
इस आग्निकांड के बाद स्थानीय सरकार ने जंगल की सुरक्षा और आग की रोकथाम के लिये विशेष व्यक्तियों और लेग्पो क्षेत्र के हरेक परिवार में वन रक्षक लगाने का फैसला कर लिया, साथ ही हर वर्ष में स्थानीय वासियों के साथ जंगल में आग रोकथाम लक्ष्य के लिये जिम्मेदाराना पत्र संपन्न करने और स्थानीय वासियों को आग रोकथाम का प्रशिक्षण भी दिया। कसांगडोगी और दूसरे गांववासियों ने इसी आग्निकांड से सबक भी सीख लिया है। अब जब वे काम के लिये पर्वत पर जाते हैं , तो वे अवश्य ही एक दूसरे को लाइटर न लेने और जंगल में सिगरेग न पीने का याद दिलाते हैं। क्सांगडोगी ने कहा कि अब यहां के स्थानीय वासी आग की रोकथाम करने के आदी हो गये हैं, तब से लेकर आज तक यहां कोई आग्निकांड नहीं हुई।
हम पर्वत पर चढने के साथ साथ क्सांगडोगी के साथ बातचीत कर रहे थे, समय जल्दी से बीत गया, पता ही नहीं था कि लांच का समय आ गया। क्सांगडोगी एक बड़ी चट्टान पर बैठ गये, फिर बक्से को खोलकर जौ से तैयार छाओ म्येन खाने लगे। वे बड़े मजे से भोजन करते हुए अपनी वन रक्षा कहानी सुनाना भी नहीं भूलते। उन का कहना है कि शुरु में वन रक्षा का मुख्य काम आग की रोकथाम करना था, पर अब पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर रोक का दायित्व भी संभाला जाता है।
दसेक साल पहले लेग्पो स्थानीय वासी खेतीबाड़ी व पशु पालन को छोड़कर जंगल में पेड़ों की कटाई करते थे, काफी ज्यादा स्थानीय लोग लकड़ी बेचने पर आश्रित थे । लेकिन अब उन्होंने समझ लिया है कि पहाड़ के पास रहने से पहाड़ पर निर्भर रहकर आर्थिक विकास फारमूले से जंगल पर भारी दबाव पैदा होता है और इसी प्रकार वाला आर्थिक विकास जारी नहीं रखा जा सकता। यदि इस तरह पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जाएगी, तो कुछ समय बाद जंगल संसाधन लुप्त हो जाएंगे। क्सांगडोगी ने कहा कि उन्हें तत्कालीन लाभ के लिये भविष्य की परवाह नहीं करना चाहिये। उन्होंने कहा:
"जंगल हमारे संबंधियों जैसा है। यदि जंगल संसाधन नहीं होता, तो हमारी संतानें किस पर निर्वाह करेंगी।"
2003 में स्थानीय सरकार ने यह निर्धारण किया है कि हर वर्ष स्थानीय वासी मात्र दस दिनों के भीतर निश्चित क्षेत्रों में लकड़ी की कटाई कर सकते हैं, साथ ही दुर्लभ पेड़ों की कटाई भी मना है। मनमाने ढंग से कटाई की मनाही से हुई आर्थिक क्षति की आपूर्ति के लिये स्थानीय सरकार ने हरेक परिवार को निश्चित पारिस्थितिकि भत्ता देने का निर्णय भी कर लिया है।
स्थानीय सरकार के निर्धारण से लेग्पो स्थानीय वासियों की लकड़ी काटने की आदत बदली ही नहीं, उन की ओर से पूरा समर्थन भी मिल गया है। फलस्वरुप स्थानीय वासियों की देखरेख में अब लेग्पो क्षेत्र में जंगल संसाधन अत्यंत समृद्ध हो गये हैं, और तो और बर्फीले पर्वतों, नद नदियों, घाटियों और घास मैदानों व विविधतापूर्ण मनपा जातीय रीति रिवाजों समेत विशेष दर्शनीय सौंदर्य अधिकाधिक पर्यटकों को मोहित कर लेते हैं, स्थानीय वासियों ने पर्यटन व्यवसाय की विशाल संभावनाएं भी देख ली हैं। कुछ स्थानीय वासियों ने घरेलू होटल खोल दिये हैं, अन्य कुछ वासियों ने जातीय हस्त शिल्प सीखकर लकड़ी कटोरे और बांस टोकरी जैसी स्थानीय विशेष जातीय पर्यटन यादगार वस्तुएं बनाने में जुट गये हैं ।
