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(GMT+08:00) 2005-06-17 18:46:19    
सुप्रसिद्ध चित्रकार श्यू पेई हुंग और भारत के बीच संबंध

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वर्ष उन्नीस सौ अड़तीस के बाद पढ़ने पढ़ाने के लिए भारत जाने वाले चीनी विद्वानों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती गई थी। जिन में छन हेन शन, छांग रन श्या, चिन ख मू और वू श्याओ लिन आदि विद्वान सब से मशहूर थे। कुछ विद्वान , चीन भारत सोसाइटी के माध्यम से और कुछ तो अन्य माध्ययमों के जरिए भारत गये थे। तब तक भारत जाने के माध्यम पहले से कहीं अधिक हो चुके थे।

सुप्रसिद्ध चित्रकार श्यू पेई हुंग महान कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निमंत्रण पर पढ़ाने के लिए विश्वभारती गये थे। वर्ष उन्नीस सौ उन्नतालीस में भारत पहुंचे थे और शान्तिनिकेतन के विश्व भारती में रहने लगे थे। वे गरमी की छुट्टियों में डार्जिलिन में रहते थे। उन्होंने भारत के अनेकों अनेक रचनाओं का भ्रमण किया था। सन उन्नीस सौ एक तालीस में उन्होंने भारत को छोड़ दिया । विश्व भारती में प्रवास के दौरान, उन्होंने रवीन्द्रनाथ के साथ अनेक मनोनुकूल दिन गुजरे। उन्होंने रवीन्द्रनाथ के लिए दसेक तस्वीरें बनायी, जिन में तेल चित्र स्कैच, कलम चित्र औऱ चीनी परम्परागत शैली वाले चित्र आदि शामिल थे। रवीन्द्रनाथ उन की कलाकृतियों की बहुत प्रशंसा करते थे। औऱ उन के लिए चित्र प्रदर्शनी आयोजित करने का सुझाव दिया। उस समय महात्मा गांधी शान्तिनिकेतन की यात्रा करने आए थे। रवीन्द्रनाथ ने उन के स्वागत में एक भव्य समारोह आयोजित किया, मौके पर श्यू पेई हुंग ने गांधी के लिए दो स्कैच बनाये। देखने में केवल रुप ही नहीं बल्कि भाव में भी लगता था। इस पर श्यू पेई हुंग ने संतोष के साथ कहा, महात्मा गांधी की ये दो तस्वीरें मैंने विश्व भारती के आयोजित स्वागत समारोह में बनायी है। उस समय मैं उन के दांयें में एक उचित स्थान पर था। अनेक फोटोग्राफर इसी स्थान पर एकत्र हुए थे। मेरे दोनों कंधों और पीठ पर सब पत्रकार थे। सो, यह सफलता आसानी से प्राप्त नहीं हुई है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने मुझे महात्मा गांधी से परिचय कराया औऱ दोनों देशों की मैत्री बढ़ाने के लिए मेरी चित्र प्रदर्शनी आयोजित कराने का सुझाव दिया। इस सुझाव का महात्मा गांधी ने खुशी खुशी अनुमोदन किया। नतीजे में शान्ति निकेतन और कलकत्ता दोनों जगहों में श्यू पेई हुंग की चित्र प्रदर्शनियां आयोजित की गई। रवीन्दर्नाथ ने स्वयं चित्र प्रदर्शनी के लिए भूमिका लिखी। भूमिका में कहा गया है, सौंदर्य की भाषा मानवजाति की समान भाषा है, और उस की ध्वनियां अनिर्वार्यतः विविधतापूर्ण होती हैं। महान चीनी कलाकार श्यू पेई हुंग ने लयबद्ध रेखाओं और रंगों में एक प्राचीन तम दृश्य, प्रस्तुत किया है । मैंने उन सभी चित्रों को गौर से देखा मुझे पक्का विश्वास है कि हमारे कला प्रेमियों को इन चित्रों से समृद्ध अन्तःप्रेरणा प्राप्त होगी।

