
केंद्रिय जातीय विश्वविद्यालय के संगीत प्रोफेसर चायुंगछुनपे का मानना है कि वर्तमान में बहुत ज्यादा संगीत रचनाएं तथाकथित पाँपलर और फैशन के पीछे पड़ते हैं, जिस से शुद्ध तिब्बती शैली युक्त गीत कम हो गये हैं, कलात्मक विशेषता वाली रचनाओं और गायन का अभाव भी है। प्रोफेसर चायुंगछुनपे का विचार है कि तिब्बती संगीत रचनाओं को विविधतापूर्ण रुप विकसित किया जाना चाहिये। उन्होंने कहा:"तिब्बती संगीत की रचनाएं और गायन शैलियां विविधतापूर्ण हैं, एक ही आकार प्रकार पर नहीं बंधना चाहिए। परम्परागत तौर तरीकों से जरिये संगीतों का विकास व सृजन करने के साथ साथ नये तौर तरीकों को अमल में लाना भी जरुरी है, यहांतक कि संगीतों के विकास व सृजन करने के लिये भयानक तौर तरीकों का प्रयोग भी किया जा सकता है।"
प्रोफैसर चायुंगछुनपे ने तिब्बती संगीतकारों से अपील की है कि वे व्यावसायिक लहरों में अविवेकपूर्ण रवैये से बच जाए, तिब्बती संस्कृति और परम्पराओं से संजीदगी के साथ सीखें, शानदार तिब्बती संस्कृति को तिब्बती संगीत में लाये, जातीय सांस्कृतिक निचोड़ को बनाए रखें और आधुनिक मार्केटिंग माध्यमों के जरिये तिब्बती संगीत सच्चे मायने में दुनिया को दिखायें।
इस के अलावा अनेक विशेषज्ञों और विद्वानों ने यह विचार भी व्यक्त किया है कि वर्तमान में तिब्बती संगीतों के प्रचलन और जातीय गायन का विकास मार्केट उन्मुख पथ पर काफी परिपक्त हो गया है, जबकि दूसरे प्रकार वाले श्रेष्ठ जातीय परम्परागत संगीत व कलात्मक गायन का सम्मान करना ही चाहिये। प्रसिद्ध तिब्बती गायक डोगिचारांग ने सरकार से कुछ तिब्बती परम्परागत संगीतों के संरक्षण व ग्रहण के लिये विशेष संस्था की स्थापना की अपील की है। उनका कहना:"है कि कुछ संगीतों और संस्कृतियों को आर्थिक लाभ की बराबरी पर नहीं लाया जा सकता, सरकार को कुछ परम्परागत संगीत रुपों और श्रेष्ठ जातीय संस्कृतियों का समर्थन व संरक्षण करनें में भूमिका निभानी चाहिये। मेरा यह सुझाव है कि आदिम तिब्बती परम्परागत संगीत के संरक्षण के लिये तिब्बती लोक गीत व लोक नृत्य कला मंडली की स्थापना और संगीतकार कार्यालय की जाये, ताकि विशेष तौर पर जातीय संगीत और जाताय नृत्य गान की रक्षा और विरासत के रुप में ग्रहण की जा सके। क्योंकि परम्परागत संस्कृति को और आधुनिक लोकप्रिय चीजों के साथ नहीं जोड़ा जा सकता, मसलन फीलैंड, नार्वे और डेंमार्क जैसे उत्तरी यूरोपीय देशों में परम्परागत संगीत को पांप संगीत से अलग किया जाता है, वहां पर पेशावर स्वतंत्र संस्था इसी काम को संभालता है।"















