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इस कार्यक्रम में मैं आप को सुनवाऊंगी चीन के मशहूर बांसुरीवादक स्वर्गीय चाओ सोंग थिंग द्वारा बजायी गयी धुनें ।पहले सुनिए यह धुन। नाम है "वू च्यांग नदी की छटा"।
संगीत----"वू च्यांग नदी की छटा"
यह है चीन के मशहूर बांसुरीवादक स्वर्गीय चाओ सोंग थिंग द्वारा बजाई गई धुन "वू च्यांग नदी की छटा"।यह धुन चाओ सोंग थिंग ने दक्षिणी चीन के ज च्यांग प्रांत के एक लोकगीत के आधार पर रची थी। इस में चीन की वू च्यांग नदी के तटों की सुन्दरता का वर्णन किया गया है। संगीतकार ने इसमें अपने जन्मस्थान के प्रति गहरा प्यार भी व्यक्त किया है।
चाओ सोंग थिंग का जन्म वर्ष 1924 में दक्षिणी चीन के ज च्यांग प्रांत में हुआ था। नौ वर्ष की उम्र में वे बांसुरी सीखने लगे थे और चौदह वर्ष की आयु में प्रस्तुति देने लगे। चाओ सोंग थिंग ने अपने जन्मस्थान के कई लोक संगीतकारों से शिक्षा ली। इस से तरह उन्हें चीनी लोकसंगीत की पर्याप्त जानकारी हासिल हुई। उन्होंने अपने जन्मस्थान में जो कुछ सीखा था, वह बाद में उनकी की अपनी विशेष कलात्मक शैली बन गया। इस ने उनके संगीत के सफर की बुनियाद भी रखी।

चाओ सोंग थिंग प्राइमरी, मिडिल और नार्मल स्कूल के संगीत अध्यापक भी रहे। उन की शुरू से यही आशा थी कि जीवन भर चीनी संगीत के लिए कुछ न कुछ करेंगे। उनके न्यायाधीश पिता ने उन को कानून पढ़ने को विवश किया । इसलिए चाओ सोंग थिंन को अपना पसंदीदा संगीत विषय छोड़कर शांगहाई कानून कॉलेज में दाखिल होना पड़ा, लेकिन उनके दिल में बांसुरी विशेष स्थान बना चुकी थी।
वर्ष 1949 में चाओ सोंग थिंग ने कानून की पढ़ाई छोड़ दी और एक स्थानीय सांस्कृतिक संगीतमंडल में प्रवेश लिया। इसके बाद उन की कला प्रतिभा लोगों के सामने आने लगी।
संगीत--- "तड़के"
यह है चाओ सोंग थिंग द्वारा बांसुरी पर बजायी गयी धुन "तड़के" । इसे उन्होंने वर्ष 1954 में रचा था। तब वे उत्तर-पूर्वी चीन में रह रहे थे। हर वर्ष वे उत्तर-पूर्वी चीन के सुन्दर दृश्यों और स्थानीय लोगों के साथ कुछ समय हर्षोल्लास के साथ बिताते रहे। इस दौरान उन्होंने "तड़के" नामक यह धुन रची। दो वर्ष बाद 1956 में चाओ सोंग थिंग ने चीनी संगीत सप्ताह में इस धुन की प्रस्तुति दी जो बहुत सफल रही। "तड़के" को चाओ सोंग थिंग को मशहूर बनाने वाली धुन माना जाता है। इस धुन में बांसुरी की सुरीले स्वरों ने प्रकृति का सुंदर वर्णन किया है। सूर्योदय का समय है, तरह-तरह के पक्षी गा रहे हैं, अनेक जीव-जंतु उठ खड़े हो रहे हैं। तड़के का यह दृश्य कितना सुन्दर है।
चीन में बांसुरी वादन दक्षिणी व उत्तरी दो पक्षों में बंटा है। दक्षिणी शैली में बांसुरी के बहुत सुरीले, कोमल होने पर जोर दिया जाता है और उत्तरी शैली में जोशीले होने पर। चाओ सोंग थिंग ने दक्षिणी और उत्तरी दोनों शैलियों की सीमारेखा तोड़ कर दोनों की श्रेष्ठता को अपनाया। इस के साथ ही उन्होंने पश्चिमी बांसुरी की विशेषता के मेल से अपनी विशेष शैली विकसित की जो कोमल होने के साथ शक्ति से भरी है और दक्षिणी चीन के ग्रामीण क्षेत्र की विशेषता का भी एहसास कराती है। अब सुनिए उनकी एक और रचना, नाम है "सू सान की रवानगी"।
