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(GMT+08:00) 2004-12-13 10:34:52    
मशहूर पेइचिंग ऑपेरा की कलाकार चाओ बाओ श्यो की कहानी

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पेइचिंग ऑपेरा चीन की राष्ट्रीय ऑपेरा माना जाता है। इस में विभिन्न पात्र लिंग, आयु, हैसियत तथा स्वभाव से विभाजित रहते हैं। चाओ बाओ श्यो पेइचिंग ऑपेरा में विशेष तौर पर बूढ़ी स्त्री या लाओ तान का अभिनय करती हैं।

कुछ समय पूर्व पेइचिंग में प्रदर्शित सिंफ़नी के मेल वाले पेइचिंग ऑपेरा मेई लान फ़ांग को बहुत सफलता मिली । पश्चिमी सिंफ़नी और पेइचिंग ओपेरा के मेल वाली इस विशेष प्रस्तुति ने चीनी दर्शकों को एक नया अनुभव प्रदान किया। इस में वर्तमान चीन के पेइचिंग ऑपेरा जगत के स्रर्वश्रेष्ठ अभिनेता व अभिनेत्री शामिल हुए। पेइचिंग ऑपेरा की अभिनेत्री चाओ बाओ श्यो भी इन में थीं। सिंफ़नी के मेल वाले पेइचिंग ऑपेरा मेई लान फ़ांग में चाओ बाओ श्यो ने मेई लान फ़ांग की सास की भूमिका निभाई। प्रस्तुति के दौरान उन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ व प्रभावशाली प्रदर्शन से दर्शकों की वाहवाही भी लूटी।

चाओ बाओ श्यो बचपन से ही पेइचिंग ऑपेरा की बड़ी शौकीन बन गईं। बचपन में बोआ श्यो कभी -कभार मां के साथ थिएटर जाकर पेइचिंग ऑपेरा भी देखती थीं और तभी उन्हें मंच पर सुन्दर कपड़े पहने रहने वाली खूबसूरत अभिनेत्रियां पसंद आने लगी थीं। जब पेइचिंग ऑपेरा देखने के बाद वे घर लौटतीं तो उन अभिनेत्रियों की नकल कर नाचती गातीं। 11 वर्ष की उम्र में चाओ बाओ श्यो ने पेइचिंग ऑपेरा स्कूल में दाखिला लिया और औपचारिक तौर पर पेइचिंग ऑपेरा सीखने लगीं। पेइचिंग ऑपेरा स्कूल में प्रवेश करने के बाद नन्ही बाओ श्यो को अपनी इच्छा के विपरीत लाओ तान की भूमिका करनी पड़ी। यह नन्ही बाओ श्यो की इच्छा की सुन्दरी के पात्र से कहीं दूर था। इसलिए तब बाओ श्यो दुख से रोई भी और लाओ तान की भूमिका न सीखने की चाह भी रखी थी। लेकिन उन के अध्यापकों के विचार में चाओ बाओ श्यो की आवाज़ बहुत अच्छी थी, जो उन्हें लाओ तान के बहुत अनुकूल लगी। अध्यपकों की प्रेरणा से नन्ही बाओ श्यो ने एक साल तक लाओ तान के पात्र का अभ्यास किया और दूसरे साल उन का लाओ तान के प्रति विचार एकदम बदल गया । इस की याद करते चाओ बाओ श्यो ने कहा

"मेरी लाओ तान के पात्र में रुचि बाद में जगी? जब में इस पात्र का अभ्यास करने के दूसरे साल में थी, तो एक बार मैं ने पेइचिंग ऑपेरा "वीर य्वे फ़ेई की मां "में इस वीर की मां का अभिनय किया। मैंने मंच पर वाद्य के बिना गाया और दर्शकों ने खूब तालियां बजायीं । इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली और यह बहुत आनंदमय लगा। इस के बाद ही मैंने लाओ तान का पात्र स्वीकार किया। "

