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(GMT+08:00) 2005-06-27 20:33:17    
भारत जाने वाले महान यात्री ई जींग

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श्वेन च्यांग के बाद, भारत जाने वाले यात्रियों में ई जींग सब से महान था। उन्होंने श्वेन च्यांग के देहांत होने के सात वर्ष बाद छ सौ इकहत्तर (671) ईसवी में भारत की ओऱ प्रस्थान किया। वह छ सौ पंचानवे (695) ईसवी में चौबीस (24) वर्ष बाद स्वदेश लौटा । उस ने 法显 और श्वेन च्यांग दोनों की तुलना में अधिक समय तक विदेश में प्रवास किया।

ई जींग ने भारत जाते समय औऱ वहां से लौटते समय दोनों बार समुद्रमार्ग से यात्रा की। वह क्वांग छ्वेन से गया था औऱ वहीं लौट आया। उन्होंने कई दर्जन अन्य यात्रियो के साथ सफर की तैयारी की। लेकिन, जब यात्रा शुरु करने का समय आया, तो वे सब भाग खड़े हुए । इस तरह वह अकेला ही फारस के एक व्यापारिक पानी जहाज़ में सवार हो गया। वह पहले सुमात्रा और बाद में बंगाल के एक राज्य में पहुंचा। लौटती बार वह फिर एक बार सुमात्रा में रुका। कुछ समय वहां रुक कर वह कुछ बौद्ध ग्रंथों की प्रतिलिपियां तैयार करना चाहता था। पर जब कागज और स्याही चुक गई तो वह एक माल जहाज़ में किसी ऐसे आदमी को ढ़ूढने जा पहुंचा, जो उस की कागज़ व स्याही की मांग स्वदेश पहुंचा सके। सहसा अनुकूल हवा चल पड़ी औऱ जहाज़ ने अपने पाल चढ़ा दिए। इस तरह वह क्वांग चओ जा पहुंचा। चुंकि उस की पुस्कतें सुमात्रा में ही रह गई थीं। इसलिए, उसे फिर एक बार विदेश यात्रा करनी पड़ी । कुछ वर्ष गुजरने के बाद स्वदेश लौटकर उस ने अनुवाद कार्य आरम्भ कर दिया।

ई जींग ने तीसेक देशों की यात्रा की थी। प्रोफेसर स्वन बाओ कांग कहते हैं, उस ने भारत के कुछ राज्यों में लम्बे समय तक प्रवास किया था। भारत जाते समय और वहां से लौटते समय वह पर्याप्त अवधि तक सुमात्रा में रुका था।वह काल दक्षिणी सागरवर्ती देशों में बौद्ध धर्म का उत्कर्ष काल था। उन दिनों भारतीय संस्कृति वहां जोरों से फैल रही थी।ई जींग ने सुमात्रा में बौद्ध दर्शन औऱ संस्कृत का अध्ययन किया।

प्रोफेसर स्वन बाओ कांग ने आगे हमें यह बताया, दक्षिणी सागरवर्ती देशों की बौद्ध धर्म की स्थिति का स्वदेश भेजा गया विवरण नामक पुस्तक में ई जींग ने उक्त क्षेत्रों की बौद्ध धर्म की स्थिति का वर्णन किया है तथा वहां के जन जीवन औऱ संस्कृति का विशेष रुप से उल्लेख किया है। फा श्येन की रचना "बौद्ध राज्यों का विवरण " उनौर श्वेन च्यांग की रचना महा थांग राज्यवंश काल में पश्चिम की तीर्थ यात्रा का वृत्तान्त की ही तरह यह पुस्तक , इतिहास-कारों के लिए बहुत मूल्यवान है। इस का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है औऱ विश्व के अनेक विद्वानों का ध्यान इस की ओर आकर्षित हुआ है।

ई जींग ने विदेश प्रवास के दौरान, बौद्ध भिक्षुओं के चैत्यानुशासन और जीवन पद्धति का बारीकी से अनुशीलन किया। यही कारण है कि वह उन की जीवन स्थिति , चिकित्सा पद्धति औऱ रीति रिवाजों का बड़ी सूक्षमता से वर्णन कर सका। चीन लौटने के बाद उस के द्वारा अनुदित अनेक प्रस्तकों में चैत्यानुशासन के नियमों की चर्चा की गई है। हालांकि उन में केवल एक ही बौद्ध सम्प्रदाय की सम्पूर्ण नियमावली का अनुवाद किया गया है। इन पुस्तकों में चैत्यानुशासन के नियमों का वर्णम करते समय वास्त्व में पराचीन भारत की जीवन स्थिति का वर्णम किया गया है। साथ ही इन में अनेक कथा कहानियों और कुछ श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं को भी शामिल किया गया है।

