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(GMT+08:00) 2005-02-16 15:45:17    
सिन्चांग के उज्जबेक जाति के विशेषज्ञ येरशती की कहानी

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 आप को मालूम हुआ होगा कि उत्तर पश्चिमी चीन में स्थित सिन्चांग वेवूर स्वायत्त प्रदेश एक अल्पसंख्यक जाति बहुल क्षेत्र है ,जहां वेवूर , कजाख , उज्जबेक ,कर्गज , मंगोल व ह्वी जैसी दस से ज्यादा अल्पसंख्यक जातियों के लोग रहते हैं , उन्हों ने कुदरत सौंदर्य से मनमोहक , रंगबिरंगे जातीय रीति रिवाजों से रोचक और प्राकृतिक संसाधनों से प्रचूर सुन्दर प्रदेश के निर्माण व विकास के लिए बड़ा योगदान किया था । इस अद्भुत भूमि और इस भूमि पर बसी हुई विभिन्न जातियों के जीवन के बारे में जानकारी के लिए आप को कौतुहट होगी । हां, इसे ध्यान में रख कर हम आगे कुछ महीनों में चीन के सिन्चांग वेवूर स्वायत्त प्रदेश के बारे में एक विशेष कार्यक्रम अल्पसंख्यक जाति कार्यक्रम के तहत प्रस्तुत करेंगे , नाम रखा हुआ है सिन्चांग का दौरा । सिन्चांग का दौरा विशेष कार्यक्रम में हम प्रस्तुत हर आलेख में एक प्रश्न भी पूछेंगे , महीने में एक बार ड्रो लॉटस के जरिए सही उत्तर देने वाले श्रोताओं में से --- विजेता चुनेंगे और सिन्चांग के विशेष रंगढंग के छोटे उपहार भेजेंगे , आशा है कि आप बढ़चढ कर हमारे इस विशेष कार्यक्रम में भाग लेने आएंगे । तो अब प्रस्तुत सिन्चांग का दौरा आलेखः

सिन्चांग का दौरा विशेष कार्यक्रम में पहले हम आप की सेवा में सिन्चांग वेवूर स्वायत्त प्रदेश की राजधानी ऊरूमुची शहर के अधीन ऊरूमुची काऊंटी के पाईयांगको गांव के उज्जबेक जाति के श्री येरशती.मलिक के संदर्भ में कुछ बताए । पाईयांगको गांव इधर के सालों में बकरी की ऊन बिक्री से खासा धनी हो गया है , जिस से गांव दूर निकट बहुत मशहूर है । गांव में बसे येरशती. मलिक बकरी पालने तथा बकरी के ऊन उत्पादन व अनुसंधान में माहिर हैं , उन के द्वारा विकसित बकरी की ऊन उत्पादन मात्रा दूसरों से तीन गुनी ज्यादा है । इसलिए येरशती . मलिक स्थानीय लोगों की जबान पर बकरी विशेषज्ञ कहा जाता है ।

येरशती.मलिक से मेरी मुलाकात सिन्चांग के ऊरूमुची ऊनी बकरी अनुसंधान संस्थान में हुई । 60 वर्षीय ये उज्जबेक जाति के बकरी विशेषज्ञ के बाल तो पक्के हुए है , पर देखने में बहुत ओजस्वी और स्वस्थ हैं । उन के द्वारा विकसित की गई नई नस्ल के ऊन देने वाले बकरी की चर्चा छिड़ी , तो उन की निगाह में आत्मविश्वास और जोश भरा नजर आया ।

मुझे बताया गया है कि तीस साल पहले येरशती .मलिक ऊरूमुची के एक कृषि कालेज से स्नातक होने के बाद पाईयांगको गांव आये । उस समय गांव बहुत गरीब था , गांव वासियों के मकान मिट्टी व लकड़ी से निर्मित हुए थे और बहुधा खस्ता हालत में पड़ गए थे , जमीन पर बकरी और गाय के गोबरों की मोटी परत जमी थी । कड़ाके की सर्दी से दाब न ला कर गांववासियों के बकरी जाड़ों के मौसम में बड़ी संख्या में दम तोड़ते थे । लेकिन इस हालत पर वहां के चरवाहे बड़े बेबसी हुए दिखते थे । गांववासियों को इस पिछड़ी हुई स्थिति से पिंड छुड़ाने के लिए येरशती. मलिक ने अपना ज्ञान अर्पित करने की मन ही मन ठान ली । इस की चर्चा में उन्हों ने कहाः

