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(GMT+08:00) 2004-04-13 08:41:27    
थु जाति की विवाह और अंतिम संस्कार की अनोखी प्रथा

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इस संसार में यह आम मान्यता चल रही है कि शादी ब्याह खुशगवार होता है और मौत मृत्यु दुखित होती है । लेकिन यह आप की कल्पना से बाहर है कि इन दोनों बातों पर चीन की थु जाति की मान्यता आम सांसरिक मान्यता के एकदम विपरित होती है , कहने का मतलब है कि थु जाति में लड़की का विवाह दुख माना जाता है , दुल्हन शादी के दिन बड़ी दुखी के साथ रोती है , उन का मानना है कि लड़की शादी ब्याह के बाद अपने मां बाप और भाई बहन से अलग चली जाती है , क्या यह दुख देने वाली बात तो नहीं ?! जब परिवार का कोई सदस्य मर गया , तो उस के परिवारजन नाचते गाते हुए उसे दफना देते हैं , थु जाति यह मान कर चलती है कि मृत्यु इस बात का प्रतीक है कि इस संसार में उस का कर्म सफलता के साथ पूरा हो गया है , इसलिए उसे खुशी के साथ मनाया जाना चाहिए । हां , यह सुनने पर आप को बड़ा ताज्जुब हुआ है ना , किन्तु यह थु जाति का रिति रिवाज ही है ।

थु जाति में अंतिम संस्कार का क्रियाकर्म बड़े धुमधाम से किया जा रहा है और मृतक को बिदाई देने के दौरान नाच गान का अनुष्ठान भी हो रहा है । असल में थु जाति का मूल्य अवधारण इस में दूसरी जातियों से अलग होता है , मृत्यु मौत के प्रति उन का दृष्टिकोण बड़ा उदारतापूर्ण और समझदार होता है , वे क्रिया कर्म को धुमधाम के साथ बना कर मृतकों को खुशी के साथ दूसरे संसार में भेजने के सिद्धांत में आस्था रखते हैं ।इस से प्रेरित हो कर थु जाति में मृतकों का अंतिम संस्कार आम तौर पर उल्लासपूर्ण और प्रसन्नता से भरे माहौल में किया जाता है ।

पश्चिमी मध्य चीन के दापाशान और वुलिंगशान पहाड़ी क्षेत्रों में जब कभी शहनाई और ढोल नगाड़े की जोरशोर धुन गूंजती सुनाई देती , तो यह समझना गलत नहीं होगा कि जरूर किसी गांव के किसी परिवार में कोई इस दुनिया से चल बसा हो । इस प्रकार की धुन सुनने पर आसपास के परिचित लोग अवश्य क्रियाकर्म में भाग लेने तथा मृतक को अंतिम बिदा देने आ पहुंचते हैं । थु जाति के अंतिम संस्कार के अनुष्ठान में अर्थी रखने वाले कमरे में महंत पूजारी तंत्र मंत्र करते हुए पूजा पाठ करते हैं और प्रार्थना करते हैं , उन सभी के हाथों में कोई न कोई वाद्य यंत्र होता है , बुजुर्ग उस्ताद के नेतृत्व में धुन बजाते हैं , धुन बजने के समय मृतक को बिदा देने आए लोग दलों में बंट कर महंत पूजारी का अनुसरण करते हुए ढोल के ताल पर गाते नाचते रहे , इस प्रकार के अनुष्ठान को महोल्लासी क्रिया कर्म कहलाता है ।

थु जाति में महोल्लासी क्रिया कर्म के आयोजन से पास पड़ोसी की मैत्री बढ़ जाती है , जब किसी परिवार में क्रिया कर्म आयोजित होता है , तो पास पड़ोसी और गांव के सभी लोग आ पहुंचते हैं , वे मदद के लिए भी आते है , मृतक के जीवन कृत्य की याद भी करते हैं तथा मृतक के परिजनों को सांत्वानी भी देते हैं । इस के अलावा संसार से चले गए व्यक्ति के सकर्म से शिक्षा भी ली जाती है । वे जो गीत गाते हैं , उस में इस प्रकार के बोल भी शामिल है , तुम राजा हो , मंत्री हो , अंत में दफन से बच नहीं सकता , तुम ऊंची ओहदी पर हो ,धनी हो , अंत में अवश्य ताबूत मिलेगा । क्रिया कर्म पर जो गीत संगीत होते हैं , उन की धुन विभिन्न किस्मों की होती है और ताल तेज होता है और उत्साह का वातावरण दे सकता है ।

थु जाति के शादी ब्याह के समय दुल्हन के रोने की प्रथा है , दूसरी जातियों में खुशगवार मानने वाली शादी में वहां थोड़ा बहुत दुख का वातावरण दिखाई पड़ता है।

