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(GMT+08:00) 2005-05-30 20:33:45    
चीन सचित्र के हिन्दी संस्करण के भूतपूर्व सम्पादक श्री लिन फूजी

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71 वर्षीय लिन फूजी का जन्म दक्षिण चीन के फू च्येन प्रांत के नेन एन शहर में हुआ। वर्ष 1955 में वे पेइचिंग विश्विद्दालय में पूर्वी भाषा व साहित्य विभाग के हिन्दी विभाग से स्नातक हुए। स्नातक होने के बाद वे विदेशी भाषा प्रकाशन गृह में काम करने लगे।

अपने बारे में वे कह रहे हैं, विदेशी भाषा प्रकाशन गृह में आने के बाद मैं अन्य कई चीनी साथियों के साथ मिलकर हिन्दी पुस्तकें औऱ चीन सचित्र के हिन्दी संस्करण प्रकाशित करने के तैयारी कार्य लगा रहा था। उस समय विदेशी भाषा प्रकाशन गृह में हिन्दी विभाग के अलावा, अरबी वियतनामी , थाई, बर्मी, ऊर्दू और फारसी आदि विभाग भी थे। उस समय, हम लोगों के सामने लातादाद मुश्किलें मौजूद तो थी, पर हम लोग जानते हैं कि चीन भारत मैत्री बढ़ाने और विशाल हिन्दी पाठकों को जनवादी चीन के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी देने के उद्देश्य ही चीनी पुस्तकों और चीन सचित्र के हिन्दी संस्करण का परकाशन किया जाएगा।

आखिर में हम ने तरह तरह की कठिनाइयों को दूरकर चीन की आम जानकारी के बरे में अनेक पुस्तकों तथा श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं का हिन्दी संस्करण का परकाशन किया। इन के अलावा, हम ने मीस्कि दत्रिका चीन सचित्र का भई प्रकाशन करना शुरु किया। इस पत्रिका में हिन्दी पाठकों को नये चीन की वास्तविकता औऱ वर्तमान स्थिति से अवगत कराया जाता था। सितम्बर 1957 में चीन सचित्र के हिन्दी संस्करण प्रथम अंक निकलाष यह हिन्दी में भारतीय जनता को नये चीन के बारे में परिचय देने का प्रथम और एख मात्र पत्रिका थी। इस के प्रकाशन से भारतीय पाठकों में जबरदस्त प्रतिध्वनी पैदा हुई।

यह पूछे जाने पर आप ने कैसे औऱ क्यों भारत में दिल्लचस्पी रखी, श्री लिन फूजी जवाब में कह रहे हैं, पेइचिंग विश्विद्दालय में हिन्दी पढ़ने के वक्त, भारत के बारे में मुझे बहुत कम जानकारी थी। पर चीन के एक प्रसिद्ध उपन्यास पश्चिम की तीर्थ यात्रा के नायक श्वेन जांग मुझे आकर्षित करता आया था। प्राचीन काल में चीनी लोग भारत को देव राज्य कह कर पुकारते थे। चीन की ही तरह, उस की ज्योतिर्मय सभ्यता है औऱ उस का हजारों वर्ष का पुराना इतिहास है।

सन् 1951 में विश्विद्दालय में प्रविष्ट होने के बाद मैंने सिलसिलेवार और सर्वोगीण रुप से भारत की भाषा, साहित्य , संस्कृति, इतिहास का अध्ययन किया। सन् 1956 से 1964 तक पूरे 40 वर्षों में मैंने चीनी पुस्तकों व चीन सचित्र के हिन्दी संसकरण के अनुवाद औऱ प्रकाशन का काम किया। इसी दौरान, मैंने अनेकों लेख या रिपोर्टें लिखीं, जिन का भारतीय पाठकों ने भावमीना सवागत किया। उदाहरण के लिए भारतीय मेडिकल मिशन, डाक्टर कोटनिस , डाक्टर बसु, पेइचिंग के लगी भारतीय प्रदशनी, भारतीय फिल्म सप्ताह आदि आदि।