क्सांगडोगी ने कहा कि वर्तमान लेग्पो में पारिस्थितिकि पर्यटन का विकास करने की परिस्थिति परिपक्व बनती जा रही है। आइंदे कांऊटी शहर से लेग्पो तक जाने वाला राजमार्ग निर्मित किया जायेगा, साथ ही होटल, पर्यटक सत्कार केंद्र और अन्य सुविधाएं क्रमशः खड़ी की जायेंगी। पारिस्थितिकि पर्यटन के सुचारु विकास के लिये वे और अन्य तमाम गांववासी जंगलों की रक्षा करने को संकल्पबद्ध हैं। कसांगडोगी का कहना है:
"लेग्पो क्षेत्र पारिस्थितिकि पर्यटन को प्राथमिक देने वाले स्थानीय पर्यटन उद्योग को बढावा दिया जा रहा है। यदि जंगल संसाधन का संरक्षण न किया जाये, तो लेग्पो स्थानीय पर्यटन उद्योग के विकास को प्रभावित हो जायेगा ।"
लेग्पो के दौरे पर आने वाले आधिकाधिक पर्यटकों के मद्देनजर जंगल में सिगरेड पीने और अंधाधुंध कटाई करने से रोकने के लिये क्सांगडोगी दूसरे गांववासियों के साथ बारी बारी से गांव के छोर पर खड़े होकर आने जाने वाले व्यक्तियों का नाम और वाहनों का नम्बर पंजीकृत करते हैं, ताकि कोई दुर्घटना घटित होने पर किसी संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति की खोज की जा सके। कसांगडोगी ने कहा:
"गांववासी बारी-बारी से गांव के छोर पर ड्यूटी लगाते हैं, आज एक शटल बस गांव से चली गयी, बस का नम्बर भी नोट हो गया, जो पर्यटक यहां से बाहर निकल जाते हैं, उन का नाम अवश्य ही पंजीकृत किया जाता है, ताकि संभान्वित किसी दुर्घटना की जांच पड़ताल सुविधापूर्ण हो सके।"
समय दिन ब दिन और साल ब साल अपने नियम से बीत जाता है। चाहे लेग्पो की पहाड़ी पगडंडियां कितनी भी टेढी मेढ़ी क्यों न हो और जाड़ों में कितनी कड़ी सर्दी क्यों न हो, क्सांगडोगी जैसे लेग्पो वन रक्षकों का जंगल का संरक्षण करने का कदम व इरादा बाधित नहीं हो सकता। जब हम ने क्सांगडोगी से पूछा कि आप वन रक्षा का काम कब तक करने को तैयार हैं, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा:
"मुझे अपने इस काम पर बेहद गर्व है, क्योंकि मैं न सिर्फ अपनी जन्मभूमि के लिये कुछ न कुछ योगदान कर सकता हूं , बल्कि अपनी संतानों की भलाई में भी कुछ ठोस काम कर लेता हूं। मैं तब तक यह काम करता रहूंगा, जबतक गांववासी मुझ पर भरोसा न हो जाते और मेरा स्वास्थ्य खराब न होता। यहां हमारी जन्मभूमि है, उस के लिये कुछ न कुछ योगदान करना चाहिये।"
बातचीत के दौरान हमें पता चला है कि क्सांगडोगी का बड़ा बेटा एक वन रक्षक भी है, अव वह अपनी ठोस कार्यवाही से अपने पिता का वन संरक्षण मिशन पूरा करने को कृतसंकल्प है। हरा भरा जीगता जागता लेग्पो क्षेत्र प्रकृति की देन ही नही , लेग्पो वासियों का प्रकृति से प्यार करने और जंगल का संरक्षण करने का साक्षी भी है ।