थु जाति की प्रथा के अनुसार शादी से पहले दुल्हन आम तौर पर सात दिन रोती है , कुछ लड़की तो एक महीने के लिए रोती गाती है ,उन के गीतों के बोल तरह तरह के है , जो बहन भाई के बारे में भी हो , चाचा दादा के बारे में भी हो या पूरखों के बारे में भी हो सकता है , यो कह सकता है , जब शादी ब्याह पर जाने वाली लड़की रोने लगी , तो जो कोई भी चीज नजर में आई , तो वह उसी का बोल बना कर गाती है । जितनी बड़ी दुख भावना व्यक्त कर सकती है , उतनी शुभ मानी जाती है । थु जाति की मान्यता के अनुसार शादी ब्याह के समय दुल्हन के रोने अलापने से उस का नव गठित परिवार धनी हो जाता है । जो दुल्हन रोने अलापने में दक्ष हो और गीत के बोल बनाने में तेज हो , वह बुद्धिमान और सुशील मानी जाती है और उस की तारीफ का पुल बांधा जाता है । जो दुल्हन इस काम में कमजोर दिखा है , उसे कुछ न कुछ निन्दा और हंसाई का सामना करना पड़ता है । इसलिए थु जाति की लड़की ने छोटी उम्र में ही रोने अलापने की कला सीखना शुरू किया है।

थु जाति में शादी ब्याह में रोने गाने का रस्म मौके के साथ होता है , यानी जब रिश्तेदार पड़ोसी उपहार भेंटने आते है , तो दुल्हन जरूर रोते अलापते हुए उन्हें धन्यावाद देती है , शादी की पूर्वसंध्या में यह रस्म चोटी पर होता है , दुल्हन रात भर रोती अलापती रही है और उस का नौ अविवाहित लड़कियां भी रोते हुए साथ देती हैं । इस मौके पर अलापने के बोल प्रायः इस प्रकार है , मां बाप का एहसान सातवें आसमान से भी गहरा है , मेरे पालन पोषण में असीम जीवन शक्ति अर्पित है , आप लोगों के एहसान पर शुक्रिया भी अदा नहीं कर पाती हूं और घर छोड़ देना पड़ता है , जितनी लम्बी नदी की जल धारा है , उतनी लम्बी मेरी आंसू

होती है , इतियादी , गीत के बोल बहुत प्रभावोत्पादक है ।

पचास वर्षीय श्रीमती यांग इंग दक्षिण चीन के हुनान प्रांत के पश्चिमी भाग में स्थित एक थु जातीय गांव में रहती है , अपने विवाह रस्म की याद में उन्हों ने हमें बताया कि आज से तीस साल पहले जब उन का विवाह हो रहा था , उन्हों ने तीस दिन तक रोने का करिश्मा किया था । वह कहती है कि

बरात आने से एक महीना पहले ही मैं ने रोने अलापने का रस्म शुरू किया , गांव में मेरे हम आयु की सभी स्त्रियां जिन में गृहस्वामनी , सखी सहेपाठी , पड़ोसी की बहनें और रिश्तेदारों की स्त्री शामिल थी , रोने में मेरा साथ देती रही । सभी स्त्रियों का एक न एक दिन विवाह होता है , इसलिए वे अपनी आंसू पर कंजूसी नहीं करती है ।

थु जाति में लड़की की शादी ब्याह में रोने गाने का रस्म एक अवश्यक प्रक्रिया होता है , लेकिन अब यह रस्म एक विशेष रंगढंग की कला भी बन गया । जिस दिन हम यांग इंग के गांव में थे , उसी दिन एक लड़की के विवाह की तैयारी हो रहा थी , नव विवाहित दुहा दुल्हन के घर में टेपरिकार्ड में शादी ब्याह का रोने अलापने का गीत बज रहा था , लेकिन नवदंपति शादी के सामान खरीदने शहर गए । हमें बताया गया है कि अब जमाना बदल गई है , यो थु जाति में शादी पर रोने गाने की परम्परा सुरक्षित रही है , लेकिन खुद दुल्हन पहले की भांति लम्बे समय के लिए नहीं रोती है , उस की जगह टेप बजाया जाता है , बाजार में इस प्रकार के टेपों की बिक्रि होती है , इस तरह जितना लम्बा समय रोना चाहती है , इतनी टेप बजा सकती है । इस से दुल्हन के स्वास्थ्य के हित में भी है और जाति की परम्परागत प्रथा भी बनी रही है ।

थु जाति की शादी ब्याह की उपरोक्त अनोखी प्रथा सुनने पर आप को यह गलतफहमी ना हो जाए कि थु जाति रूढ़ीवादी है , असल में थु जाति में प्रेम का विवाह चलता है , लड़के लड़की अपनी मर्जी का पति पत्नी चुनते हैं । वे योगल रूप में गीत गाने तथा नाच नाचने के जरिए प्रेम करते हैं । विवाह का संबंध मात्र किसी के प्रमाण देने पर ही मान्य होता है और एक दूसरे से दहेज की मांग भी नहीं है । थु जाति के लोक गीतों में प्रेम विवाह के बहुत से गीत सुनने को मिलते हैं ।

थु जाति में शादी ब्याह और क्रिया कर्म की अलग प्रथा उस के पूरखों के गाने नाचने के शौक से संबंधित है , आज से दो हजार साल पहले थु जाति की यह प्रथा शुरू हुई थी , जो आज तक चली आई है , पर उस का थोड़ा नवीनीकरण हो गया है ।