
शिकाज़े प्रिफैक्चर में स्थित जाशलुम्बु मठ तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग संप्रदाय का मशहूर मठ है, जिसका इतिहास बहुत पुराना है। ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, जाशलुम्बु मठ की स्थापना वर्ष 1447 में हुई। इसका निर्माण गेलुग संप्रदाय के गुरू ज़ोंन घा बा के शिष्य प्रथम दलाई लामा कनतुन जूबा ने कराया। चौथे पंचन लामा लोसांग छ्यूचीच्यानचान के समय इस मठ का विस्तार किया गया। इसके बाद जाशलुम्बु मठ पंचन लामा की हर पीढ़ी का निवास स्थान बना। आज इस मठ के स्तूपों में पांचवें से नौवें पंचन लामा के पार्शिव शरीर रखे हैं। यह मठ दक्षिणी तिब्बत का धार्मिक सांस्कृतिक केंद्र भी है।
जाशलुम्बु मठ में कई पीढ़ी वाले पंचन लामाओं की अथक कोशिशों के चलते आज इस मठ में लोकप्रिय रहे छ्यांमगू नृत्य को विरासत में लेते हुए विकसित हो रहा है। जिसे चीनी राष्ट्र स्तरीय गैर भौतिक सांस्कृतिक विरासत की सूचि में शामिल किया गया। जाशलुम्बु मठ के छ्यांगमू नृत्य प्रदर्शन पर जिम्मेदार करने वाले भिक्षु लोसांग याफेई ने जानकारी देते हुए कहा:
"छ्यांगमू नृत्य में विभिन्न प्रकार के मुखौटे का प्रयोग किया जाता है, जो देवताओं, धार्मिक रक्षा देवों और उनके सेवकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मसलन् तिब्बती बौद्ध धर्म के तंत्र संप्रदाय में वज्र देवता जैसे हैं। मुखौटे दयालु और क्रोध जैसी भावना के होते हैं। आम तौर पर क्रोध भावना वाला मुखौटा साधारण है, जिससे देवताओं की प्रतिष्ठा और ताकत का प्रदर्शन होता है।"
तिब्बती बौद्ध धर्म के《पिटक सूत्र》और《मूर्ति बनाने वाले मापदंड व स्केल वाले सूत्र》जैसे सूत्रों में मठों में प्रयोग किए जाने वाले धार्मिक मुखौटे के आकार, रूप और चिन्ह के संदर्भ में नियम और तरीके निर्धारित किए गए। लेकिन भिन्न-भिन्न कलाकारों के हाथों से तैयार मुखौटा अलग-अलग होते हैं। आम तौर पर छ्यांगमू नृत्य का मुखौटा चमड़े, लकड़ी, मिट्टी, काग़ज़, कपड़े, कांस्य और लोहे आदि से बनाया जाता है, जिनमें काग़ज व मिट्टी के मिश्रण वाला मुखौटा और कपड़े से बनाया गया मुखौटा अधिक दिखते हैं।