ई जींग ने बौद्ध सूत्रों और दार्शनिक ग्रंथों का अनुवाद भी किया था। प्रोफेसर स्वन बाओ कांग ने परिचय देते हुए कहा, जबई जींग भारत गया था, उस काल में भारतीय बौद्ध धर्म में जादू टोने और मंत्र तंत्रों पर जोर दिया गया था। इसलिए, उस ने इस विष्य से संबंधित कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया तथा यह सीख लिया कि भारत औऱ दक्षिणी सागरवर्त्ती देशों के भिक्षु इन मंत्रों का पाठ कैसे करते हैं। चूंकि गूढ़ संस्कृत मंत्रों का अनुवाद नहीं हो सकता था, इसिलए, उस ने उन की ध्वनियों का लिप्या तरण मात्र किया। इस के लिए, उस ने संस्कृत भाषा की ध्वनियों के उच्चारण का अध्ययन किया। कहा जाता है किई जींग ने ही स्वदेश लौटने के बाद चीनी भिक्षुओं को मंत्रपाठ की संस्कृत पद्धति सिखायी थी।ई जींग ने एक संस्कृत कोष भी तैयार किया था। विदेश प्रवास के दौरान उस ने संस्कृत व्याकरण का गहरा अध्ययन किया था।

ई जींग चार सौ ग्रंथों को स्वदेश लाया। उन में से छप्पन 56 ग्रंथों का उस ने स्वयं अनुवाद किया। इस काम में उसे दस वर्ष लगे।

ई जींग ने " महा थांग काल में बौद्ध धर्म की खोज में यात्रा करने वाले विख्यात भिक्षुओं के जीवन चरित "नामक पुस्तक भी लिखी। जिस में उन तमाम चीनी भिक्षुओं के नाम औऱ जीवनी दिये गये हैं। जो भारत गये थे। इन भिक्षुओं में न सिर्फ वे लोग थे जिन की उस से विदेशों में मुलाकात हुई थी, बल्कि वे लोग भी थे जिन की यात्राओं के बारे में उसे जानकारी थी। उस काल में भारत यात्रा करने वाले तीर्थ यात्रियों की विशाल संख्या से पता चतला है कि उन दिनों दोनों देशों के आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध कितने घनिष्ट थे। इन बौद्ध भिक्षुओं ने व्यापारिक पानी जहाजों में अथवा रेगिस्तान पार करने वाले काफिलों के साथ यात्रा की थी। चुंकि इन तीर्थ यात्रियों का आना जाना जारी रहा था, इसलिए, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उन दिनों दोनों देशों के बीच यात्रा करने वाले व्यापारियों की संख्या तीर्थ यात्रियों की संख्या से कहीं ज्यादा रही होगी। उस समय समुद्र मार्ग स्थल मार्ग से अधिक सुविधाजनक था, क्योंकि ईसा की पांचवीं शताब्दी से जब फा श्येन ने यात्रा की थी,ई जींग के काल तक सागर यात्रा का काफी विकास हुआ।

ई जींग नालन्दा विहार में दस वर्ष रहा। बौद्ध ज्ञान विज्ञान के इस प्राचीन केंद्र के बारे में हमारी अधिकांश जानकारी का स्रोत दर असल श्वेन च्यांग औरई जींग द्वारा लिपिबद्ध विवरण है।

ई जींग की रचना में दिये गये चैत्य जीवन के अनेक वर्णन आज के भारतीय रीति रिवाज़ों से मिलते हैं। प्रोफेसर स्वन बाओ कांग का कहना है, ई जींग ने लिखा है कि भारतीय लोगों को हर रोज शाम को व्यायाम के रुप में सैर करने तथा दांतों की सफाई के लिए दातुन करने की आदत थी। ये दोनों आदतें भारतीयों में आज भी देखी जा सककती है। एक अन्य रिवाज, जो आज भी प्रचलित है, भोजन से पहले नित्य स्नान करने का है। पुरुष स्नान के वस्त्र पहन कर एक सार्वजनिक तालाब में जाते हैं औऱ शरीर पर खास तौर पर सिर औऱ पांवों पर एक विशेष प्रकार का लेप लगा लेते हैं।

ई जींग ने अभिवादन के जिस तरीके का वर्णन किया है, वह भारत में आज भी प्रचलित है।ई जींग ने भारतीय चिकित्सा प्रणाली की ओर विशेष ध्यान दिया था, इस का उल्लेख उस के द्वारा अनुदित कुछ पुस्तकों में मिलता है। उस की अपनी पुस्तक में भी दो खंडों में चिकित्सा विज्ञान की चर्चा की गई। उस ने परम्परागत भारतीय चिकित्सा विज्ञान की आठ चिकित्सा विधियों का उल्लेख किया है तथा आम लोगों द्वारा अपनाई जाने वाली उपवास चिकित्सा की चर्चा की है। अनेक भारतीय औषधियों से परिचित कराने के बाद उस ने एक्योपेन्क्चर और नष्ज देखने की विशिष्ट चीनी विधि का पक्ष पोषण किया है। जो चीनी चिकितसा पद्धति की विशेषता थी। उस ने लिखा है कि चीन में चार सौ से अधिक उत्यंत कारगर जड़ी बूटियां मौजूद हैं। शायद उसे उस समय जड़ी बुटियों की इतनी ही संख्या ज्ञात थी। लेकिन, वह निश्चित रुप से यह नहीं कह सका था कि उपवास चिकित्सा चीन में भी इलाज की एक कारगर विधि हो सकती है या नहीं।

ई जींग ने अन्तिम बौद्ध भिक्षु था, जिस ने भारत जाकर अध्ययन करने के बाद अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान किया।