श्यू पेई हुंग और रवीन्द्रनाथ की मित्रता घनिष्ट ओर विष्कष्ट थी। रवीन्द्रनाथ ने अपनी जिन्दगी भर में कुल लगभग दो हजार चित्र बनाये थे। उन्होंने विश्व के विभिन्न देशों में अनेकों बार अपनी चित्र प्रदर्शनी आयोजित करायी थीं। उन की आशा थी कि अपने चित्रों में से एक चुनिन्दा चित्र एलबम का संपादन किया जाएगा। उन्होंने श्यू पेई हुंग और विश्व भारती के ललित कला कालेज के महा निदेशक बोस से यह नाम करने के लिए अनुरोध किया। श्यू पेई हुंग और बोस ने दो दिन में ही तीन सौ चित्र चुने। इस पर रवीन्द्रनाथ बहुत संतुष्ट थे। रवीन्द्रनाथ की भतीजा अरुण ठाकुर भारत में एक सुप्रसिद्ध चित्रकार था। श्यू पेई हुंग अकसर उन के साथ कला पर बहस करते थे। उन के बीच की दोस्ती बहुत गहरी थी। रवीन्दर्नाथ के निजी सचिव और उन की पत्नी दोनों श्यू पेई हुंग के मित्र थे। वे भी मशहूर चित्रकार थे। श्यू पेई हुंग उन के घर में एक महीने तक रहे। उन्होंने उन्हें एक गिद्ध के चित्र भेंट स्वरुप दिया। जिसे वे बहुत कीमती समझते थे और अपने पास बखूबी सुरक्षित रखते थे।

भारत में जो आंखों देखा और कानों सुना था. उस से श्यू पेई हुंग के जीवन के अनुभवों को काफी ज्यादा समृद्ध बनाया गया। औऱ उस ने श्यू पेई हुंग की कला प्रेरणा को जगा दिया गया था। उन की अनेक प्रसिद्ध कला कृतियां इसी दौरान, पैदा हुई थी। मिसाल के लिए उन का सुप्रसिद्ध चित्र घोड़े भारत के डार्जिलीन के प्रवास के दौरान, तब उन्होंने बनाया था, जब उन्होंने यह खबर सुनी कि जापानी आक्रमण विरोधी युद्ध में चीनी सेना ने उत्तरी हू पेई प्रांत में भारी विष्य हासिल की। चित्र में जो घोड़े थे, हिमालय पर्वत की श्रेष्ठ नस्लवाले घोड़ों को देखकर ही बनाये गये थे। उन्होंने कहा था कि डार्जिलीन में श्रेष्ठ घोड़े किराये पर लिये जा सकते थे। चित्रकार श्यू पेई हुंग अकसर किराये पर घोड़ा लेकर बाहर घूमते थे। पहाड़ को हटाने की कोशिश करने वाला मूर्ख बुजुर्ग नामक अन्य एक बड़ा चित्र उन्होंने विश्व भारती में बनाना शुरु किया था। और डार्जिलीन में उसे पूरा किया।

उन्होंने इस चित्र में प्राचीन नीति कथा की भावना के अनुसार, यह चित्र बनाया था, चित्र से जापानी आक्रमण विरोधी युद्ध में चीनी राष्ट्र के अवश्य ही विजय होनी का दृढ़ मनोबल व्यक्त किया गया था। चित्र में अनेक व्यक्तियों के चित्र, भारतीय मांडलों से बनाये गये थे। इस का कारण बताते हुए उन्होंने कहा भारत में प्रवास के दौरान, उन्होंने कोई 50 चीनी परम्परागत शैली वाले चित्र, तेल चित्र या स्कैच बनाये थे। उन के कुछ चित्र आज भी विश्व भारती के स्मृति भवन में प्रदर्शित हैं। विश्व भारती की पत्रिका के विशेषांक में श्यू पेई हुंग की अनेक श्रेष्ठ रचनाएं छापी गई थी।

चित्र कारिता के अलावा, वे कविताएं भी लिखते थे। भारत के सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों के लिए उन्होंने अनेक कविताएं भी लिखी।