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(GMT+08:00) 2004-05-21 10:00:04    
सौ विचारशाखाओं में होड़ होने की स्थिति (ग)

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                                                 हान फ़ेइ (लगभग 280-233 ई.पू.) श्युन चि के शिष्य और हान राज्य के निवासी थे। उन के विचार "हान फ़ेइ चि"नामक पुस्तक में संकलित किए गए थे। वे दैवी इच्छा और भूत-प्रेत जैसे अन्धविश्वासों तथा"पुरातन की ओर लौटने"के विचारों का विरोध करते थे तथा सभी सत्ता अधिराज के हाथ में केन्द्रित होने और विधि सम्मत शासन चलाने की वकालत करते थे। वे विधानवादी विचारशाखा के प्रतिनिधि थे। छिन राज्य द्वारा चीन का एकीकरण किए जाने के पश्चात जो राजनीतिक कदम उठाए गए थे, उन में से ज्यादातर हान फ़ेइ के विचारों का ही मूर्त और विकसित रूप थे।

एक अन्य विचारशाखा युद्धविज्ञान से संबंधित थी, जिसके मुख्य प्रतिनिधि वसन्त और शरद काल के युद्धनीतिज्ञ सुन ऊ और युद्धरत राज्य काल के युद्धनीतिज्ञ सुन पिन थे। "सुन चि का युद्धशास्त्र"सुन ऊ की और "सुन पिन का युद्धशास्त्र"सुन पिन की रचनाएं थीं। उन के द्वारा प्रतिपादित रणनीतिक व कार्यनीतिक विचारों में द्वंद्ववाद के तत्व मौजूद थे।

युद्धरत-राज्य काल की साहित्यिक उपलब्धियों में छ्वी य्वान (340 – 278 ई. पू.) का काव्य सर्वप्रमुख है। चीन के साहित्यिक जगत को अपनी ओजपूर्ण रचनाओं से आलोकित करने वाले अमर कवि छ्वी य्वान छू राज्य के नागरिक थे। उन्हें अनेक बार अपने राज्य से निर्वासित किया गया था। उन्होंने "ली साओ"(विलाप) और अन्य बहुत सी कविताओं की रचना की तथा लोकगीतों की शैली अपनाकर काव्यरचना की एक नई शैली को जन्म दिया, जिसे "छू छि"(छू राज्य का गाथाकाव्य) नाम दिया गया। इस शैली की बाद के कवियों पर गहरी छाप पड़ी।