
हान जातीय भाषा में निपुण होने पर भी एक तिब्बती लोग होने के नाते तनचेन ह्लुतुप व उनकी पत्नी घर में तिब्बती भाषा बोलते हैं, ताकि जातीय संस्कृति भूल न जाए। रोज परिवार के सभी लोग तिब्बत से जुड़े टीवी कार्यक्रम देखते हैं। तनचेन ह्लुतुप बहुत खुश हैं कि वे तिब्बत में हुए परिवर्तन का साक्षी बन सके और एक तिब्बती विद्वान के रूप में तिब्बत के निर्माण में शामिल हो सके। तनचेन ह्लुतुप का कहना हैः
"मेरा जीवन अब तक दो भागों में विभाजित हो सकता है। पहला भाग बाहर जाना और दूसरा भाग वापस लौटना। सरकार की उदार नीति से तिब्बत शास्त्र अनुसंधान केन्द्र की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य तिब्बती संस्कृति को बढ़ावा देना है। जीवन के पहले भाग में मैं तिब्बत से पेइचिंग में काम करने गया। यह हमारी पीढ़ी के लोग, विशेषकर तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति व लोकतांत्रिक सुधार के बाद जन्म होने वाले लोगों का जिम्मा है। पेइचिंग आकर मेरी दृष्टिकोण विस्तृत हो गई। अब मैं सरकार की उदार नीति का फायदा उठाकर तिब्बती संस्कृति का प्रचार करने वापस आता हूं, तिब्बत में आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास बढ़ाने में प्रयास करता हूं और वैज्ञानिक अनुसंधान में अपना योगदान करता हूं।"