स्थानीय चरवाहों का जीवन बहुत मुश्किल था , लेकिन वे असाधारण मेहनत और सहनशील थे । उन के श्रेष्ठ चरित्र से प्रभावित हो कर मैं ने उन की अपने ज्ञान से मदद करने का संकल्प किया । वर्ष 1971 में मैं ने स्थानीय वास्तविकता के मुताबिक हान और वेवूर भाषाओं में पशुपालन पुस्तक लिखी और काऊंटी में चरवाहों को प्रशिक्षित करने वाली कक्षाएं खोलीं । पशुपालन का विज्ञान तकनीक सीखने के लिए चरवाहों में तीव्र जिज्ञासा है ।

विस्तृत जांच पड़ताल के आधार पर श्री येरशती .मलिक को पता चला कि पाईयांगको गांव में सूखा के दिन ज्यादा है , वर्षा कम होती है , रेतीली भूमि विशाल है और रेगिस्तान भी मिलता है । इस प्राकृतिक स्थिति में बकरी पालना उचित है , बकरी कड़ी सर्दी और बंजर जमीन में भी अच्छी तरह रहता है । लेकिन गांववासी बकरी पालना नहीं चाहते थे , क्यों कि उस की ऊन मात्रा कम थी । इस तरह येरशती , मलिक के सामने बकरी की ऊन मात्रा बढ़ाने का फोरी काम आ गया ।

उपरांत के कुछ सालों में येरशती .मलिक ने पहाड़ी चरगाहों में जा जा कर बकरी की गुणवत्ता उन्नत करने के लिए आंकड़े और सामग्री जुटाने की जीभर कोशिश की । बकरी की श्रेष्ठ नस्ल विकसित करने के लिए उन्हों ने उत्तर पूर्व चीन के बकरी और सिन्चांग के बकरी का संकर किया , जिस से जो नई नस्ल के बकरी पैदा हुए , उन की ऊन मात्रा पहले से दुगुनी अधिक हो गई । यह एक असाधारण कामयाबी है । ऊन की उत्पादन मात्रा की समस्या के हल के बाद फिर ऊन का रेश मोटा होने की समस्या भी उभरी , मोटा रेश वाले ऊन से बना ऊनी कपड़ा क्वालिटी में अच्छा नहीं है और दाम भी नीचा है ।

इस कठिनाई के सामने भी येलशती. मलिक का सिर नहीं झुका , उन्हों ने चरगाहों में मोटा रेश का कारण मालूम करने की अथक कोशिश की .एक रात उन्हों ने एक चरवाहे के घर में देखा कि इस घर के बकरी चमड़े बिस्तर के ऊन बहुत महीन थे , उस चरवाहे ने उसे जंगली बकरी का चमड़ा बताया । इस खबर से येरशती .मलिक को अपार खुशी हुई , उन्हों ने तुरंत जंगली बकरी व पालतु बकरी का संकर करने की योजना बनायी । पहाड़ पर जंगली बकरी पकड़ना काफी मुश्किल था , तो येरशती .मलिक ने चिड़िया घर का सहारा ले लिए । उन्हों ने चिड़िया घर में जंगली बकरी बाड़े के पास एक झोपड़ी बना कर पांच महीनों तक बेसारा लिया , समय पर जंगली व पालतु बकरियों के संकर बच्चे जन्मे , दुख की बात थी कि नन्हें बकरी बच्चे एक के बाद एक मर गए , अंत में जो एक बचा था , वह भी बीमार पड़ा । इसी नाजुक घड़ी पर येरशती की दो बेटियां भी बीमार पड़ी , इस दुविधा से बुरी तरह परेशान हुए येरशती . मलिक को अखिरकार संकर बकरी बचाने का विकल्प किया । आगे वह संकर बकरी तंदरूस्त पला बढ़ा , उस के ऊन बहुत महीन और बढ़िया निकले । उस का पीढ़ी दर पीढ़ी वंशवृद्धन होता गया , जो बोगता सफेद ऊन वाला बकरी के नाम से मशहूर हो गया ।