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(GMT+08:00) 2004-10-27 19:31:46    
ताई उद्यान नाम के गांव का दौरा (दूसरा भाग)

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ताई उद्यान नाम का गांव सिश्वांगपान्ना ताई जातीय स्वायत्त प्रिफेक्चर की राजधानी च्येङ हुंग शहर से तीस किलोमीटर दूर है । बाहर की दुनिया से प्रभावित हो कर जहां च्येङ हुंग शहर के निवासी नए ढंग का आधुनिक जीवन बिता रहे हैं , वहां मात्र तीस किलोमीटर दूर ताई उद्यान गांव में स्थानीय लोग ताई जाति की तमाम परम्पराएं बनाए रखते हुए अपना पुराना जीवन ढर्रे पर चल रहे हैं । इस से बाहर से आने वाले लोगों के दिल में एक प्रकार की ऐसी कौतुहल उत्पन्न होगी , जो देखना चाहती है कि वहां के ताई लोग अखिरकार किस ढंग की जीवन बिताते हैं।

मन में संगीत का ख्याल आया , तो मधुर धुन कानों में आने लगी । असल में गांव के कुछ युवा गायक ताई जाति का परम्परागत प्रार्थना गीत गा रहे हैं। इस किस्म की मधुर धुन ताई जाति के विवाह और पूजा के समय बजाया जाता है , वह वाचन शैली में है । जो प्रार्थना और आशीर्वाद व्यक्त करता है । कहा जाता है कि इस वाचन गाना हजार वर्ष से चलता आया है और ताई गांवों में वह खासा लोकप्रिय होता है ।

ताई उद्यान में हम ने यह पाया है कि कुछ बुजुर्ग लगन के साथ वृक्ष पत्र पर बौध सूत्र तराश कर लिख रहे हैं , अस्सी से अधिक साल की उम्र में भी वे सुई जैसे पतली चाकू से पत्र पर ताई लिपि में सूत्र लिख सकते हैं , हमें बताया गया है कि उन का यह कौशल बालावस्था में मंदिर में सीखा गया था और केवल पुरूषों को सीखने की अनुमति है । इन पत्रों में ताई जाति के औषधि , खगोल और विधि जैसे विषय उपलब्ध है ।

लेकिन अब ये बुजुर्ग लोग अपने शौक से यह काम कर रहे हैं , जहां वे पर्यटकों को ताई जाति का यह परम्परागत कौशल दिखाना चाहते हैं , वहां लिखे हुए पत्रों को मंदिर के हवाले भी कर सकते हैं ।

ताई उद्यान में कई स्थापत्य शैली के मंदिर मिलते हैं , सुश्री युनवुन ने कहा कि ताई जाति के सभी लोग बौध धर्म में विश्वास रखते हैं , इसलिए हर गांव में मंदिर निर्मित हुआ है । सुश्री युनवुन हमें एक सुसज्जित हुए मंदिर के पास ले गई और बोलीः

"इस मंदिर का नाम ताफोश मठ है , जो ईस्वी 583 में बनाया गया था , इस का अब तक एक हजार चार सौ साल पुराना इतिहास रहा है , ताई जाति की सभी महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यवाहियां यहां आयोजित होती है । "

बौध धर्म में आस्था रखने का कारण होगा कि ताई जाति के लोग हमेशा शांत और विनम्र भावना से काम लेते हैं , वे उतावले व तेज मिजाज के नहीं हैं और दूसरों के साथ ईमानदारी से व्यवहार करते हैं ।

सुश्री युनवुन के साथ हम ताई गांव वासी के बांस के घर आए , घर की मालिकन श्रीमती युनपो ने अर्धउष्णी प्रदेश के फल परोस कर हमारा सत्कार किया , उस ने बताया कि उस की बड़ी बेटी पर्यटन सेवा का नौकरी करती है । युनपो के घर में तीन कमरे हैं , मकान के बाहर एक मंच पर दो कमरे और बनाये गए है , जिस में पर्यटक रहते हैं।

ताई उद्यान में पर्यटन उद्योग का काफी विकास हुआ है , पर्यटक ताई गांव वासियों द्वारा खोले होटल में रह सकते हैं , ताई वासियों से ताई गीत सीख सकते हैं , ताई का परम्परागत खाना खाते है , गांव का रात्री दृश्य देख सकते है और जल छिड़काव का खेल खेल सकते हैं । और ताई जाति के जीवन का अनुभव ले सकते हैं ।

श्रीमती युन पो ने हमें बताया कि ताई जाति के गांव वासी पहले केवल खेतीबाड़ी करते थे , जिस से आय ज्यादा नहीं थी । जब गांवों में पर्यटन व्यवसाय चलाया जाने लगा , तो उन की आय में खासा वृद्धि हो गई है ।

ताई उद्यान से बिदा लेने के समय संध्या की वेली पड़ी , ताई गांव शाम की धुंध में नहाने लगा , बांसों के मकानों और पेड़ों के बीच खाना पकाने से उठी धुंएं चारों दिशा में उड़ बिखर रही है , सुर्यास्त की सुनहरी किरणों में मंदिर की स्वर्णीय रंग की मीनार नुमा छत तेल चित्र का दृश्य प्रदान करती है , जो मन का बरबस मोहन करता है । काश , हम इसी सुन्दर नजारे का एक अंग बन जा सकते , तो अपने को इस विश्व का सब से सौभाग्य लोग समझते हैं ।