ततः, विद्रोहियों को आठ साल के युद्ध के बाद हार का मुंह देखना पड़ा।

आन-शि विद्रोह अपने साथ दुख और तकलीफें लेकर आया। खेती वस्तुतः चौपट हो गई और किसानों को जीविका की तलाश में घरबार छोड़कर शरणार्थी बनना पड़ा। केन्द्रीय सरकार बहुत कमजोर हो गई। देश के विभिन्न क्षेत्रों के गवर्नर-जनरलों ने इस परिस्थिति का लाभ उठाकर अपनी सेनाओं व इलाकों का विस्तार करना शुरु कर दिया। केन्द्रीय सरकार का अपने गैरिजन कमाण्डरों पर नियंत्तण नहीं रह गया तथा देश सामन्ती सरदारों द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित कर लिया गया। थाङ राजवंश शक्ति से दुर्बलता की ओर तथा समृद्धि से अवनति की ओर चल पड़ा।