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    टी टाइम 141014 (अनिल और ललिता)
    2014-10-14 20:42:34 cri

    अनिलः टी-टाइम के नए अंक के साथ हम फिर आ गए हैं, आपका मनोरंजन करने। जी हां .....आपके साथ चटपटी बातें करेंगे और चाय की चुस्कियों के साथ लेंगे गानों का मजा, 35 मिनट के इस प्रोग्राम में। इसके साथ ही प्रोग्राम में श्रोताओं की प्रतिक्रियाएं भी होंगी शामिल। हां भूलिएगा नहीं, पूछे जाएंगे सवाल भी, तो जल्दी से हो जाइए तैयार।.....

    दोस्तो वैसे एक सप्ताह में सात दिन होते हैं, लेकिन हमें आपके लिए प्रोग्राम पेश करने का बड़ा इंतजार रहता है। तो क्या कर रहे हैं आप लोग, रेडियो सेट ऑन किया कि नहीं, अगर नहीं तो जल्दी कीजिए। क्योंकि टी-टाइम प्रोग्राम हो चुका है शुरू।

    अनिलः नॉर्वे में नोबेल पुरस्कार कमेटी ने 10 अक्तूबर को भारत के बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की किशोरी मलाला युसूफजई को 2014 शांति का नोबेल पुरस्कार देने का ऐलान किया। मलाला नोबेल पुरस्कारों के इतिहास में सबसे युवा विजेता हैं। सुनिए एक रिपोर्टः

    ------आवाज़------

    नॉर्वे में नोबेल पुरस्कार कमेटी के अध्यक्ष थोर्ब्जोर्न जाग्लैंड ने नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में 2014 शांति का नोबेल पुरस्कार कैलाश सत्यार्थी और मलाला युसूफ़जई को देने का एलान किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान विश्व के गरीब देशों में 60 प्रतिशत जनसंख्या में 25 उम्र और इससे कम आयु वाले युवा हैं। उन्हें स्कूली शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए, न कि उन पर आर्थिक दबाव। यह विश्व शांति के लिए अहम योगदान होगा।

    कैलाश सत्यार्थी बाल अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं और दुनिया भर में चलाए जा रहे कई आंदोलनों में शिरकत कर चुके हैं। उन्होंने कई दस हज़ार से अधिक बाल मज़दूरों को बचाया है। शांति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद सत्यार्थी ने नोबेल वेबसाइट के साथ एक फोन साक्षात्कार में अपना आभार व्यक्त किया और आशा जताई कि उनके शांति के नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने से अधिक लोगों द्वारा उत्पीड़न और शोषण में फंसे ज्यादा बच्चों को बचाया जा सकेगा। उन्होंने विभिन्न देशों की सरकारों और कल्याण संगठनों से इसी अभियान में भागीदारी की अपील की।

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    "हर व्यक्ति के पास ऐसा विचार जरूरी है कि बाल मज़दूरों का शोषण करना दुनिया में सबसे अलग मुद्दा है। यह मानवतावाद विरोधी अपराध है, जिसे अस्वीकार ही नहीं, बल्कि हम इसे सह भी नहीं सकते। इसे दूर किया जाना जरूरी है।"

    वहीं, 17 वर्षीय मलाला युसूफजई बच्चों के शिक्षा अधिकारों के लिए काम करती हैं। वे सबसे कम उम्र वाली पुरस्कार विजेता हैं। मलाला नोबेल पुरस्कार के इतिहास में 47वीं महिला विजेता हैं।

    उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान में जन्मी मलाला बच्चियों के शैक्षिक अधिकारों को संरक्षण करने में सक्रिय है। उन्होंने तालिबान द्वारा स्थानीय महिला स्कूल को बंद करने और युवाओं के शिक्षा अधिकार का उल्लंघन करने का पर्दाफाश किया। वर्ष 2012 में तालिबान आतंकियों ने उसके सिर पर गोली चलाई और वे गंभीर रुप से घायल हो गई। स्वस्थ होने के बाद वे बच्चियों के शिक्षा अधिकारों के आंदोलन में और सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं।

