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(GMT+08:00) 2005-06-22 09:46:44    
पेइचिंग विश्विद्यालय की प्रोफेसर गंग ईंगजडं

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हाल में चाइना रेडियो इंटरनेशनल के संवाददाता पेइचिंग विश्विद्यालय के प्रोफेसर श्रीमति गंग ईंगजडं से इंटरव्यू लेने का मौका मिला। श्रीमति गंग ईंगजडं इस विश्विद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंध कॉलेज की अफ्रीशियाई मामलात अनुसंधान प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं। वे मुख्य रुप से प्राचीन भारत चीन संबंध के इतिहास का अध्ययन करती हैं औऱ पढ़ाती हैं।

जब हम ने उन से अपने कार्य के संबंध में पूछा , तो उन्होंने कहा,यह सर्वविदित है कि इतिहास के आदि काल में ही चीन और भारत विश्व के पूर्व में खड़े हैं। पिछले हजारों वर्षों में उन्होंने मानव जाति के लिए अमर सभ्यता का सृजन किया, इन दोनों देशों की सभ्यताओं के पारस्परिक पदचन्हों की खोज में चीनी इतिहास के अनुसंधान के आधार पर पिछली शताब्दी के 70 वाले दशक के अंत से, मैं प्राचीन चीनी ग्रंथों और ऐतिहासिक पुस्तकों के कलमबन्द भारत संबंधी सामग्रियों की खोज करने की कोशिश करती रही। दसेक वर्षों के अथक प्रयत्न के बाद मैंने नौ लाख चीनी शब्दों वाले ---चीन के ऐतिहासिक ग्रंथों में दक्षिण एशिया संबंधी ऐतिहासिक सामग्री संकलन ---नामक पुसत्क लिखी। इस रचना में 90 फीसदी सामग्रियां , भारत के बारे में है।उन के अनुसार,इस रचना में ईसा पूर्व दो शताब्दी से लेकर सन 1820 तक के हम लम्बे ऐतिहासिक काल के लगभग तमाम भारत संबंधी ऐतिहासिक सामग्री सम्पादित की गई है। इन व्यवस्थित ऐतिहासिक सामग्री से भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक औऱ सामाजिक स्थितियां प्रतिबिन्बित की गई है। विशेष उल्लेखनीय बात है कि इन ऐतिहासिक सामग्रयां का अधिकांश भाग, चीनियों द्वारा स्वयं भारत जाकर उस का सर्वेक्षण किया जाने का फल है। उन में पांचवी शताब्दी के चीनी बौद्ध भिक्षु फा श्येन और सातवीं शताब्दी के श्वेन जांग सब से अधिक प्रसिद्ध है। फा श्येन की रचना बौद्ध राज्यों का विवरण और श्वेन जांग की रचनामहा थांग राजवंश काल में पश्चिम की तीर्थ यात्रा का वृत्तांत सिर्फ चीन में ही नहीं, बल्कि विश्व में भी अत्यन्त मूल्यवान मानी जाती है।

दक्षिण एशिया संबंधी ऐतिहासिक सामग्री संकलन---नामक मेरी पुस्तक ने चीनी विद्वानों की मान्यता प्राप्त की और अनेक विदेशी इतिहास रसिकों का ध्यान आकर्षित किया। उन में दो भारतीय भी हैं, वे दोनों बाद में मेरे विद्यार्थी बन गये। एक है, शन देन संग,जो आजकल अमरीका के एक विश्विद्यालय में पढ़ाते हैं। उन्होंने सन 1990 में पेइचिंग विश्विद्यालय के एम ए डिग्री प्राप्त की। दूसरे काना है कि व्यू फा ल , जिन्होंने 1999 से 2001 तक पेइचिंग विश्विद्यालय में पढ़ा। और उन्होंने पहली शताब्दी से छठी शताब्दी तक के भारत चीन संबंध नामक निबंध पास कर डाकरेट प्राप्त किया। वे आजकल विश्व बारती में चीनी पढ़ाते हैं। भारत की अनेक पत्र पत्रिकाओं से मेरी रचना बारे में परिचयात्मक लेख प्रकाशित किये गए। सन 1996 में भारतीय अखबार स्टेटमेन में नेहरू युनिवसिर्टी के भूतपूर्व प्रोफेसर राय का एक लेख चीनियों की आंखों में भारत छपा, इस लेख में उन्होंने मेरी रचना चीन के ऐतिहासिक ग्रंथों में दक्षिण एशिया संबंधी ऐतिहासिक सामग्री संकलन पर सर्वोगीण रुप से टीका टिप्पणी की।भारतीय ऐतिहासिक समालोचना ग्रंथ 18 के पहले और दूसरे अंक में मेरी रचना के बारे में टिप्पणीकार का लेख छपा। इसी बीच भारतीय इतिहास सोसाइटी ने मुझे भारत की यात्रा करने का निमंत्रण किया। 5 नवम्बर 1993 में मुझे विश्व में प्राचीन सभ्यता वाले महान भारत की यात्रा करने का अवसर मिला ।

