
अब तनचेन ह्लुतुप तिब्बत शास्त्र अनुसंधान केन्द्र के सामाजिक व आर्थिक अध्ययन विभाग के उप प्रमुख बन गए और वे राष्ट्रीय प्रगतिशील कार्यकर्ता की उपाधि और आदर्श श्रमिक पदक से सम्मानित भी किए गए हैं। इन उपलब्धियों की चर्चा में तनचेन ह्लुतुप ने कहा कि मैं सैभाग्यशाली हूं। देश की उदार नीति के कारण मुझे यह अच्छा मौका मिला है।
"1981 में जब मैं तिब्बती जातीय कॉलेज में दाखिल हो गया, तब केन्द्रीय सरकार का प्रथम तिब्बती कार्य सम्मेलन अभी अभी समाप्त हुआ। केन्द्रीय सरकार ने तिब्बत के विकास पर बड़ा ध्यान दिया और पूंजी भी बढ़ाई। अब तक तिब्बती कार्य सम्मेलन पांच बार आयोजित हो चुके हैं। तिब्बत में लोगों का जीवन सुधारने और बुनियादी संस्थापनों के निर्माण व सांस्कृतिक विकास के लिए केन्द्रीय सरकार की सहायता लगातार बढ़ती जा रही है। तिब्बती सामाजिक विज्ञान अकादमी व तिब्बती शास्त्र अनुसंधान केन्द्र ये दोनों संगठनों की स्थापना केन्द्रीय सरकार की सहायता में ही की गई है।"
एक तिब्बती जाति के सदस्य होने के नाते अपने ज्ञान से अपनी जन्म-भूमि के विकास में योगदान करने पर तनचेन ह्लुतुप गर्व महसूस करते हैं। हालांकि अब वे पेइचिंग में रहते हैं और काम करते हैं, लेकिन हर साल वे जरूर तिब्बत वापस जाते हैं। पिछले दसेक सालों में उन्होंने तिब्बत के विभिन्न स्थानों में सामाजिक सर्वेक्षण करने के बाद चार लाख शब्दों का निबंध लिखा, विदेशी विद्वान के रूप में अमेरिका आदि देशों के विश्वविद्यालयों में लेक्चर देते हुए विदेशी दोस्तों को तिब्बत की असली स्थिति से अवगत कराया।
पेइचिंग के जीवन की चर्चा में तनचेन ह्लुतुप ने कहा कि पेइचिंग एक सहिष्णुशील शहर है। अब उन्हें पेइचिंग में रहने की आदत हो गई है। हालांकि वे पश्चिमी शास्त्रीय संगीत पसंद करते हैं और कभी कभी कोफी पीते हैं, लेकिन तिब्बती जातीय रीतिरिवाज उनके लिए अनिवार्य है। उन्होंने कहाः
"मेरी जीवन शैली व सोच पर तिब्बती अवधारण का प्रभाव जरूर मौजूद है। उदाहरण के लिए हम तिब्बती भोजन ज्यादा पसंद करते हैं, सर्दियों में हम तिब्बती मक्खन चाय पीते हैं और सुबह तिब्बती आहार त्सेनपा खाते हैं।"