    मलाला द्वारा पाकिस्तान में लड़कियों के शिक्षा अधिकार हासिल करने के लिए की गई कोशिशों को मान्यता देने के लिए 12 जुलाई 2013 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने हर वर्ष 12 जुलाई को "मलाला दिवस" के रूप में मनाने की घोषणा की। इसी दिन 16 वर्षीय मलाला न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उत्साहपूर्ण भाषण दिया।

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    "आतंकियों ने हज़ारों लोगों की जान ली है, लाखों लोग घायल हुए हैं। मैं उनमें से एक हूँ। अब मैं यहां खड़ी होकर अपने लिए नहीं कह रही हूँ। मैं उन लोगों के लिए कह रही हूँ, जिनकी आवाज़ दूसरे लोग नहीं सुन सकते। वे लोग अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हैं, उनके शांतिपूर्ण रहने के अधिकार, उनके साथ सम्मानित व्यवहार किए जाने के अधिकार, उनके समान अवसर का उपभोग करने के अधिकार और उनके शिक्षा पाने के अधिकार।"

    अनिलः मलाला की दास्तान दिखाती है कि उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबान के जाने के बाद भी, एक 16 वर्षीय लड़की की ज़िन्दगी कितने खौफ, दर्द और कठिनाइयों से भरी है।

    खुशहाल स्कूल में पढ़ने वाली मलाला भी अपने इलाके की और लड़कियों की तरह बचपन की आम खुशियों की बात जोहती रहती थी और मिल जाएं तो सहेज कर रखती थी। लेकिन मलाला अलग निकलीं, क्योंकि उन्होंने साहस और संघर्ष का रास्ता चुना।

    मलाला पहली बार सुर्खियों में वर्ष 2009 में आईं जब 11 साल की उम्र में उन्होंने तालिबान के साए में ज़िंदगी के बारे में गुल मकाई नाम से बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखना शुरू किया। वो डायरी किसी भी बाहरी इंसान के लिए स्वात इलाके और उसमें रह रहे बच्चों की कठिन परिस्थितियों को समझने का बेहतरीन आइना है।

    ललिताः इसके लिए मलाला को वीरता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और वर्ष 2011 में बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।

    पाकिस्तान की स्वात घाटी में लंबे समय तक तालिबान चरमपंथियों को दबदबा था लेकिन पिछले साल सेना ने तालिबान को वहां से निकाल फेंका। पिछले साल बीबीसी से बातचीत में मलाला ने बताया कि तालिबान के आने से पहले स्वात घाटी एकदम खुशहाल थी, लेकिन तालिबान ने आकर वहां लड़कियों के करीब 400 स्कूल बंद कर दिए।

    उस दौर में मलाला ने डायरी में लिखा, "तालिबान लड़कियों के चेहरे पर तेज़ाब फेंक सकते हैं या उनका अपहरण कर सकते हैं, इसलिए उस वक्त हम कुछ लड़कियां वर्दी की जगह सादे कपड़ों में स्कूल जाती थीं ताकि लगे कि हम छात्र नहीं हैं। अपनी किताबें हम शॉल में छुपा लेते थे।"

    और फिर कुछ दिन बाद मलाला ने लिखा था, "आज स्कूल का आखिरी दिन था इसलिए हमने मैदान पर कुछ ज़्यादा देर खेलने का फ़ैसला किया। मेरा मानना है कि एक दिन स्कूल खुलेगा लेकिन जाते समय मैंने स्कूल की इमारत को इस तरह देखा जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी।"

    अनिलः सेना की कार्रवाई के बाद स्वात घाटी में स्थिति बदल रही है। नए स्कूल भी बनाए जा रहे हैं। पर मलाला कहती हैं ये सब बहुत जल्दी होने की ज़रूरत है क्योंकि गर्मी में तंबूओं में पढ़ना बहुत मुश्किल होता है।