मेजबान ने मेरी यात्रा के लिए अच्छे से अच्छा प्रबंध किया। जिस से, मुझे भारतीय मित्रों और विद्वानों के साथ व्यापक अकादमिक आदान-प्रदान औऱ विचार विनिमय करने का मौका प्राप्त किया। एक महीने की यात्रा के दौरान, मैंने भारतीय मित्रों के सामने मेरी रचना संबंधी परियात्मक भाषण दिया। नेहरु विश्विद्यालय में मैंने चीन भारत के बीच महान मैत्री की एक झलक नामक रिपोर्ट दी। दिल्ली विस्विद्लाय में मैंने बोद्ध भिक्षुओं की कथाएं और चीन भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-पर्दान शीर्षक तकरीर दी। इन गतिविधियों के जरिए भारतीय मित्र, इन एतिहासिक सामग्रियों का मूल्य समझ गये हैं। इतिहास अनुसंधान सोसाइटी के अध्यक्ष श्री आर कुमार ने मुझ से कहा मैं इस बात केलिए आप का आभारी हूं कि आप ने इन एतिहासिक सामग्रियों को अंग्रेजी में अनुवाद किया,जो भारत औऱ विश्व के अन्य देशों के इतिहास रसिकों के लिए सहायता प्राप्त है। मुझे विश्व भारती का दौरा करने का मौका भी मिला। जिस की स्थापना कवि रवीन्त्रनाथ ठाकुर ने की।श्रीमति गंग ईंगजडं ने हमें बताया, इस विश्व विख्यात विश्वविद्यालय में मैंने चीनी विभाग की प्रोफेसर आर गंकोरी से भेंट की। वे, पचासवीं शताब्दी के अंत में पेइचिंग विश्वविद्यालय में पढ़ती थी। मुलाकात ने मेरी वह सुहावना याद ताज़ा किया कि वर्ष 1954 के अक्तूबर में प्रधान मंत्री जवाहर नेहरु और उन की बैटी श्रीमति इन्द्रा गांधी चीनकी यात्रा पर पेइचिंग आए। तत्काल में मैं पेईचिंग विश्विद्यालय के इतिहास शास्त्र विभाग की तीसरे जमात की एक छात्रा थी। पेइचिंग हवाई अड्डे पर मैंने पेइचिंग के नागरिकों की ओर से गुलदस्ता प्रधान मंत्री नेहरू को भेंट स्वरुप दिया। पास में खड़े प्रधान मंत्री चाओ एल लाई ने मेरा हाथ पकड़ते हुए अंग्रेजी में प्रधान मंत्री नेहरू से कहा,"वे पेइचिंग विश्विद्यालय की विद्यार्थी हैं "जबकि वर्ष 1957 में , जब प्रधान मंत्री चाओ एन लाई ने विश्वभारती का दौरा किया, और गंकोली ने फूलों की मालाएं प्रधान मंत्री चाओ एन लाई के गले में पहनाई। आज मैंने और श्रीमति गंगोली ने यां एक दूसरे के हाथ में हाथ डालते हुए तत्काल के नजारे की याद ताज़ा किया। हम दोनों को यह पक्का विस्वास है कि मैत्री अमर है। हम दोनों को सौभाग्य महसूस था कि हम चीन और भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अपनी शक्ति अर्पित कर रहे हैं।श्रीमति गंग ईंगजडं कह रही हैं, नये युग की किरणों के प्रकाश में मैं और प्रोफेसर श्री थेन जुंग के साथ मिल कर, पिछले दो हजार वर्षों की चीन और भारत की सभ्यताएं नामक पुस्तक लिख रही हूं। इस पुस्तक के दो खंड हैं। पहले खंड का संपादन मैं कर रही हूं और दूसरे खंड का सम्पादन प्रोफेसर थेन जुंग कर रहे हैं। यह पुस्तक जल्दी ही चीनी और अंग्रेजी में प्रकाशित की जाएगी।

निस्संदेह , यह चीन भारत मैत्री का एक अन्य फूल होगी। इस के अलावा, मैं चीनी और दक्षिण एशियाई प्रायद्वीप नाम की अन्य एक पुस्तक लिख रही हूं।

पिछले आधी शताब्दी में मैंने भारत के साथ घनिष्ठ संबंध कायम किया है। और मैं इस बात पर गर्व महसूस करती हैं कि मैं चीन भारत मैत्री पुल की निर्माता बन सकती हूं।