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तिब्बती संगीतकारों की परम्परागत जातीय संगीतों के संरक्षण में विशेष संस्था की स्थापना की अपील
2013-02-18 11:05:45

तिब्बती लोक गीतों को छोड़कर तिब्बती संगीतों के महत्वपूर्ण संगठित भाग की हैसियत से तिब्बती लामा बौद्ध धार्मिक संगीतों का भी अच्छी तरह संरक्षण व संग्रह हो पाया है। तिब्बती लामा बौद्ध धर्म के काजुपा संप्रदाय की दूसरी पीढ़ी के आचार्य मिलारेपा सांग के 42 वें उत्तराधिकारी, तिब्बत की यांगरिकांग मठ के जीवित बुद्ध पालो ने इस का परिचय देते हुए हमारे संवाददाता से कहा:"हमारे धार्मिक संगीत, डायमंड नृत्य और तिब्बती धूप उत्पादन ये तीनों चीजें राष्ट्रीय स्तरीय गैर सांस्कृतिक विरासत की गिनती में आती हैं, गैर सांस्कृतिक विरासत कार्यालय की स्थापना के बाद तिब्बती धार्मित संगीत और लोक संगीत सुव्यवस्थित रुप से संरक्षित और विकसित हो गये हैं। बौद्ध धार्मिक संगीत की सब से बड़ी विशेषता यह है कि लोगों के हृदय को शांतचित बनाया जाता है, इसीलिये बहुत ज्यादा देशी विदेशी श्रोता छुंगइंगचोमा द्वारा सुनाये जाने वाले मिलारेपा सांग खासकर पसंद करते हैं। छुंगइंगचोमा और पेमाछ्येनपे जैसे गायकों की बेमिसाल मधुर आवाज सच्चे मायने में सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व मानी जाती है।"

इधर सालों में धार्मिक संगीत समेत तिब्बती गीत संगीत और नृत्य नाट्य विश्व के दूसरे देशों में भी लोकप्रिय हो गये हैं। चीनी तुंग फांग प्रदर्शन कला समूह के कार्यकारी निर्देशक सुश्री कान लू ने हमारे संवाददाता से कहा कि इस समूह के अधीन चीनी नृत्य गान कला मंडली जातीय नृ्त्य गानों को प्रधानता पर देकर प्रदर्शन करती है, हर वर्ष इस नृत्य गान कला मंडली विदेशों में सौ से ज्यादा शौ दर्शाती है, जबकि हरेक शौ में तिब्बती जातीय नृत्य गान की प्रस्तुति अवश्य ही की जाती है। सुश्री कान लू का कहना है:"चीनी नृत्य गान कला मंडली का इतिहास कोई 60 साल पुराना है, हम मुख्य रुप से विभिन्न जातियों के नृत्य गान प्रस्तुत करते हैं, अब हमारी कला मंडली हर वर्ष की हरेक नयी महफिल में तिब्बती संगीत अवश्य ही पेश करती है, महफिल के प्रोग्रामों में तिब्बती संगीत का अनुपात एक तिहाई भाग है। तिब्बती गीत संगीत चीन की अन्य सभी जातियों में सब से अग्रसर है, काफी बड़ी तादाद में रचनाएं भी प्रकाश में आयी हैं, चाहे छिंगहाई तिब्बत पठार और आकाश रोड नामक गीत हो या खुशबूदार, खांगतिन प्रेमभाव नामक नृत्य रचनाएं क्यों न हो, जब हम विदेशों में उन की प्रस्तुति करते हैं, तो उन्हें अवश्य ही विदेशी दर्शकों की ओर से खूब दाद मिलती है।"

तिब्बती शैली युक्त पाँप गीत संगीत की बारंबार प्रस्तुति करने के साथ साथ यह महसूस हुआ है कि तिब्बती पाँप गीत संगीत का रुपरंग काफी एकरस है और श्रेष्ठ रचनाओं की संख्या भी बहुत कम है, जिस पर संबंधित विशेषज्ञ बड़े चिन्तित हो गये हैं। चीनी प्रचार प्रसार व मीडिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हो श्याओ पिंग ने उदाहरण देते हुए कहा:"गीतों की संख्या की दृष्टि से देखा जाए, गत सदी के पूरे 90 वाले दशक में तिब्बती शैली युक्त गीतों की रचनाएं अपनी चरम सीमा तक पहुंच गयीं, केवल तिब्बत जन प्रसारण स्टेशन के संगीत गोदाम में तीन हजार से ज्यादा नये रचित तिब्बती भाषी गीत संरक्षित हुए हैं, पर संगीत उत्पादन की क्वालिटी और संगीत रचना गुणवत्ता काफी संतुष्ट नहीं है। साथ ही अब सारे देश में हर वर्ष कम से कम तीस हजार से ज्यादा गीत रचित किये जाते हैं, लेकिन इतने ज्यादा गीतों में पांच से कम गीत पांच से दस साल तक लोगों के बीच खूब प्रचलित है, बाकी सब कुछ धीरे धीरे लुप्त हो जाते हैं, इस का मुख्य कारण अपनी विशेष पहचान की कमी ही है।"


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