    हालांकि मलाला इस बात पर चैन की सांस लेती हैं कि कम से कम अब उन जैसी लड़कियों को स्कूल जाने में कोई खौफ नहीं है। मलाला ने कहा कि वो बड़े होकर क़ानून की पढ़ाई कर राजनीति में जाना चाहती हैं। उन्होंने कहा था, "मैंने ऐसे देश का सपना देखा है जहां शिक्षा सर्वोपरि हो।"

    साथ ही मलाला याद करती हैं कि तालिबान के दौर में लड़कियां और महिलाएं बाज़ार नहीं जा सकती थीं, "तालिबान को क्या मालूम कि महिलाएं जहां भी रहें, उन्हें खरीदारी पसंद है।"

    वो बताती हैं कि बाज़ार में किसी तालिब से पकड़े जाने पर डांटा जाना या घर लौटा दिया जाना या फिर मारा जाना, ऐसे अनुभव अब भी याद आते हैं तो वो सिहर जाती हैं।

    उस दौर में महिलाएं घर से बाहर किस तरह का बुर्का पहनकर जाएं इस पर भी रोकटोक थी, मलाला कहती हैं कि इन छोटी-छोटी पाबंदियों से आज़ादी का अहसास बहुत सुकून देता है।

    ललिताः वहीं वर्ष 2014 के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार फ्रांसीसी लेखक पैट्रिक मोदियानो को मिला है। 69 वर्षीय पैट्रिक मोदियानो फ्रेंच भाषा में लिखते हैं और फ्रांस में लोकप्रिय हैं।

    नोबेल कमिटी के प्रतिनिधि पीटर इंगलुंड ने पत्रकारों को बताया कि मोदियानो की पुस्तकों का अनुवाद स्वीडिश भाषा में काफी हुआ है और अंग्रेज़ी में भी कुछ उपन्यासों का अनुवाद हुआ है। उन्होंने कहा, "मोदियानो छोटे उपन्यास लिखते हैं। 120 या 130 पन्नों के ये उपन्यास यादों, पीछे छूट गई बातों और समय जैसे विषयों से जुड़ी होती हैं। उन्होंने बच्चों के लिए भी लिखा है लेकिन उन्हें नोबेल पुरस्कार उनके उपन्यासों के लिए दिया गया है।"

    अनिलः साहित्य के नोबेल को लेकर हर साल काफी कयास लगाए जाते हैं और इस बार ब्रितानी सट्टा कंपनी लैडब्रोक्स के अनुसार अफ्रीकी लेखक नगूगी वा थियोंगो और जापानी लेखक हारुकी मुराकामी का नाम सबसे ऊपर था। हालांकि लैडब्रोक्स का सट्टा फेल हो गया और फ्रांसीसी लेखक को ये पुरस्कार मिला गया।

    अनिलः दोस्तो क्या आपको पता है कि लहसुन कितना गुणकारी होता है। हमारे खाने में लहसुन का खूब इस्तेमाल होता है। इतना ही नहीं नहीं इसमे कैंसर रोधी तत्व भी मौजूद होते हैं। अब तो पेड़ों को जानलेवा बीमारियों से बचाने में भी लहसुन की सुई देना फायदेमंद हो सकता है।

    पेड़ों को लहसुन का इंजेक्शन देने का यह प्रयोग ब्रिटेन में किया जा रहा है। नॉर्थहैम्पटनशायर के एक बड़े फार्म में सरकार की ओर से इसका परिक्षण किया जा रहा है।

    व्यापक रूप से इस इंजेक्शन का इस्तेमाल गैर-व्यवहारिक और खर्चीला है। लेकिन यह ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व वाले पेड़ों को बचाने में मददगार हो सकती है। लहसुन प्रकृति में पाया जाने वाला एक शक्तिशाली एंटीबैक्टीरिअल और एंटीफंगल एजेंट है।

