
पारंपरिक तिब्बती शैली के बटुआ
मेले के दौरान ल्हासा स्थिति तिब्बत संग्रहालय में शानदार प्रदर्शनी आयोजित हुई। जिसमें गैर भौतिक सांस्कृतिक अवशेषों की प्रदर्शनी, विशेष सांस्कृतिक कारोबारों और उनकी महत्वपूर्ण परियोजनाओं का परिचय, सांस्कृतिक अवशेषों की प्रदर्शनी और तिब्बती ओपेरा प्रदर्शनी भी शामिल थे। इसके साथ ही स्थानीय कलाकारों ने तिब्बती हस्तलिपि, तिब्बती वाद्ययंत्र और तिब्बती वस्त्र दिखाए। थांगखा चित्रकारों ने तत्स्थल पर थांगखा चित्र बनाया और शिल्पकारों ने तिब्बती अगरबत्ती बनाई। प्रदर्शनी हॉल में विभिन्न प्रकार वाले पर्स यानी बटुआ प्रदर्शित क्षेत्र बहुत ध्यानाकर्षक था। तिब्बती पर्स बनाने वाले एक शिल्पकार ने जानकारी देते हुए कहा कि पारंपरिक शैली वाले पर्स के अलावा, अब तिब्बती शिल्पकार पर्स बनाने के दौरान अधिक आधुनिक तत्व शामिल करते हैं। उन्होंने कहा:
"चमड़े से बनाए गए पारंपरिक पैकेज जैसे वस्तुओं का प्रयोग आम तौर पर जौ से बनाए गए पकवान चानपा और चाय रखने के लिये किया जाता है। अब तिब्बतियों का जीवन स्तर लगातार उन्नत हो चला है, पारंपरिक शिल्पकार फ़ैशनेबल पर्स, बैग और झोले भी बनाते हैं।"
मौजूदा मेले में प्रमुख मंच वाली कड़ी में दर्जनों सरकारी अधिकारियों, विशेषज्ञों और विद्वानों ने संगोष्ठी आयोजित की, जिन्होंने तिब्बत में पर्यटन विकास की वर्तमान स्थिति, भविष्य, देशी-विदेशी पर्यटन सहयोग और तिब्बती शास्त्र का अनुसंधान जैसे मुद्दों पर विचार विमर्श किया। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की जन सरकार के अध्यक्ष लोसांग च्यांगछुन ने कहा कि तिब्बत के पर्यटन विकास की निचली पंक्ति संरक्षण करते हुए अनवरत विकास करना है। उन्होंने कहा:
"पारिस्थितिकी, पर्यवारण और श्रेष्ठ परम्परागत संस्कृति का संरक्षण करना पर्यटन विकास करने की निचली रेखा है। पर्यटन से जुड़ी सांस्कृतिक परियोजनाओं का विकास अल्पकालिक आर्थिक लाभ पर निर्भर नहीं होना चाहिए। अगर पर्वत, नदियां, वन, प्राचीन कस्बे, संस्कृति और स्थानीय नागरिकों के जीवन को नुक्सान पहुंचा, यह बड़ा ऋण होगा, जिसका आर्थिक मूल्य से आकलन नहीं किया जा सकता।"









