लूलिन सेना हूपेइ प्रान्त की ताङयाङ काउन्टी की लूलिन पर्वतमाला को आधार-क्षेत्र बनाकर विकसित हुई थी। उस के नेता वाङ ख्वाङ और वाङ फ़ङ थे। 17 ईसवी में उन्होंने विद्रोह का झंडा बुलन्द कर दिया, जिसमें आसपास के इलाकों के किसान बड़े जोश से शामिल हो गए। बाद में वे लूलिन पर्वतमाला को छोड़कर नानच्युन (वर्तमान हूपेइ प्रान्त के च्याङलिङ), नानयाङ (वर्तमान हनान प्रान्त के नानयाङ) और अन्य स्थानों में लड़ाइयां लड़ते रहे। खुनयाङ (वर्तमान हनान प्रान्त के येश्येन) में हुई एक घमासान लड़ाई में उन्होंने वाङ माङ की मुख्य सैन्यशक्ति को नष्ट कर दिया। तत्पश्चात, उन्होंने छाङआन में प्रवेश किया और वाङ माङ के शासन को धराशायी करने में सफलता प्राप्त की।
18 ईसवी में एक अन्य विद्रोही सेना छिमेइ (लाल भौंह) के प्रमुख नेता फ़ान छुङ ने किसानों का नेतृत्व करके शानतुङ प्रान्त के च्वीश्येन में सशस्त्र विद्रोह किया। वे थाएशान पर्वतमाला को अपना आधार-क्षेत्र बनाकर शानतुङ और च्याङसू के उत्तरी क्षेत्र में लड़ते रहे। जल्दी ही एक लाख से अधिक सैनिकों की एक विशाल सेना बन गई। लड़ाई में अपने सैनिकों और दुश्मन के सैनिकों के बीच फर्क करने के लिए वे अपनी भौंहों को लाल रंग से रंग लेते थे। इसलिए यह फौज लाल भौंह सेना कहलाती थी।
लूलिन और छिमेइ सेनाओं के विद्रोहों के साथ-साथ, ह्वाङहो नदी के उत्तर के विशाल मैदान में, जहां आज के हपेइ और शानतुङ प्रान्त स्थित हैं, अन्य दसियों विद्रोही टुकड़ियां भी सरकार के खिलाफ उठ खड़ी हुई थीं।
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