    इसमें एलिसिन नाम का यौगिक पाया जाता है जिसे वैज्ञानिक काम में लाना चाहते हैं। लहसुन का इंजेक्शन देने के लिए एक खास तरह का यंत्र तैयार किया गया जिसमें पंप करने के लिए एक चैंबर है और आठ ट्यूब लगे हैं ताकि एलिसिन को पेड़ के चारों तरह पहुंचाया जा सके। इसे 'ऑक्टोपस' ट्यूब कहते हैं।

    ललिताः जैसे ही एलिसिन बीमारी के संपर्क में आता है। वे बीमारी के जीवाणुओं को ख़त्म करना शुरू कर देता है। एलिसिन चूंकि एक कार्बनिक पदार्थ है, इसलिए इसे पेड़ में डालने पर कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया भी नहीं होती है।

    अनिलः अमरीका की एलीसा कार्सन अभी सिर्फ़ 13 वर्ष की हैं लेकिन उनका ख़्वाब है मंगल ग्रह पर क़दम रखने का। मगर उनका ये सपना सच भी हो सकता है।

    एलीसा ने ठाना है कि वो मंगल ग्रह पर क़दम रखने वाली पहली एस्ट्रॉनॉट बनेंगी। नासा को भी लगता है कि एलीसा मंगल ग्रह पर जाने वाली पहली व्यक्ति बन सकती हैं और उनकी इस चाहत को पूरा करने के लिए नासा उन्हें बाक़ायदा ट्रेनिंग भी दे रहा है।

    एलीसा मंगल पर इसलिए जाना चाहती हैं क्योंकि ये एक ऐसा ग्रह है जिसपर कोई नहीं पहुंच पाया है। हालांकि ये कोई साधारण बात नहीं है। नासा के पॉल फ़ॉर्मेन कहते हैं नासा ऐसी इच्छा रखने वाले बच्चों को बहुत गंभीरता से लेता एलीसा विज्ञान पढ़ रही हैं और उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान भी है। छुट्टी के दिन वो प्यानो के सुर छेड़कर या फुटबॉल खेलकर वक़्त बिताना पसंद करती हैं।

    वो नासा के तीनों वर्ल्ड स्पेस कैंप में ट्रेनिंग पाने वाली पहली लड़की हैं। अमरीकी स्पेस एजेंसी नासा में उनको 'ब्लूबेरी' के नाम से बुलाया जाता है। अमरीका के बैटन रूज लुइज़ियाना की रहने वाली एलीसा कहती हैं कि विफलता उनके लिए विकल्प नहीं है।

    एलीसा के पिता का कहना है कि अगले 20 वर्षों में एलीसा का मंगल पर पहुंचने का लक्ष्य है। उनकी कड़ी मेहनत, दृढ़ इच्छा शक्ति और सही ट्रेनिंग उनकों उस ग्रह पर पहुंचने में मदद करेंगी। हालांकि मंगल पर जाने के बाद वापस आ पाना मुश्किल है पर एलीसा कहती है कि इसके बावजूद वो मंगल पर जाना चाहेंगी।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने चेतावनी दी है कि इबोला वायरस गिनी, सिएरा लियोन और लाइबेरिया तीनों देशों की राजधानी में तेज़ी से फैल रहा है।

    डब्ल्यूएचओ के उप-प्रमुख ब्रूसी एल्वर्ड ने कहा है कि इन तीनों देशों में जिस रफ़्तार से इबोला फैल रहा है, उसकी तुलना में इन्हें मिलने वाली मदद बहुत कम है।

    इस बीमारी का मुक़ाबला करने के लिए तीनों देशों ने और ज़्यादा मदद की अपील की है। ऐल्वर्ड ने कहा की हालात 12 दिन पहले से ज़्यादा ख़राब हैं।