चीन सचित्र एक ऐसी मालिक पत्रिका है, जिस की विष्य वस्तुएं समृद्ध है, केवल चीन में ही नहीं, बल्कि विदेशों में उस का भी व्यापक प्रभाव है। उस के हिन्दी संस्करण को भारत, नेपाल और मोरिशस के पाठक भी खूब दाद देते हैं। उस समय केवल महीने में हिन्दी संस्करण में चीन सचित्र की 40 हजार प्तियों प्रकाशित की जाती थी। हर महीने में हमें पाठकों के सैकड़ों पत्र मिलते थे। अनेकों ने हम से तरह तरह के प्रश्न पूछे। हम कह सकते हैं कि इस पत्रिका ने चीन और भारत की जनता के बीच पारिस्परिक समझ और मैत्री को बढ़ाने में अच्छी भूमिका अदा कीं। इसी बीच मैंने अनेकों भारतीय विमूतियों से इंटरव्यू लिया औऱ उन के साथ गहरी दोस्ती कायम की। जिन में मशहूर लेखक महा पंडित राहुल सांस्कृतियन भी शामिल थे। उन्होंने कई बार चीन के तिब्बत सवायत प्रदेश की यात्रा की। वे तिब्बत के बौद्ध धर्म के विद्वान थे। इन के अलावा, भारच चीन मैत्री संघ के स्वर्गीय अध्यक्ष सुन्दर लाल की सिफारिश पर क्रमशः अनेक अधअयापक हिन्दी पढ़ाने के लिए पेइचिंग विश्विद्दालय में आये।उन में पुरुषोन्तम प्रसाद और उन की पत्नी तथा भानुचन्द्र वर्मा उल्लेखनीय थे। उन के चीनी लोगों का आदर और प्यार प्राप्त था।

मुझए याद है वर्ष 1979 में नयी दिल्ली में परथम अंतरराष्ट्रीय मेला लगा था, इस मेले में मुझे भाग लेने का सौभाग्य मिला। चीन का हॉल , मेले का सब से बड़ा हॉल था। रोज दर्शकों की संख्या दसियों हजार थी। आंकड़ों के अनुसार, चीनी हॉल के दर्शकों की संख्या लेखों तक पहुंच गई। भारतीय दर्शकों ने चीनी कक्ष में जो दिलचस्पी दिखायी, उस से मैं बहुत प्रभावित हुआ। इस से नेय चीन के प्रति भारतीय जनता की दोस्ती पूरी तरह जाहिर हुई। भारतीय जनता ने चीन के प्रति जो जोश और उत्साह व्यक्त किया, वह आज तक मेरी याद में है।

पिछले 40 वर्षों में चीन सचित्र के हिन्दी संस्करण के प्रकाशन में दसेक भारतीय विशेषकों ने सहायता दी थी। उन्होंने इस पत्रिका के प्रकाशन में भारी योगदान किया था। श्री जानकी बल्लभ विशेष रुप से उल्लेखनीय है। उन्होंने शुरु में ही हम लोगों की भरसक सहायता की। उन्होंने हम लोगों के हिन्दी स्तर उन्नत करने में कोई कसर उठा न रखी। इस मौके का फायदा उठाकर मैं उन्हें फिर एक बार हार्दिक धन्यवाद देता हूं। उक्त कार्यों के अलावा, मैंने अनेक चीनी पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद किया, उदाहरण के लिए चीन की लम्बी दीवार , चीनी लोक कथाएं आदि।

चीन भारत मैत्री का जिक्र करते हुए श्री लिन फूजी कह रहे हैं, चीन और भारत दोनों देशों की जन संख्या बीस करोड़ से अधिक हैं, जो सारी दुनिया की कुल जन संख्या का लगभग आधा भाग बनती हैं। दोनों देशों की समान आपबीती है। साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी उत्पीड़न व शोषण से घुट कारा पाने के बाद, दोनों देशों की जनता , अपने अपने देश का निर्माण में लगी रही। खास कर पिछले दसेक वर्षों में दोनों देशों ने आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक , वैज्ञानिक व तकनॉलोजिकल और सामाजिक क्षेत्र में शान्दार कामयाबियां हासिल की है। और जनता के जीवन में उल्लेखनीय सुधार आया है।

हालांकि दोनों देशों की आवाजाही में कुछ समय के लिए बाधाएं पड़ी थी। पर आम तौर पर देखा जाए, तो दोनों देशों के द्वारा प्रतिपादित शान्तिपूर्ण सहजीवन के पांच सिद्धांतों के मार्गदर्शन में औऱ दोनों देशों के नेताओं की पारस्परिक यात्राओं व सलाह मश्वरों के जरिए आखिकार अनेक क्षएत्रों में एकमतता हासिल हुई। जिस से दोनों देशों के बीच आदान-प्रदान के लिए श्रेष्ठ आधार तैयार किया गया। चीन और भारत जैसे महान बड़े देशों का दो हजार वर्षों का मैत्रीपूर्ण इतिहास है, यह दुनिया में बेमिसाल है। आज ये दो प्राचीन व कई सभ्यता वाले देश जोश खरोश के साथ लम्बे लम्बे डग मरते हुए आधुनिकिरण की दिशा में बढ़ रहे हैं। जिन्हें कोई भी ताकत नहीं रोक सकती। चीन भारत मैत्री पुल के निर्माण में मैं थोड़ा बहुत काम कर सकता हूं। यह मेरी जिन्दगी में एक सौभाग्यपूर्ण बात है। मैं दिल से यह कामना करता हूं कि चीन और भारत दिन ब दिन शक्तिशाली और समृद्धशाली हौ, जनता का जीवन सुखमय हों, और दोनों देशों की जनता की मैत्री प्रगाढ़ और गहती हो।