लेकिन कला का रास्ता आसान नहीं था। पेइचिंग ऑपेरा सीखना बहुत कठिन है। अभिनेताओं व अभिनेत्रियों को छोटी आयु से ही कठोर शारीरिक द्रेनिंग करनी पड़ती है। एक साधारण बच्चे के लिए यह बहुत कठिन होता है कि वह इस पर डटा रहे। पर चाओ बाओ श्यो इस रास्ते पर डटी रहीं और 19 वर्ष की उम्र में पेइचिंग ऑपेरा स्कूल से स्नातक भी हुईं । तब चीन में सांस्कृतिक क्रांति का काल चल रहा था। समूचे देश के युवा ग्रामीण क्षेत्रों में खेती करने जा रहे थे। चाओ बाओ श्यो उन में से एक थी। इस तरह वे दस वर्षों तक पेइचिंग ऑपेरा में अभिनय करने का अवसर नहीं पा सकीं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में भी उन्होंने पेइचिंग ऑपेरा का बुनियादी अभ्यास जारी रखा।

1970 वाले दशक के अंत में चाओ बाओ श्यो पेइचिंग ऑपेरा मंच पर वापस लौटीं। अपनी अभिनय तकनीक बहाल करने के लिए वे चीनी ऑपेरा मंडल के मशहूर लाओ तान अभिनेता ली चिंग छ्वुआन से सीखने लगीं और पेइचिंग ऑपेरा के अध्यपकों की सहायता से मशहूर पेइचिंग ऑपेरा "ली ख्वे का मां को देखना " में सुधार भी करने लगीं। पेइचिंग ऑपेरा रचने की चाओ बाओ श्यो की प्रथम कोशिश थी। इस की चर्चा में उन्होंने कहा

"इस में सुधार मैं ने इसलिए किया, क्यों कि में मैं गाते हुए अभिनय करना पसंद करती हूँ। तब पेइचिंग ऑपेरा में लाओ तान के पात्र का मुख्य काम गाना ही था और उसमे अभिनय का तत्व कम था। मैं भावुक हूँ । इसलिए गाते हुए अभिनय करना ज्यादा पसंद करती हूँ ।मैं ने अपने साथियों को नाटक में सुधार करने का सुझाव दिया।"

पेइचिंग ऑपेरा "ली ख्वे का मां को देखना " में चीन कं सोंग राजवंश के ली ख्वे नामक वीर की अपने साथियों के साथ मिल कर इस राजवंश का तख्ता उलटने के लिए अपनी मां से विदा लेने और फिर कई सालों बाद अपनी मां को देखने की इच्छा होने पर घर वापस लौटने की कहानी है। ली ख्वे अपनी मां को साथ लेकर विद्रोह क्षेत्र जाने का फैसला करता है लेकिन रास्ते में एक बाघ उस की मां को मार खाता है। इससे ली ख्वे को बहुत दुख होता है और उस ने गुस्से में आ कर बाघ को मार डालता है। इस नाटक में चाओ बाओ श्यो ने वीर ली ख्वे की मां का इतना अच्छा अभिनय किया कि दर्शक रो तक पड़े।

चाओ बाओ श्यो पेइचिंग ऑपेरा के नाटकों में लाओ तान के पात्र का निरंतर सुधार करती रही हैं , जिसे दर्शकों की मान्यता भी हासिल हुई है।

1980 के दशक में चाओ बाओ श्यो ने कई बार आस्ट्रेलिया, जापान, चीन के हांग कांग विशेष प्रशासनिक क्षेत्र तथा थाई वान प्रांत आदि देशों व क्षेत्रों की यात्रा की। उन के अभिनेय का स्थानीय दर्शकों ने उच्च मूल्यांकन किया।

पेइचिंग ऑपेरा जगत में चाओ बाओ श्यो को बहुत समर्थ माना जाता है। चाओ बाओ श्यो के विचार में कला किसी देश की सीमा तक सीमित नहीं रहती और विभिन्न देशों की जनता के बीच आदान-प्रदान के समय उसकी भाषा भी बाधा नहीं बनती है।