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कुछ समय पूर्व चीन सरकार ने अनेक कलाकारों को "सर्वश्रेष्ठ कला चरित्र" वाले कलाकार का पुरस्कार प्रदान कर सम्मानिक किया । मशहूर चीनी गायिका क्वुआन मू छ्वुन उन में से एक हैं । आज के कार्यक्रम में मैं आप को दूंगी ,क्वुआन मू छ्वुन का परिचय । सुनिए "तुरूफ़ान का अंगूर पक्का हो गया"नामक गीत ।
गीत का भावार्थ कुछ इस प्रकार है 
कलिमू रंगरूट के रूप में सीमा चौकी जा रहा है
जाते ही उस ने बगीचे में अंगूर का एक वृक्ष लगाया
आनार्हान नामक लड़की
लगन से इस हरे पौध की सिंचाई करती है
बर्फिले पहाड़ के पानी से
अंगूर की जड़ मिट्टी में गहरी पकड़ी है
और लम्बी लम्बी लतें लड़की के ढांचे पर लपेटी हैं
वसंत की वर्षा में शरद के सुर्य किरणों से
अंगूर के फल पक्के हो गये हैं
कालिमू वीर युद्धा पदवी से सम्मानिक किया गया
खुशखबरी से लड़की आनार्हान का दिल झूम उठा .
दूर की चौकी की ओर निहाती हुई
मिट्ठे अंगूर को सीमा चौकी को भेजा
तुरूफान का अंगूर पक्का हो गया
आनार्हान का दिल झूम उठा मयूर सा
तुरूफान का अंगूर पक्का हो गया
आनार्हान का दिल नशा से भरा हुआ ।
चीनी गायिका क्वुआन मू छ्वुन का जन्म वर्ष 1953 में मध्य चीन के ह नान प्रांत में हुआ। उन के पीता जी एक पत्रिका के संपादक थे और माता संगीत के प्रेमी । अपनी माता से प्रभावित हो कर बचपन से ही क्वुआन मू छ्वुन में संगीत व नृत्य पर प्रतीभा दिखी । लेकिन खेद की बात है कि 10 वर्ष की उम्र में उन की माता का देहांत हो गया । उस समय चीन "सांस्कृतिकमहा क्रांति"के युग से गुजर रहा था , इसलिए क्वुआन मू छ्वुन का कैरियर संगीत के क्षेत्र में शुरू नहीं हो पाया था । मिडिल स्कूल से स्नातक होने के बाद वे एक कारखाने में प्रवेश कर एक मजदूरिन बन गयी । कारखाने के भारी काम के बावजूद क्वुआन मू छ्वुन के दिल में संगीत के प्रति प्रेम नहीं मिटा । काम से अवकाश समय में वे गीत गाने का अभ्यास किया करती थी । उसी समय कारखाने के पीछे एक बड़ा तालाब था और तड़के के समय वहां बहुत शांत था । इस लिए क्वुआन मू छ्वुन अकसर तालाब के पास जाकर गीत गाने का अभ्यास करती थी ।जब कारखाने के मजदूरों को पता चला कि क्वुआन मू छ्वुन संगीत की बड़ी शौकिन है , तो उन्होंने उन का समर्थन ही नहीं, बड़ी प्रेरणा भी दी । इस से क्वुआन मू छ्वु का गायन स्तर लगातार उन्नत होता गया और बाद में वे कारखाने की एक सितारा बन गयी । जब कभी कारखाने के मजदूरों के सांस्कृतिक समारोह का आयोजन हुआ करता , तो क्वुआन मू छ्वुन अवश्य ही मंच पर चढ़कर गाने का कार्यक्रम पेश करती थी । उन के गीतों को कारखाने के मजदूरों से हमेशा प्रशंसा मिलती रही । इस लिए कारखाने में उन का जीवन क्वुआन मू छ्वुन के लिए अविस्मर्णीय बन गया । "तबला बजाते हुए गाना गा रही हूँ मैं" नामक गीत में चीन के शिंग च्यांग वेइगुर स्वायत्त प्रदेश की अल्पसंख्यक जातियों के नये जीवन का वर्णन किया गया ।
गीत का भावार्थ कुछ इस प्रकार है
तबला बजा है , गाना गा रही हूं मैं
घाड़े पर सवार पहाड़ पर चढ़ती हूं मैं
नजर आया है गाय बकरियों का झुंड घास मैदान पर
तबला बजा है , गाना गा उठी मैं,
खुशी में लहरी
गुंज रही है मेरी आवाज़ पहाड़ से पार
खुशहाली के फूल खिले हैं
घास मैदान में रंगबिरंगे बिखरे ।
तबला बजा है , गाना गा रही हूं मैं,
घाड़े पर सवार नदी को पार करती हूं
नदी की लहर के साथ तैरती है मेरी आवाज
जन्मभूमि के हर कोने पर फैला हुआ मेरा गीत
तबला बजा है , गीत गाती हूं मैं,
खुशी में डूबी
सुन्दर जीवन के गुणगान में गाती हूं मैं
सीमावर्ती क्षेत्र से निहाती हूँ पेइचिंग की ओर
ढेर सारे गीत पेश करती हूं ।
हम सभी जातियों के लोग आगे बढ़ते हैं
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मार्गदर्शन में
समाजवादी रास्ता कितना प्रशस्त रहा वह है
तबला बजा है गीत गाती हूं मैं,
खुशी में मस्त
याद करती हूं सदासदैव
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का प्यार
वर्ष 1978 में चीन में सुधार व खुलेपन की नीति लागू होने लगी । क्वुआन मू छ्वन का भी अपना कला का वसंत ऋतु आया । वे कारखाने से थ्येन चीन नृत्य गान मंडली में प्रवेश कर गई और एक पेशेवर गायिका बन गयी । पानी में तैरती मछली की तरह परवान चढ़ कर चार पांच वर्षों में ही क्वुआन मू छ्वुन अपनी मिट्ठी आज़ाज के जरिए चीन में लोकप्रिय हो गई । मशहूर चीनी संगीतकार ली दे लुन ने क्वुआन मू छ्वुन का उच्च मुल्यांकन करते हुए कहा कि उन की आवाज़ जमीन पर रखे हुए वाओलिनसेलो के बराबर है , और आंजल की ऊंगलियों से वाओलिन बजाने से जो मिट्ठी आवाज़ निकलती ,वह उन की है । अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में ऐसी आवाज़ बहुत कम मिलती है ।
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