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सुबह चिऊंटा पीठ पर बोरी लदाए बिल से रेंगते हुए निकला । वह दूसरों की आंखों से बच कर बोरी को सोयाबिन के पौधे के पास रख कर फरार हो गया ।
सुर्योदय हुआ , गर्म गर्म धूप के सेंकने पर सोयाबिन के पौधों को बहुत सुखद महसूस हुआ । चिऊंटा की बोरी भी जिन्दा हो गई और हिलने लगी । फिर कुछ समय गुजरने के बाद वह बोरी अपने आप खुल गई , हाय , यह तो असली बोरी नहीं थी , दरअसल वह एफिड का अँडा था , जिस से धूप का ताप मिलने पर नन्ही नन्ही एफिड निकला था , एक छोटा एफिड अभी अभी खोल से बाहर आया ।
एफिड सोयाबिन के पौधे पर चढ़ा , उस का सुई रूपी मुंह पौधे के पत्ते के अन्दर चुभ गया और रस चुसने लगा । चूसते पीते छोटे एफिड का पेट लगातार बढ़ते हुए फुला फुला सा बन गया ।
 चिऊंटा दौड़ कर आया , उस ने एफिड के पेट पर थपथपाया, जिस से एफिड के पुच्छ से मधु -रस बाहर निकलने लगा । अब चिऊंटा की बोरी की कलई खुल गई थी , वह उस में एफिड को पालता था , वह एफिड को अपने को दुध देने वाली गाय जैसा समझता था , जब उसे भूख लगती थी , तो वह एफिड के पुच्छ से निकलने वाला रस पीता था , मानो मनुष्य गाय का दुध पीता हो ।
फिर कुछ समय बीत गया , एफिड ने पौधे के रस चूसने के बाद अंडे देना शुरू किया , अंडे काफी संख्या में दिए गए थे , धूप सेंकने पर अंडों से नए एफिडों का जन्म हुआ , उन्हों ने जी भर कर सोयाबिन के पत्तों से रस चूसने की भरपूर कोशिश की , जिस से सोयाबीन के पौधे मुरझे हो गए ।
 इसी नाजुक घड़ी पर एक लेडीबाग कही से उड़ कर आई , वह सात धब्बों वाली लेडीबाग था , उस ने देखा कि एफिड पौधे पर अत्याचार कर रहे हैं , तो उसे बड़ा क्रोध आया , उस ने अपना जबड़ा मार मार कर सभी एफिडों को निगल कर साफ कर दिया ।
लेडीबाग की मदद से सोयाबीन के पौधे फिर स्वस्थ हो गए , उस ने लेडीबाग को शुक्रिया अदा करते हुए कहा , तुम वाकई हमारे मित्र है ।
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