    मेडिसिन्स सैन्स फ़्रंटियर्स (एमएसएफ़) ने कहा कि गिनी की राजधानी कॉनाक्री में इबोला के मामले तेज़ी से बढ़े हैं, इससे इबोला पर काबू पाने की उम्मीदों को झटका लगा है।

    शुक्रवार को एमएसएफ़ की प्रमुख जोआना लियू ने बीबीसी से कहा, "हम इबोला से जंग नहीं जीत रहे हैं। इस मुक़ाबले में आगे रहने के लिए हमें पहले से और ज़्यादा ताक़त झोंकनी होगी।"

    इस बीच, स्पेन के एक अस्पताल में इबोला के संदिग्ध सात और लोगों की निगरानी की जा रही है। इबोला वायरस के संक्रमण से 3,860 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई है, इनमें से अधिकतर मौतें पश्चिम अफ़्रीका में हुई हैं। इस वायरस की चपेट में आने के कारण 200 से ज़्यादा स्वास्थ्यकर्मियों की भी मौत हो चुकी है।

    ललिताः लीजिए अब पेश है आज के प्रोग्राम में लिस्नर्स के कमेंट।

    पेश है पहला लैटर। जो हमें भेजा है, सऊदी अरब से सादिक आजमी ने। लिखते हैं कि वेईतुंग जी द्वारा प्रसारित विशेष अंक सुना जिसमें अनिल जी की चीन के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित छिंगहाई प्रांत पहुंचे अनिल जी की विशेष यात्रा को समर्पित रिपोर्ट के साथ साक्षात्कार भी सुनवाया गया। जो कई मायने मे अच्छा लगा और इस प्रान्त से सम्बंधित बहुत सी बातें पता लगी। अनिल जी ने बड़े विस्तार से वहां की रीति रिवाज, रहन-सहन, खानपान, धार्मिक स्थल, यातायात व्यवस्था आदि कई विषयों पर प्रकाश डाला और आखों देखा अनुभव हमसे साझा किया। नि:संदेह इससे हमारे ज्ञान में इजाफा हुआ।

    यात्रा के दौरान छिंग्हाई के सबसे बड़े बौद्ध मंदिर था आर यानी कुटुम्ब मंदिर एवं छिंग्हाई झील का अद्धभुत नज़ारा हमने अनिल जी की नज़रों से किया। जो सुखद एहसास का प्रतीक था।

    इसके साथ ही स्थानीय चरवाहों के घर जाकर उनकी प्रतिक्रिया लेना बहुत रोचक आभास करा रहा था। अब तक हम आपकी रिपोर्ट के माध्यम से उन चरवाहों की जीवनशैली से परिचित होने की चेष्टा करते थे। मगर किसी उद्घोषक द्वारा स्वंय उनके घर जाकर आंखों देखा हाल सुनवाने की यह पहली घटना थी। जो अत्यंत रोचक और उत्साहित करने वाली थी। मैं हृदय से अनिल जी का आभार व्यक्त करता हूं जो उन्होंने इतने विस्तार से बताया और हार्दिक साधुवाद वेईतुंग जी का जिन्होंने अनिल जी से बातचीत की। मैं अपने पत्र के साथ पिछले अंक के सवालों के जवाब भेज रहा हूं।

    अनिलः अगला लैटर हमें आया है, पश्चिम बंगाल से बिधान चंद्र सान्याल का। लिखते हैं कि छिंगहाई प्रांत से अनिल जी द्वारा पेश रिपोर्ट से हमें बहुत कुछ जानकारी हासिल हुई। वहां की विशेषता से हम रूबरू हुए। लेकिन दुख की बात है कि 23 सितंबर के अंक में मेरी टिप्पणी को शामिल नहीं किया गया। चलिए कोई बात नहीं। इसी के साथ आपको दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं।