संगीत--"सू सान की रवानगी"
यह है चाओ सोंग थिंग द्वारा बांसुरी पर बजायी गयी धुन "सू सान की रवानगी"। इस नाम से चीन में एक मशहूप पेइचिंग ऑपेरा भी है जो एक प्रभावशाली कहानी कहता है। पुराने समय में सू सान नामक एक महिला का पति विष खाकर मर गया।इस पर पुलिस ने सू सान को गिरफ्तार किया और उसे अपने जन्मस्थान से बहुत दूर जाकर रहने की सजा दी। सुदूर स्थान की इस यात्रा के दौरान सू सान को भारी कठिनाइयां उठानी पड़ीं। सू सान का बचपन का एक दोस्त एक उच्चाधिकारी बन गया था। अपने इस दोस्त की सहायता से सू सान ने अपने को बेगुनाह साबित किया और मुक्ति पायी। "सू सान की अपने जन्मस्थान से रवानगी" नामक पेइचिंग ऑपेरा चीन में बहुत प्रसिद्ध है । इस में अपने जन्मस्थान से रवानगी के समय सू सान का दुख व्यक्त हुआ है और दर्शक बेगुनाह सू सान के प्रति सहानुभूति महसूस करते हैं।
चाओ सोंग थिंग द्वारा बजायी गयी धुन "सू सान की रवानगी" में चाओ सोंग थिंग ने बांसुरी पर पेइचिंग ऑपेरा की नकल की जिसने दर्शकों को एक विशेष भावना का एहसास कराया।
युवावस्था में चीनी लोकसंगीत के असर में चाओ सोंग थिंग ने अधिकतर धुनें ज च्यांग के स्थानीय ऑपेराओं तथा लोकगीतों के आधार पर रचीं। इन में ज च्यांग के लोकसंगीत की विशेषता झलकती थी और यह बाद में उन की बांसुरी धुनों की विशेषता बनी। सुनिए उन की एक और धुन।
संगीत
इस समय आप जो धुन सुन रहे हैं, उसे चाओ सोंग थिंग ने ज च्यांग के स्थानीय ऑपेरा वू ज्यू ऑपेरा की एक धुन के आधार पर रचा था।
चाओ सोंग थिंग ने ज च्यांग के कला विद्यालय में बांसुरी भी पढ़ाई। उन की बांसुरी वादन कला लोकसंगीत से आई थी। उन्होंने कभी किसी संगीत कॉलेज में शिक्षा नहीं पाई, फिर भी उन्हें इसकी पर्याप्त सांस्कृतिक, वैज्ञानिक व तकनीक जानकारी थी। उनकी पढ़ाने के लिए प्रयुक्त पाठ्यपुस्तक सरल थी। उन्होंने "बांसुरी का उद्गम" तथा "चीन में बांसुरी वादनकला के विकास" आदि लेख लिखे और "चाओ सोंग थिंग की बांसुरी धुनें"तथा "बांसुरी कला का इतिहास "आदि पुस्तकें प्रकाशित कीं। चीनी बांसुरी वादन के विकास में इस तरह उन्होंने भारी योगदान किया।
सुनिए चाओ सोंग थिंग की एक और बांसुरी धुन । नाम है "चाय की फसल का समय"। इसे चाओ सोंग थिंग ने चीन के बांसुरी वादन के दक्षिणी और उत्तरी पक्ष के मेल से प्रस्तुत किया। यह जोश भरी आवाज़ में दक्षिणी चीन के चाय के खेतों के सुन्दर दृश्य का वर्णन करती है। इसमें चाय की फ़सल के समय लड़कियों की खुशी व्यक्त हुई है।
संगीत--- "चाय की फसल का समय" 
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