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    तिब्बती संस्कृति में मुखौटे की कला
    2014-11-28 19:07:53 cri

    जाशलुम्बु मठ में भिक्षु लोसांग याफेई

    जाशलुम्बु मठ के भिक्षु दावा त्सेरिंग ने बताया कि उनके पास छ्यांगमू नृत्य मुखौटा मठ में गेलुग संप्रदाय के देवताओं के पूर्व रुपों के अनुसार बनाया जाता है। भिक्षु दावा त्सेरिंग ने कहा:

    "हमारे मुखौटे मठ में ही बनाए जाते हैं। हमारे मठ में विशेष तौर पर कांसे की वस्तुएं बनाने वाले भिक्षु, कढ़ाई करने वाले भिक्षु हैं। वे खासतौर पर छ्यांगमू नृत्य के साक्का-वस्त्र और मुखौटे बनाते हैं।"

    मित्रों, तिब्बती बौद्ध धर्म को गेलुग, साग्या, निंगमा और गेग्यू चार संप्रदायों में विभाजित किया जाता है। विभिन्न संप्रदायों के छ्यांगमू नृत्य के तरीके और विषय में अंतर होने के बावजूद मिलते जुलते हैं। छ्यांगमू नृत्य के मुखौटे आम तौर पर नीला, पीला, लाल, सफेद और काला रंग के होते हैं। जिनका प्रयोग मुख्य तौर पर दैत्यों व पिशाचों को दूर करने और प्रार्थना करने के लिए किया जाता है। अहम त्यौहारों में भिक्षु मुखौटे पहनकर छ्यांगमू नृत्य नाचते हैं। बाकी समय मुखौटे मठ के धार्मिक रक्षा देवता भवन में सुरक्षित रखा जाता है।

    शिकाजे प्रिफैक्चर की साग्या कांउटी में स्थित साग्या मठ तिब्बती बौद्ध धर्म के साग्या संप्रदाय का सुप्रसिद्ध मठ है। हर वर्ष शरत ऋतु और सर्दियों में साग्या संप्रदाय का छ्यांगमू नृत्य उत्सव आयोजित किया जाता है। साग्या मठ के भिक्षु च्यायांग की नज़र में छ्यांगमू नृत्य मुखौटे बहुत अतिशयोक्तिपूर्ण ही नहीं, यथार्थवादी भी है। मुखौटा तिब्बती बौद्ध धर्म के मंत्र तंत्र संप्रदाय के संन्यासी और धर्मसिद्धांत देवताओं के बीच संपर्क करने का अहम साधन है। भिक्षु च्यायांग ने कहा:

    "छ्यांगमू नृत्य का प्रदर्शन चार दिनों तक चलता है। संन्यासी भिन्न-भिन्न मुखौटे पहनकर हाथ में अलग-अलग बौद्धिक धार्मिक पात्र पकड़ते हुए नाचते हैं। पहले दो दिनों में वे नाचते हैं और तपस्या करते हैं। फिर बाकी दो दिनों में वे खुद देवताओं के रूप में बदल जाता है। फिर वे अनुयायियों और श्रद्धालुओं के लिए प्रार्थना कर सकते हैं।"

    तिब्बती बौद्ध धर्म में प्रयोग किए जा रहे मुखौटे धीरे-धीरे लोक दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं। इसका कारण तिब्बती ओपेरा से संबंध है।

    कहते हैं कि ईस्वी 14वीं सदी में महाचार्य थांगतोंग चेपू ने आम नागरिकों की दया के लिए पुल और मार्ग के निर्माण में पूंजी जुटाई। उन्होंने आज के लोका प्रिफैक्चर में सात खूबसूरत लड़कियों को आमंत्रित किया, जो नाच-गाने में निपुण थी। इन सातों लड़कियों ने थांगतोंग चेपू द्वारा रचे गए नृत्य गान नाटकों का अभिनय किया। थांगतोंग चेपू ने इन लड़कियों को खुद डिज़ाइन किए जाने वाले वस्त्र पहनाए। प्रदर्शनी से प्राप्त आमदनी का प्रयोग पुल और मार्ग के निर्माण में किया गया। इस प्रकार तिब्बती ओपेरा का प्रारंभिक रूप सामने आया। बाद में तिब्बती ओपेरा का अभिनय करने वालों ने थांगतोंग चेपू को तिब्बती ओपेरा के संस्थापक माना और उन खुद की शक्ल के अनुसार सफेद बकरी के चमड़े से सफेद बाल और सफेद दाढ़ी वाला मुखौटा बनाया, इस तरह तिब्बती ओपेरा का मुखौटा बना। और तिब्बती जाति के प्राचीन इतिहास वाला मुखौटा कला रहस्य धार्मिक जगत से और व्यापक लोक दुनिया में प्रवेश हुआ।