    वहीं उड़ीसा से सुरेश अग्रवाल ने हमें लैटर भेजा है, उन्होंने 23 सितंबर के प्रोग्राम के बारे में टिप्पणी की है। लिखते हैं कि देश-दुनिया के ताज़ा समाचारों के बाद पेश साप्ताहिक "टी टाइम" के तहत भारत में बनने जा रहे नये टीवी धारावाहिक "एवरेस्ट" तथा नये होनहार क्रिकेटर 14 वर्षीय पृथ्वी की असाधारण उपलब्धियों पर दी गई जानकारी काफी उत्साहवर्धक लगी। भारतीय मूल की पेप्सी की सीईओ इन्दिरा नूई को फॉर्च्यून पत्रिका द्वारा विश्व की तीसरी सबसे सशक्त महिला का ख़िताब दिया जाना तथा ब्रिटेन में बोटोक्स ट्रीटमेन्ट पर विशेषज्ञों की राय भी काफी सूचनाप्रद लगी। इसके बावजूद आज जानकारियों पर संगीत भारी और ज़रुरत से अधिक जान पड़ा। हंसगुल्लों में "सेल्समेन और कॉकरोच" तथा "एयर हॉस्टेस एवं पण्डितजी" वाला चुटकुला गुदगुदाने में कामयाब रहा।

    अब जोक्स की बारी है।

    लीजिए पेश है, पहला जोक......

    रमेश और सुरेश अपने दोस्त को बेहोशी ही हालत में उठाकर डॉक्टर के पास ले गए।

    डॉक्टर- क्या हुआ है इन्हें?

    रमेश- कुछ नहीं डॉक्टर साहब.. फेसबुक का मरीज है, पिछले 4 दिन से नेट नहीं चल रहा।

    दूसरा जोक.....

    टीचर- बेटा अगर सच्चे दिल से प्रार्थना की जाए तो वो जरूर सफल होती है।

    छात्र-रहने दो सर अगर ऐसा होता तो आप मेरे सर नहीं ससुर होते!!

    लीजिए अब पेश है, आज के प्रोग्राम का अंतिम जोक.....

    संता के घर 20 साल के बाद बच्चा हुआ, उसे देख संता बहुत उदास हो गया!

    बंता (संता से)- यार उदास क्यों है?

    संता (बंता से)- यार ! 20 साल बाद बच्चा हुआ वो भी इतना सा।

    दोस्तो, पिछले अंक में दो सवाल पूछे थे, पहला सवाल था कि छिंगहाई प्रांत के मशहूर बौद्ध मंदिर का क्या नाम है। सही जवाब है कुम बुम था आर मंदिर।

    दूसरा सवाल था, चीन की सबसे बड़ी झील का क्या नाम है, सही जवाब है छिंगहाई झील।

    इन सवालों का सही जवाब हमें भेजा है, उड़ीसा से सुरेश अग्रवाल, सऊदी अरब से सादिक आजमी, पश्चिम बंगाल से विधान चंद्र सान्याल, देवाशीष गोप और भागलपुर बिहार से हेमंत कुमार आदि। आप सभी को बधाई। आगे भी हमारे सवाल सुनते रहिए।

    अनिलः अब आज के सवालों की बारी है। पहला सवाल है, इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार किसे दिया गया है और पुरस्कार पाने वाले क्या करते हैं। दूसरा सवाल है, लहसुन से किस नए गुण का पता चला है।

    अगर आपको इनका जवाब पता है तो जल्दी हमें ई-मेल कीजिए या खत लिखिए। हमारा ईमेल है.. hindi@cri.com.cn, हमारी वेबसाइट का पता है hindi.cri.cn। अपने जवाब के साथ, टी-टाइम लिखना न भूलें।

    अनिलः टी-टाइम में आज के लिए इतना ही ...अगले हफ्ते फिर मिलेंगे.....चाय के वक्त......तब तक आप चाय पीते रहिए और सीआरआई के साथ जुड़े रहिए। नमस्ते, बाय-बाय, शब्बा खैर, चाइ च्यान.....

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