    तिब्बती जातीय कला अनुसंधान केंद्र के पूर्व उप प्रधान ल्यू चीछ्वुन, जो लम्बे समय से तिब्बती ओपेरा और तिब्बती संस्कृति व कला का अध्ययन करते हैं। उन्होंने बताया कि तिब्बती ओपेरा में मुखौटे को वनबा मुखौटा, मानव मुखौटा और जानवर मुखौटा आदि में विभाजित किया जाता है। ल्यू चीछ्वुन ने कहा:

    "तिब्बती ओपेरा अभिनय की शुरुआत में एक प्रकार का मुखौटा पहनाया जाता है, जिसे वनबा कहा जाता है। पहले तिब्बती ओपेरा में सफेद मुखौटा बकरी की खाल के चमड़े से बना हुआ है, जो आदिम रूप दिखाता है। इस कला के विकास के चलते तिब्बती ओपेरा में नीले मुखौटे का चलन शुरू हुआ। यह बड़े आकार वाला मुखौटा है, जिस पर अच्छी तरह सजावट की जाती है, इस प्रकार वाला मुखौटा बकरी के चमड़े से नहीं बनाया जाता, मुख्य तौर पर रेशम, चमड़े और फ़र से बनता है।"

    तिब्बती बौद्ध धर्म के मुखौटे की तुलना में तिब्बती ओपेरा में प्रयोग किए जाने वाले मुखौटे को विभिन्न पात्रों के अनुसार अलग भी किया जाता है। इन पात्रों का मुखौटा आम तौर पर कपड़े, कागज़, बकरी के चमड़े जैसी सामग्री से बनाया जाता है। जिससे नाटकों में व्यक्तियों की हैसियत और भावना अभिव्यक्त होती है। उदाहरण के लिए राजा, मंत्री, भिक्षु, वृद्ध लोग और विच जैसे पात्रों की अभिव्यक्ति विभिन्न प्रकार के मुखौटे से की जाती है। विभिन्न रंग वाले मुखौटे अतिशयोक्तिपूर्ण रंगों के माध्यम से नाटक में पात्रों की भावना और चरित्र दिखाते हैं। तिब्बती ओपेरा के अनुसंधानकर्ता ल्यू चीछ्वुन कहते हैं कि :

    "तिब्बती ओपेरा के प्रमुख भाग में विभिन्न बुनियादी रंग वाले मुखौटे से अलग-अलग पात्रों की अभिव्यक्ति की जाती है। मसलन् रानी और माता का मुखौटा छोटा सा हरा मुखौटा है, जबकि राजा का मुखौटा लाल है और देवताओं के मुखौटे का रंग पीला है।"

    तिब्बती ओपेरा को किसी भी शाखा के नाटकों में विभिन्न प्रकार वाले जानवरों से अलग नहीं किया जाता। इस तरह तिब्बती ओपेरा में जानवर मुखौटा जरूरी है। वास्तव में इन जानवरों का कुलदेवता यानी टोटेम का अर्थ है। उदाहरण के लिए तिब्बत के स्थानीय आदिम बोन धर्म में बकरे के सिर, गाय सिर, घोड़े के सिर और बाघ के सिर जैसे मुखौटे का प्रयोग किया जाता था। भिन्न-भिन्न जानवर के मुखौटे से अलग-अलग जानवरों की जीवित आत्मा प्रतिबिंबित होती है।

    तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के लोका प्रिफैक्चर में मनपा ओपेरा बहुत लोकप्रिय है, जिसमें देवताओं की कथाओं, लोक गीत व नृत्य और धार्मिक डांस दिखाए जाते हैं। इसके अलावा मनपा ओपेरा में तिब्बती ओपेरा की तरह मुखौटे का भी इस्तेमाल किया जाता है। मनपा ओपेरा चीन में पहले खेप वाले राष्ट्र स्तरीय गैर भौतिक सांस्कृतिक विरासतों की सूची में शामिल हुआ। इसकी चर्चा में तिब्बती ओपेरा और कला का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ ल्यू चीछ्वुन ने कहा कि मनपा ओपेरा में प्रयोग होने वाले मुखौटे तिब्बती ओपेरा से मिलते जुलते हैं। मनपा ओपेरा में इस्तेमाल किए जाने वाले मुखौटे की किस्में तिब्बती ओपेरा से कम हैं। उनका कहना है:

    "मनपा ओपेरा और तिब्बती ओपेरा आम तौर पर मिलता जुलता है। लेकिन इन दोनों के बीच फर्क भी मौजूद है। मनपा ओपेरा के शुरु में प्रयोग होने वाला वनबा मुखौटा पूरी तरह जानवर के चमड़े से बनाया जाता है, जो तिब्बती ओपेरा से अलग है। इसके अलावा मनपा ओपेरा में इस्तेमाल होने वाले मुखौटे के प्रकार तिब्बती ओपेरा से कम हैं। तिब्बती ओपेरा में बहुत ज्यादा पात्रों का तमाम मुखौटों में प्रयोग किया जाता है, लेकिन मनपा ओपेरा में मुख्य तौर पर वनबा मुखौटे के अलावा, मछुआरे का मुखौटा प्रमुख है।"

    तिब्बती ओपेरा और कला का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ ल्यू चीछ्वुन के विचार में तिब्बती ओपेरा और दूसरे प्रकार वाले ओपेराओं के विकास के चलते मुखौटे का रूप ज्यादा विस्तृत हो रहा है। आजकल ओपेरा की प्रदर्शनी के दौरान अभिनेता-अभिनेत्री मुखौटे पहनने के अलावा मेकअप के माध्यम से पात्रों की अभिव्यकि करते हैं। उदाहरण के लिए मनपा ओपेरा में《राजन नोसांग》नामक नाटक में प्रमुख पात्र राजकुमार नोसांग और फ़ेयरी युनचो लामू का पात्र की अभिव्यक्ति के दौरान अभिनेता और अभिनेत्री सफेद चेहरे पर लाल रंग वाले फ़ेसबुक के मेकअप से अभिनय करते हैं। कुछ विदूषक यानी क्लाउन के अभिनय वालों के चेहरों को चानपा आटे से सफेद बनाया जाता है। पॉट-राख से काले चहरे चित्रिक कर दैत्यों और पिशाचों का अभिनय किया जाता है। काले चहरे पर अति लाल वाला ओंठ, आंखों के नीचे हरा रंग और मुंह में लम्बे-लम्बे दांत......इस प्रकार के दैत्य के रूप को देखकर लोगों को बहुत डर लगता है।

    आधुनिक जमाने में तिब्बती ओपेरा में ज्यादा तौर पर मेकअप तकनीक के माध्यम से पात्रों का चेहरा तैयार किया जाता है। मसलन् तिब्बती ओपेरा के《जावासम》नामक नाटक में दैत्य रानी के अभिनय के शुरू में मात्र मेकअप से रानी का रूप दिखाया जाता है, उसे हराने के बाद अभिनेत्री का मुखौटा पहनकर दैत्य का रूप दिखता है।

    सुन्दर बर्फीले छिंगहाई तिब्बत पठार पर रंगबिरंगे मुखौटे उपलब्ध रहते हैं। तिब्बत के मुखौटे कला में तिब्बती बौद्ध धर्म के धार्मिक कलात्मक तत्व शामिल हुआ, इसके साथ ही मुखौटे कला में तिब्बत पठार में रहने वाली विभिन्न जातियों की बुद्धि और मेहनत भी जाहिर हुई। इन मुखौटे का प्रयोग धार्मिक, सांस्कृतिक और कलात्मक प्रदर्शनियों में किया जाता है, जिससे लोगों को तिब्बत में एक विशेष और मज़ेदार अनुभव हासिल हुआ।


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